पौधों में फ़ॉस्फोरस के कार्य एवं कमी के लक्षण | Functions of Phosphorus in Plants and Symptoms of Deficiency

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Phosphorus in Plants
पौधों में फ़ॉस्फोरस के कार्य एवं कमी के लक्षण

पौधों में फ़ॉस्फोरस के कार्य एवं कमी के लक्षण (Functions of Phosphorus in Plants and Symptoms of Deficiency)

पौधों के जीवन में ऊर्जा-उपाचय में फ़ॉस्फोरस (Phosphorus in Plants) की प्रमुख भूमिका रहती है. पौधे द्वारा ऋणायान रूप में अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में ग्रहण किये जाने वाले तीन तत्वों में फास्फोरस प्रमुख तत्व है. शेष दो तत्व है – नाइट्रोजन (नाइट्रेट) और गंधक (सल्फेट). इन तत्वों की भांति फास्फेट आयन का पुनः अवकरण पादप कोशिका में नही हो पाता. आज गाँव किसान के इस लेख में पौधे के लिए विकास के लिए फ़ॉस्फोरस के कार्यो एवं कमी होने पर क्या लक्षण होते है, जानने के लिए पूरा लेख पढ़े.

पौधे के विकास में फ़ॉस्फोरस के कार्य (Functions of Phosphorus in Plant Growth)

पौधे के समुचित विकास के लिए फ़ॉस्फोरस एक आवश्यक तत्व है. एडिनोसिन ट्राइफास्फेट का अंग होने के कारण यह समस्त पौधे की प्रजातियों की जीवित कोशिकाओं के सर्वत्र उपयोगी ऊर्जा भण्डार का अभिन्न अंग है.

फास्फोरस फास्फोलिपिड के अलावा शुगर फास्फेट, न्यूक्लियोटाइड और कोएंजाइम में भी पाया जाता है.

यह फाइटिक अम्ल, फाइटिन के रूप में बीजों में भंडारित रहता है.

फास्फोरस तमाम एंजाइम प्रक्रियों को नियंत्रित करता है. ए०ड़ी०पी० का ए०टी०पी० में फस्फोरिलीकरण इस तत्व की सांद्रता पर निर्भर करता है. कुछ एंजाइमों की क्रियाशीलता भी फास्फोरस की उपस्थिति में बढ़ जाती है. यह तत्व उपाचय तथा जैविक संश्लेषण-अभिक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह एन०ए०ड़ी० तथा अनेक फास्फोरिलीकृत यौगिको के संश्लेषण में आवश्यक समझा जाता है. यही कारन है कि फास्फोरस के आभाव में उपाचयन और विकास सम्बन्धी गड़बड़ियाँ उत्पन्न हो जाती है.

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फास्फोरस पौधों द्वारा मोलिब्डेट के अवशोषण को प्रोत्साहित करता है. रासायनिक द्रष्टि से ऐसा समझा जाता है कि ऐसा दोनों अयनों के बीच पास्परिक प्रतियोगिता के कारन होता है. इस प्रकार दो आयनों के बीच प्रतियोगिता के कारन एक आयन की गतिशीलता बढ़ जाती है. फासफोरस के अभाव से पौधों के क्लोरोप्लास्ट में असामान्यता आ जाती है.

फास्फोरस पौधों की जड़ों के विकास में सहायक होता है. यह पाश्र्वीय तथा तंतुमय (झकड़ा) दोनों ही प्रकार की जड़ों के विकास को प्रोत्साहित करता है. जिससे पौधों द्वारा पोषक तत्वों का शोषण अधिक होता है. इसके विपरीत फास्फोरस-अभावग्रस्त पौधों के जड़-तंत्र का विकास रुक जाता है. परिणामस्वरूप उनका पोषण-मंडल भी कट जाता है.

फास्फोरस की उचित पूर्ति दशा में अनाज वाली फसलों में दौजियों की संख्या में वृध्दि हो जाती है जिससे बालियों और दानों की संख्या भी बढ़ जाती है. जिसका सीधा प्रभाव उपज पर पड़ता है.

फास्फोरस दानों के निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण तत्व माना जाता है. यही करण है कि फास्फोरस के आभाव से फसलें देर से पकती है. फास्फोरस की कमी चारे वाली फसलों के गुणों पर कुप्रभाव पड़ता है. फास्फोरस ताने की शक्ति प्रदान करके फसलों को गिराने से बचाता है.

यह अनाज वाली फसलों में दाने-भूसे का अनुपात बढ़ा देता है. पौधों में रोग-प्रतिरोधिता उत्पन्न करने में सहायक होता है.

दलहनी फसलों में फास्फोरस के आभाव में नाइट्रोजन का भी आभाव होता है, क्योकि फास्फोरस की कमी होने पर पौधों की जड़-ग्रंथियों में पाए जाने वाले जीवाणुओं की क्रियाशीलता कम हो जाती है. जिससे नाइट्रोजन-यौगिकीकरण कम हो जाता है.

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पौधे में फास्फोरस के कमी के लक्षण (Symptoms of Phosphorus Deficiency in Plants)

पौधे की अनेक प्रजातियों में फास्फोरस के अभाव में पत्तियां गहरी हरी या नीली-हरी हो जाती है. पत्तियां की शिराओं के मध्य का भाग प्रायः लाल, बैंगनी या भूरे रंग का होता है. और अंत में पत्तियां झड जाती है. पौधों के साथ ही जड़ों की भी वृध्दि रुक जाती है. अत्यधिक कमी की स्थिति में पौधा बौना दिखाई देने लगता है.

फास्फोरस-अभावग्रस्त फलों का रंग भूरा-हरा, फल अत्यधिक मुलायम या गूदेदार स्वाद में खट्टे अधिक समय तक न टिकने वाले होते है.

फास्फोरस की कमी से न्यूता रोग (Nuta disease due to deficiency of phosphorus)

हँसिया-पत्ती रोग – पौधों की कुछ प्रजातियों में फास्फोरस की कमी के कारण पत्तियों की मुख्य शिरा छोड़कर शेष भाग में पर्णरहित (क्लोरोफिल) कम हो जाता है. तथा पत्तियां हंसिया या दराती की तरह बेडौल हो जाती है. पत्तियों का इस आकार में परिवर्तन होना सिकिल लीफ कहा जाता है.

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