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Lucerne Farming – रिजका की खेती कैसे करे ? जानिए हिंदी में

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Lucerne Farming
रिजका की खेती (Lucerne Farming) कैसे करे ?

रिजका की खेती (Lucerne Farming) कैसे करे ?

  नमस्कार किसान भाईयों, रिजका की खेती (Lucerne farming) एक पौष्टिक चारे के फसल के रूप में की जाती है. यह भारत में उगाई जाने वाली महत्वपूर्ण फसल है. सामान्य रूप से किसान भाई इसे ज्वार, मक्का, लोबिया, ग्वार आदि फसलों के बाद उगाते है. कभी-कभी इसे धन की फसल के बाद उगाया जाता है. गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख में रिजका की खेती (Lucerne farming) की पूरी जानकारी देगा वह भी अपनी भाषा हिंदी में. जिससे किसान भाई जाड़े की ऋतु में पशुओं को हरा चारा उपलब्ध करा सके. तो आइये जानते है रिजका की खेती (Lucerne farming) की पूरी जानकारी-

रिजका के फायदे 

रिजका एक पौष्टिक चारे की फसल है. रिजका के हरे चारे में पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व पाए जाते है. साथ ही इन पोषक तत्वों की पाचन शीलता भी अच्छी होती है. इसमें प्रोटीन 15 प्रतिशत, पानी की मात्रा 74 प्रतिशत, कड़ा रेशा 29.2 प्रतिशत, नाइट्रोजन रहित निष्कर्ष 36.4 प्रतिशत, कैल्सियम 2 प्रतिशत, फ़ॉस्फोरस 0.48 प्रतिशत, पोटेशियम 2.43 प्रतिशत पाया जाता है. इन पोषक तत्वों की मौजूदगी से स्पष्ट हो जाता है रिजका पशुपालन के लिए एक पौष्टिक और लाभदायक चारा है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र वितरण  

रिजका का वानस्पतिक नाम मेडिकागो सटाईवा (Medicago satixa) है. यह मध्य एशिया का पौधा है. वैज्ञानिको के अनुसार इस चारे फसल की उत्पत्ति एशिया माइनर और ट्रांसकाकेशिया में हुई. जो अनुमानों के अनुसार संभवतः इसका मूल स्थान वर्तमान ईरान हो सकता है.

विश्व में रिजका की खेती व्यापारिक स्तर पर की जाती है. विभिन्न देश यूरोप, इटली, स्पेन, टर्की, चीन, अरब आदि प्रमुख जिनमें रिजका की खेती की जाती है. भारत में इसकी खेती उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, गुजरात और तमिलनाडु में की जाती है.

जलवायु एवं भूमि (Lucerne Farming)

रिजका की खेती उन सभी क्षेत्रों में की जा सकती है. जहाँ इसके उगाने के लिए समशीतोष्ण से लेकर शीतोष्ण जलवायु पायी जाती है. ऐसी जलवायु में, जहाँ पानी रिजका के लिए पर्याप्त मात्रा में नही मिलता है, इसकी उपज कम हो जाती है और वर्ष के कुछ माह में इसको नही उगाया जाता है. शुष्क जलवायु में उगाने के लिए सिंचाई का उचित प्रबंध होना आवश्यक है.

रिजका की खेती के लिए गहरी एवं अच्छी जल निकास वाली भूमि की आवश्यकता होती है. क्षारीय मिट्टी इसकी खेती के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है. अम्लीय भूमि में रिजका की फसल बिलकुल उगाई नहीं जा सकती है. उगाने से पहले उसमें कृषि चूना डालना आवश्यक है. चूना डालने से मिट्टी का पी० एच० मान बढ़ जाता है. इसके साथ ही कैल्शियम तथा मैग्नीशियम की मात्रा की बढ़ोत्तरी होती है. जिससे पौधों को लाभ होता है. इसकी खेती के लिए भूमि का पी० एच० मान 6.8 होता है.

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उन्नत किस्में (Lucerne Farming)

देश में रिजका की कई उन्नत किस्में पायी जाती है. इनमे से सर्वोत्तम सिरसा टाइप नंबर 8 और टाइप नंबर 9 है. जो कि सभी रिजका उगाये जाने वाले भागों में प्रचलित है. रिजका की कई किस्में जो कि अमेरिका और कनाडा से लायी गयी है. इनमें इंडियन मूलर फार्म, मेसासिरसा, सोनारा यूनिको, रेम्बलर, वर्नल, क्यूगा और सेरेनाक प्रमुख किस्में है. इन किस्मों की सिंचित स्थान पर अधिक पैदावार होती है. इनमें से कुछ किस्में चारागाह के लिए उत्तम मानी जाती है.

खेत की तैयारी 

रिजका की अच्छी पैदावार के लिए भूमि का नम एवं सख्त होना आवश्यक है. मिट्टी भुरभुरी और दानेदार होनी चाहिए. धूल नही होनी चाहिए. खेत की तैयारी के लिए तीन से चार बार हैरो चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए. जुताई का मुख्य उद्देश्य मिट्टी में पहली फसल अवशेष को दबाना, डाले गए चूने को मिलाना, और मिट्टी की साथ को समतल बनना. खेत समतल बना लेने से बीज का अंकुरण अच्छा और बराबर होता है.

दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम होती है. जड़े 3 से 6 मीटर की गहराई से पानी ले सकती है. जिसके कारण इसकी खेती असिंचित या कम वर्षा वाले क्षेत्र में की जा सकती है. लाल मिट्टी इसकी पैदावर के लिए अच्छी नही होती है और बलुई मिट्टी में इसकी वृध्दि सीमित रहती है.

बुवाई (Lucerne Farming)

बुवाई के लिए सदैव उन्नत किस्म के बीज का ही प्रयोग करना चाहिए. बुवाई के लिए उन्नत बीज 15 से 22 किग्रा० मात्रा प्रति हेक्टेयर बुवाई के लिए पर्याप्त होती है. रिजका की बुवाई की कई विधियाँ है. यदि जमीन हल्की हो, तो इसे कतारों या लाइनों में सीड ड्रिल से 15 से 20 सेमी० की दूरी पर बोना चाहिए. इससे बीज लगभग 15 किग्रा० ही लगता है. परन्तु यदि जल निकास का उचित प्रबंध हो तो तो बीज की बुवाई मेड़ें (ridges) बनाकर करनी चाहिए. जिससे अंकुरण अच्छा हो सके. बीज की गहराई 1.25 सेमी० से अधिक नही होना चाहिए, अन्यथा अंकुरण बहुत अधिक घट जाता है.

खाद एवं उर्वरक (Lucerne Farming)

रिजका की अधिक उपज के लिए फ़ॉस्फोरस और पोटाश की अधिक आवश्यकता पड़ती है. फ़ॉस्फोरस मुख्य रूप से जड़ों की सहायक होती है. और पोटाश द्वारा चारे की उपज में वृध्दि होती है. इसके अलावा फसल की प्रारम्भिक वृध्दि के लिए नत्रजन देना देना भी आवश्यक होता है, क्योकि छोटे पौधों को नत्रजन एकत्रित करने की क्षमता कम होती है. फ़ॉस्फोरस और पोटाश की मात्रा मृदा परिक्षण के बाद देनी चाहिए. रिजका की अच्छी उपज के लिए 25 से 30 किग्रा० नत्रजन तथा 50 से 60 किग्रा० फ़ॉस्फोरस प्रति हेक्टेयर के हिसाब से देना चाहिए. नत्रजन तथा फ़ॉस्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई के समय देनी चाहिए.

सिंचाई एवं पानी निकास प्रबन्धन 

रिजका की उपज अधिकतर सिंचित स्थानों पर, विशेषकर गहरी मिट्टी में अधिक पायी जाती है. उपयुक्त पानी की दशा में पौधे का रंग हल्का हरा हो जाता है. जैसे ही मिट्टी में पानी की कमी हो जाती है. हरा रंग गहरा हो जाता है. जिससे पानी की कमी का पता लगाया जा सकता है. जैसे ही पत्तियों में गहरा हरा रंग आ जाय, सिंचाई करना आवश्यक है. अन्यथा इसके पश्चात पौधे मुरझा जाते है. और उपज तथा चारे की गुणवत्ता कम हो जाती है. इसलिए बसंत तथा गर्मी के मौसम में इसकी सिंचाई 10 से 20 दिन के अंतर पर करनी चाहिए तथा सर्दियों के मौसम में सिंचाई का अंतर 15 से 20 दिन तक रखा जाता है.

फसल सुरक्षा (Lucerne Farming)

रिजका की बुवाई के बाद जब बीजों में अंकुरण होने लगे तो पौधों की छोटी अवस्था में खरपतवारों से मुक्त रखने के लिए इसका नियंत्रण आवश्यक है. इसके लिए आप सबसे पहले इसकी निराई-गुड़ाई करे. इसके पौधों की वृध्दि अच्छी होगी. यदि खरपतवार अधिक है तो 2-4 डी या डेलापान की आधे से एक किलोग्राम मात्रा प्रति एक हजार लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए.

रिजका में क्षति पहुँचाने वाले कीड़ों में रिजका इल्ली (लूसर्न कैटरपिलर), चना इल्ली (ग्रैम कैटरपिलर), सेमीलूपररिजका घुन आदि है. चना इल्ली मिट्टी के अन्दर रहती है, इसलिए दो लाइनों के बीच मिट्टी की गुड़ाई करने से इसका प्रकोप कम किया जा सकता है. रिजका घुन को कम करने के लिए प्यूपा सहित मुड़ी पत्तियों को तोड़कर गाड़ देना चाहिए. मिट्टी में 1000 लीटर पानी में 1 लीटर थायोडान या मेटासिस्टॉक्स घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

सर्दी के मौसम में रिजका में म्रदुरोमिल आसिता रोग का प्रकोप होता है. जिससे पत्तियां बेकार हो जाती है, और चारे में पोषक तत्वों की मात्र कम हो जाती है. इसलिए इस रोग को कम करने के लिए ग्रसित पौधों को तुरंत काट देना चाहिए.

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कटाई एवं उपज  

रिजका की पहली कटाई वुवाई से लगभग 55 से 60 दिन के पश्चात की जाती है. इसके बाद 25 दिन या 30 दिन के अंतर पर चारा काटना चाहिए.

उत्तर भारत में रिजका की फसल से 700 से 800 कुंटल प्रति हेक्टेयर हरा चारा प्राप्त होता है. वही दक्षिण भारत में 800 से 900 कुंटल प्रति हेक्टेयर हरा चारा प्राप्त होता है.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है, गाँव किसान (Gaon Kisan) के रिजका की खेती (Lucerne farming) से सम्बन्धित इस लेख से आप को इसकी खेती की सभी जानकारियां मिल पायी होगी. गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा रिजका के फायदे से लेकर रिजका की उपज तक सभी जानकारियां दी गयी है लेकिन फिर भी रिजका की खेती (Lucerne farming) से सम्बंधित कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा यह लेख आप को कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताएं. महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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