Garlic Farming – लहसुन की खेती कैसे करे ? (हिंदी में)

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लहसुन की खेती (Garlic Farming) कैसे करे ?

लहसुन की खेती (Garlic Farming) कैसे करे ?

 नमस्कार किसान भाईयों, लहसुन की खेती (Garlic Farming) देश के अधिकतर राज्यों में की जाती है. यह एक नगदी मसाला फसल है. भारतीय आहार में  लहसुन का बहुत अधिक उपयोग किया जाता है. किसान भाई इसकी खेती कर अच्छा मुनाफा कमा सकते है. इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख के जरिये आप सभी को लहसुन की खेती (Garlic Farming) की पूरी जानकारी अपनी भाषा हिंदी में देगा. जिससे किसान भाई उन्नत विधि से इसकी खेती कर अच्छी उपज प्राप्त कर सके. तो आइये जानते है लहसुन की खेती (Garlic Farming) की पूरी जानकारी-

लहसुन के फायदे 

लहसुन एक लाभदायक कन्द वाली ठन्डे मौसम की फसल है. इसका ज्यादर उपयोग सब्जी मसाले के रूप में किया जाता है. लहसुन एक औषधीय मसाला फसल है. लहसुन में विटामिन तथा कैल्सियम, फास्फोरस, पौटेशियम, खनिज प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. लहसुन में डाई अलाइड डाई सल्फाइड नामक घटक पाया जाता है, जिसके कारण लहसुन में एक विशेष प्रकार की गंध और स्वाद रहता है. लहसुन के सेवन से कई बीमारियों में लाभप्रद होता है. इसके सेवन से पाचन, पाचन विकार, हाई ब्लड प्रेशर, खून गाढ़ा करता है, कोलेस्ट्रोल को कम करता है, डायबिटीज, डिप्रेशन और कई प्रकार के कैंसर से बचाता है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र वितरण

लहसुन का वैज्ञानिक नाम एलियम सटाइवम एल है. जो कि अमेरिलिडेसी परिवार का सदस्य है. इसकी उत्पत्ति मध्य एशिया तथा भू मध्य सागरीय क्षेत्र में हुई है. भारत में लहसुन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, उड़ीसा, महराष्ट्र, गुजरात, मद्रास तथा आन्ध्र प्रदेश आदि राज्यों में बड़े स्तर पर की जाती है.

भूमि एवं जलवायु (Garlic Farming)

लहसुन की सफल खेती के लिए दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है. भारी भूमि में इसके कन्दों का समुचित विकास नही हो पाता है. इसकी फसल जमीन के नीचे तैयार होती है. बुवाई वाली भूमि में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए.

लहसुन की खेती के लिए ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है. अधिक गर्म और लम्बे दिन इसके कन्द के निर्माण के लिए उत्तम नही रहते है.

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उन्नत किस्में (Garlic Farming)

लहसुन की प्रमुख उन्नत किस्मों में यमुना सफ़ेद, यमुना जी-282, यमुना जी-50, यमुना जी-323, यमुना सफ़ेद-5, भीमा बैगनी, वी०एल० गार्लिक-1 आदि प्रमुख है.

खेत की तैयारी (Garlic Farming)

लहसुन की बुवाई वाले खेत की अच्छी प्रकार जुताई करके मिट्टी को एकदम भुरभुरा बना लेना चाहिए. हर जुताई के बाद पाटा जरुर लगाए जिससे मिट्टी समतल और भुरभुरी हो जाय. खेत में जल भराव न ही इसके भी उचित प्रबन्धन पहले ही कर ले.

बीज बुवाई एवं पौध रोपण

एक हेक्टेयर खेत की बुवाई के लिए 500 से 700 किलो बीज की जरुरत होती है. मैदानी क्षेत्रों में सितम्बर से नवम्बर तक इसकी बुवाई की जा सकती है. बीज की बुवाई से पहले किसी भी फफूंद नाशक से से उपचारित करके बोना चाहिए. इसकी अच्छी उपज के लिए लहसुन की बुवाई डिबलिंग विधि से करनी चाहिए तथा पंक्ति से पंक्ति की दूरी 15 सेमी० और पौध से पौध की दूरी 5 से 7 सेमी० रखनी चाहिए.

खाद एवं उर्वरक (Garlic Farming)

लहसुन की अधिक पैदावार लेने के लिए उसमें एक हेक्टेयर के हिसाब से 20 से 25 टन गोबर की सड़ी हुई खाद या कम्पोस्ट खाद डालनी चाहिए. नत्रजन 100 किलोग्राम, स्फूर 60 किलोग्राम व पोटाश 60 किलोग्राम तथा सल्फर 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डालना चाहिए.

सिंचाई एवं खरपतवार नियंत्रण 

गांठों के अमुचित विकास के लिए भूमि में पर्याप्त मात्रा में नमी का होना अत्यंत आवश्यक है. लहसुन की फसल में पहली सिंचाई हल्की करे. सिंचाई तभी करे जब बीज अंकुरित हो. दूसरी सिंचाई मिट्टी में नमी के हिसाब से मसलन पहली सिंचाई के 15 दिन बाद करनी चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण के लिए पहली निराई-गुड़ाई खुरपी या हैंड हैरो द्वारा बोने के 20 से 25 दिन बाद करनी चाहिए और इसके बाद दूसरी निराई-गुड़ाई इसकी पहली के 20 से 25 दिन बाद करे इसके बाद निराई-गुड़ाई की आवश्यकता नही पड़ती है.

फसल कटाई (खुदाई) एवं उपज 

लहसुन के पौधों की गर्दन का नम होना, पत्तियों का नीचे तरफ मुड़ जाना, मुरझाना व बदरंग हो जाना, फसल पकने के लक्षण माना जाता है. इसके बाद उसकी खुदाई कर लेनी चाहिए. इसके बाद लहसुन की गांठों को 3 से 4 दिन तक छाया में सुखा लेना चाहिए. फिर 2 से 2.25 सेमी० छोड़कर पत्तियों को कंडों से अलग कर लेते है. भण्डारण करते समय कंडों को पतली तह में रखना चाहिए. और यह ध्यान रखे दर्श पर नमी बिलकुल न हो.

लहसुन की उपज उसकी जातियों, भूमि और फसल की देख-रेख पर निर्भर करती है. लहसुन की उचित देख-भाल से प्रति हेक्टेयर लगभग 100 से 200 कुंटल उपज प्राप्त हो जाती है.

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कीट एवं रोग प्रबन्धन  

प्रमुख कीट 

थ्रिप्स – लहसुन में लगने वाला कीट छोटे एवं पीले रंग का होता है. यह चितकबरा रंग का होता है. इससे ग्रसित पौधे के पत्तियां ऊपर से भूरी होकर एवं मुझाकर सूख जाती है.

रोकथाम – लहसुन के इस कीट की रोकथाम के लिए इमिडाक्लोरप्रिड 5 मिली० प्रति 15 लीटर पानी या थायेमेथाक्झाम 125 ग्राम प्रति हेक्टेयर + सेंडोविट 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करे.

शीर्ष छेदक कीट – लहसुन के इस कीट की मैंगट या लार्वी पत्तियों के आधार को खाते हुए शल्क कन्द के अन्दर प्रवेश कर सड़न पैदा कर फसल को नुकसान पहुंचती है.

रोकथाम – लहसुन के इस कीट की रोकथाम के लिए फसलचक्र अपनाना चाहिए. इसके अलावा फोरेट 1 से 1.5 ग्राम सक्रीय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में छिड़कर अच्छी तरह मिट्टी में मिला देना चाहिए.

प्रमुख रोग 

बैंगनी धब्बा – बैंगनी धब्बा रोग (पर्पिल ब्लाच) इस रोग के प्रभाव से प्रारंभ में लहसुन की पत्तियां पर और उर्ध्व तने पर सफ़ेद और अन्दर की तरफ धब्बे बन जाते है. जिससे इसका तना एव पत्तियां कमजोर हो जाती है और सूख कर गिर जाती है.

रोकथाम – इस रोग से बचाव के लिए मेन्कोजेब एवं कार्बेन्डाजिम 2.5 ग्राम दवा को मिलाकर प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करे. इसके अलावा मेन्कोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी या कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से कात्नाशी दवा का 15 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करना चाहिए.

झुलसा रोग – लहसुन के इस रोग की स्थिति में पत्तियों की ऊपरी भाग पर हल्के नारंगी रंग के धब्बे बन जाते है.

रोकथाम – इस रोग के रोकथाम के लिए मैंकोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी या कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से इस कवकनाशी दवा का छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर करवाना चाहिए.

निष्कर्ष  

किसान भाईयों उम्मीद है, गाँव किसान (Gaon Kisan) के लहसुन की खेती (Garlic Farming) से सम्बंधित इस लेख से आप सभी को पूरी जानकारी मिल पायी होगी.गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा लहसुन के फायदे से लेकर कीट एवं रोग प्रबन्धन तक की सभी जानकारियां दी गयी है. फिर भी लहसुन की खेती (Garlic Farming) से सम्बंधित आपका कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताये. महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द. 

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