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देश में ईसबगोल कहां उगाया जाता है? किसान भाई इस औषधीय फसल की वैज्ञानिक खेती कर कैसे बन सकते हैं मालामाल? 

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isabgol ki kheti
ईसबगोल की खेती की विधि

ईसबगोल एक लाभकारी और गुणकारी औषधि फसल

ईसबगोल (Plantago Ovata) प्लान्टेजिनसी कुल का सदस्य है. यह एक महत्वपूर्ण औषधि फसल है तथा भारत इसका सर्वाधिक उत्पादक एवं निर्यातक देश है.

भारत में प्रमुखता गुजरात, पंजाब एवं उत्तर प्रदेश में इसका उत्पादन होता है. पिछले कुछ वर्षों से इसका उत्पादन मध्य प्रदेश के विभिन्न क्षेत्र जैसे मंदसौर, जिले की मल्हारगढ़, मनसा, नीमच एवं मंदसौर तहसीलों में भी लगभग 5000 हेक्टेयर क्षेत्रफल में किया जा रहा है.

इसकी औषधि के बहुत उपयोगी होने तथा इसकी कृषि की सरल प्रक्रिया तथा उससे अल्पावधि में अधिकाधिक लाभ प्राप्त होने एवं इसकी फसल को बिक्री हेतु पर्याप्त बाजार के साथ-साथ स्थानीय शासकीय फसलों को प्रदेश के किसानों द्वारा सहर्ष स्वीकार किया जा रहा है. उल्लेखनीय है कि वर्तमान में हमारे देश  से निर्यात होने वाली औषधीय फसलों में ईसबगोल का प्रमुख स्थान है.

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ईसबगोल के औषधि गुण एवं उपयोग

ईसबगोल के बीजों पर पाया जाने वाला पतला छिलका ही इसका औषधीय उत्पाद होता है. इसके छिलके में एक लसलसा सा पदार्थ रहता है. जिसमें इसके वजह से कई गुना अधिक पानी अवशोषित करने की क्षमता होती है. इस औषधि को पेट की सफाई, कब्जियत, अल्सर, बवासीर, मूत्र संस्थान, दस्त,पेचिश जैसी शारीरिक बीमारियों को दूर करने में आयुर्वेदिक औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है. इसके अतिरिक्त प्रिंटिंग खाद्य प्रसंस्करण उद्योग जैसे आइसक्रीम तथा रंग रोगन के कामों में भी प्रयुक्त किया जाता है. पानी सूखने की उसकी क्षमता के कारण इसकी भविष्य में शुष्क उद्यानिकी एवं शुष्क खेती हेतु प्राप्त किए जाने की विपुल संभावनाएं हैं. ईसबगोल के पौधे लगभग 90 सेंटीमीटर तक ऊँचे होते है तथा इनसे 20 से 95 टिलर्स (कल्ले) निकलते हैं.

ईसबगोल पर आधारित अनेकों औषधियां पाउडर एवं भूसी भारती एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में प्रचलित है.

भारती बाजार में डाबर इंडिया द्वारा नेचर केयर नाम से ईसबगोल की भूसी विभिन्न भागों में एवं साधारण रूप में पाउच डिब्बों की पैकिंग में 10 ग्राम से लेकर 500 ग्राम तक प्रस्तुत की जा रही है. इसके साथ-साथ अन्य कई कंपनियों द्वारा भी विभिन्न ब्रांड में ईसबगोल का विक्रय किया जा रहा है.

ईसबगोल की खेती की विधि

ईसबगोल की खेती हेतु सीमांत भूमि जिसमें जल निकास अच्छा हो एवं जिस का पी०एच० मान सात से आठ के मध्य अच्छी मानी जाती है.

इसकी फसल की बुवाई अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े से नवंबर माह के प्रथम पखवाड़े तक की जा सकती है.

बुवाई कतारों से एवं छिड़काव विधि दोनों से की जा सकती है. कृषि विश्व विद्यालय मंदसोर में किए गए अनुसंधान में 25 से 30 सेमी की दूरी पर कतारों में एक सेमी गहराई पर पांच से सात के किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर बुवाई करना उत्तम पाया गया है.

ईसबगोल की फसल हेतु प्रयुक्त बीज की प्रमुख किस्में गुजरात-1, गुजरात-2, ट्राम्बे सेलेक्शन (1-10) और ईसी 124 वां 345 है.

इनमें से अपेक्षाकृत गुजरात-2 को अधिक अपनाया जाता है. यह सभी किस्मे स्थानीय मंडियों किसानों या विक्रेताओं से लगभग 30 से ₹40 प्रति किलो की दर से प्राप्त की जा सकती है.

ईसबगोल की फसल को अधिक मात्रा में प्राप्त करने के लिए खाद एवं उर्वरक के रूप में गोबर की खाद 15 टन प्रति हेक्टेयर बुवाई के समय खेत में डाली जानी चाहिए.

इस नत्रजन 50 फास्फोरस 40 और पोटाश 24 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से तो करना इसकी उपज के लिए अच्छा होता है.

नत्रजन का 50% भाग बुवाई के तुरंत बाद एक हल्की सिंचाई करनी चाहिए.

बुवाई के 6 से 10 दिन बाद अंकुरण हो जाता है. बुवाई के 3 सप्ताह बाद पुनः सिंचाई करनी चाहिए. तीसरी सिंचाई बाली बनते समय करनी चाहिए. पानी की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध हो तो दोस्ती या मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए और भी की जा सकती है. सितारों के पश्चात एक से दो बुराई करनी चाहिए.

ईसबगोल फसल की प्रमुख बीमारी एवं कीट व्याधि

ईसबगोल की प्रमुख बीमारियों में डाउनी मिल्ड्यू, झुलसा एवं पाउडरी मिल्ड्यू है. इन बीमारियों के उपचार हेतु डायथेन एम-45, 3 ग्राम प्रति लीटर केप्टान या केप्टाफाल 2 ग्राम प्रति लीटर एवं वाविस्टीन 1 ग्राम प्रति लीटर का घोल तैयार करके छिड़काव तथा ड्रेचिंग करनी चाहिए.

ईसबगोल की फसल की प्रमुख कीट व्हाइट ग्रब एवं एफिडस (मोईला) है. इन कीटों पर नियंत्रण हेतु क्रमशः 20 से 25 किलोग्राम एल्ड्रीन डस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से बुराई करते समय खेत में मिलानी चाहिए एवं एफिडस कीट दिखाई देने पर मेटासिस्टाक्स एक मिली दवा प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव किया जाना चाहिए.

ईसबगोल की फसल की कटाई

ईसबगोल की फसल 100 से 130  दिन में तैयार हो जाती है. जब बाली लाल पड़कर दाने हाथ में मसलने पर ही निकलने लगे. तो इसकी परिपक्वता पूर्ण हो जाती है.

इसकी कटाई सुबह के समय की जाती है. जिससे बीच कम से कम झड़ते हैं. फसल की कटाई के पश्चात एवं गहाई के पूर्व फसल की ढेरियों के ऊपर थोड़ा पानी छिड़क दिया जाता है. जिससे दानी आसानी से अलग हो जाते हैं.

ओसाई करने के पश्चात भूसा अलग कर दिया जाता है तथा साफ करने के पश्चात बीज प्राप्त कर लिया जाता है. चार-पांच दिन बाद सूखने के बाद बोर में भरकर संग्रहित कर लिया जाता है.

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ईसबगोल की उपज

ईसबगोल की फसल से प्रति हेक्टेयर 15 से 20 कुंटल उपज प्राप्त होती है. इसके बीज की भूसी जो वजन में लगभग 20% होती है वही औषधि निर्माण में प्रयुक्त होती है एक हेक्टेयर खेती से लगभग 5 कुंटल भूसी प्राप्त होती है.

ईसबगोल की खेती के संदर्भ में रखी जाने वाली प्रमुख सावधानियां

  • ईसबगोल की खेती को करते समय मौसम की आवश्यकता होती है. हल्की बौछारें ईसबगोल की बाली से बीजों को जमीन पर बिखेर कर फसल को नुकसान पहुंचा सकती हैं.
  • ईसबगोल की फसल को पशुओं द्वारा नुकसान पहुंचाया जा सकता है. अतः इसे पशुओं से भी बचाया जाना अनिवार्य होता है.
  • इसके बीजों के अंकुरण के समय 20 से 25 डिग्री सेंटीग्रेड तथा बढ़वार के समय  30 से 35 सेंटीग्रेड तापमान की आवश्यकता होती है.
  • इसकी देर से बुआई करने पर उत्पादन कम मिलने के अलावा फसल की बीमारी का प्रकोप अधिक हो सकता है.
  • इसके बीजों को 3 ग्राम थीरम तथा डायथेन एम-45 दवा से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित करने के पश्चात ही बोया जाना चाहिए.
  • इसके बीज बारीक होने के कारण बुवाई करते समय उन्हें बारीक मिट्टी या रेत मिलाया जाना चाहिए.

ईसबगोल एक गुणकारी उपयोगी एवं निर्यात की जाने वाली औषधि फसल है. जिसे नए युवा व्यवसाई खेती के रूप में अथवा औषध निर्माण के इकाई के रूप में अपनाकर अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं.

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