Teosinto fodder crop | मकचरी चारा पशुओं के लिए है पौष्टिक | Makchari ki kheti

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Teosinto fodder crop
मकचरी चारा पशुओं के लिए है पौष्टिक

मकचरी चारा पशुओं के लिए है पौष्टिक (Teosinto fodder crop)

मकचरी या टियोसिंटो (Teosinto fodder crop) को भारत के कई राज्यों में चारे की फसल के रूप में उगाया जाता है. मक्का के लिए अनुकूल जलवायु और भूमि मकचरी के लिए उपयुक्त होती है. इसलिए सामान्यतया मक्का उगाने वाले किसान मकचरी भी उगाते है. आज गाँव किसान (Gaonkisan) के इस लेख में मकचरी चारा फसल (Teosinto fodder crop) की खेती की पूरी जानकारी मिलेगी.

पशुओं को मकचरी खिलने के फायदे (benefits of feeding Makchari)

मकचरी की चारा फसल 80 दिन में काटने लायक हो जाती है. इसके चारे में 1.2 प्रतिशत प्रोटीन, 2.3 प्रतिशत ईथर-निष्कर्ष, 19.6 प्रतिशत रेशा, 55.3 प्रतिशत नाइट्रोजन रहित निष्कर्ष, 75 प्रतिशत कुल कार्बोहाइड्रेट, 0.65 प्रतिशत चूना और 0.28 प्रतिशत फास्फोरस आदि पोषक तत्व पाए जाते है. जिसको खाने से पशुओं का समुचित विकास होता है. मकचरी सामान्यतया मक्का के चारे के समान और कुछ अधिक पौष्टिक होती है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र (Teosinto fodder crop)

मकचरी का वानस्पतिक नाम यूक्लेरा मेक्सिकाना (Euchlaera mexicana) है. यह मेयिडी (Mayideae) जाति का होता है. मकचरी का उत्पत्ति स्थान ग्वाटेमाला माना जाता है. लेकिन यह भारत, मध्य अमेरिका, फिलिपीन्स, इंडोनेशिया, जापान, बर्मा, आस्ट्रेलिया, कोलम्बिया और अर्जेन्टाइना में उगाई जाती है. भारत में इसे पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु आदि राज्यों में उगाई जाती है.

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जलवायु एवं भूमि 

इसकी खेती मक्का के समान जलवायु वाले भागों में की जाती है. यह प्रायः नवम्बर-दिसम्बर में चारा प्राप्त करने के लिए मकचरी को अगस्त-सितम्बर में बोया जाता है. ऐसा उन्ही स्थानों पर किया जाता है. जहाँ ठण्ड अधिक न पड़ती हो और पाले का प्रकोप बिलकुल न होता हो.

मकचरी की खेती के लिए दोमट या बलुई दोमट भूमि उपयुक्त रहती है. भूमि का पी० एच० मान 6.5 से 7.0 के मध्य होना चाहिए. मकचरी के लिए भूमि में जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए.मकचरी की फसल मक्का की फसल की अपेक्षा अधिक जलाक्रांत स्थितियों को सह लेती है.

उन्नत किस्में

मकचरी की उन्नत किस्मों में “इम्प्रूव्ड मकचरी” नामक किस्म उल्लेखनीय है. मकचरी की देशी या स्थानीय किस्में काफी प्रचलित है. उन्नत किस्म न मिलने पर देशी किस्मों में ही स्वस्थ और अच्छे बीजों को छांटकर बुवाई करनी चाहिए,

खेत तैयारी 

चारे की अच्छी वृध्दि के लिए मकचरी की खेती उपजाऊ भूमि में करनी चाहिए खेत की तैयारी इसके पहले उगाई गई फल पर निर्भर करती है. प्रायः 1 से 2 जुताई तथा 2 से 3 बार हैरों से जुताई करना लाभदायक होता है.

बुवाई कैसे करे 

गर्मियों में हरा चारा प्राप्त करने के लिए इसकी बुवाई मार्च-अप्रैल में करनी चाहिए. इसी प्रकार अक्टूबर या नवम्बर में भी हरे चारे की समस्या पाई जाती है. इसलिए अक्टूबर-नवम्बर में हर चारा पाने के लिए मकचरी की बोई गयी फसल से कम से कम चारे की दो कटाई लेना संभव है. परन्तु इस समय इसकी बढ़ोत्तरी बहुत कम होती है.

एक हेक्टेयर मकचरी की बुवाई के लिए 35 से 40 किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है. बुवाई प्रायः 25 से 30 सेमी० की दूरी पर लाइनों में करनी चाहिए. बुवाई के समय सफ़ेद बीजों को निकाल लेना चाहिए. क्योकि ये कच्चे बीज होते है. लाइनों में बुवाई करने के लिए कार्न प्लान्टर या सीड-ड्रिल का उपयोग करना चाहिए.

खाद एवं उर्वरक 

मकचरी (Makchari ki kheti) की अच्छी उपज के लिए 15 से 20 टन गोबर की सड़ी खाद तथा 60 किग्रा० नाइट्रोजन देना उपयुक्त होता है. इसके अलावा दो बार कटाई वाली फसल में 40 किलोग्राम नाइट्रोजन अतरिक्त डालना चाहिए. 20 किलोग्राम नाइट्रोजन बुवाई के 30 दिन बाद तथा 20 किलोग्राम नाइट्रोजन पहली कटाई के बाद फसल में डालने से उपज बढ़ जाती है. पोटाश एवं अन्य पोषक तत्व मिटटी की जाँच के बाद देना चाहिए. नाइट्रोजन के प्रयोग से अधिक कल्ले निकलते है. पौधे हरे रंग के और पत्तीदार होते है. तथा चारे की पौष्टिकता अधिक हो जाती है.

सिंचाई एवं जल निकासी

वर्षा कालीन फसल को सिंचाई की आवश्यकता नही पड़ती है. गर्मी में आवश्यकतानुसार 12 से 15 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिये. जुलाई के अंतिम सप्ताह या अगस्त में बोई गई फसल में वर्षा के बाद भी सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है. क्योकि यह फसल अक्टूबर-नवम्बर तक चलती है. इस समय 10 से 15 दिन के अंतर पर सिंचाई की अवश्यकता पड़ती है. गर्मी में इसकी बुवाई खेत पलेवा देकर करते है. अधिक बरसात होने पर खेत में जल निकासी की अच्छी व्यवस्था भी होनी चाहिए.

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फसल-सुरक्षा 

आरंभ में खरपतवार नियंत्रण की आवश्यकता पड़ती है. अच्छी वृध्दि और कल्लो की बढ़ोत्तरी के लिए खेत में कम-से कम एक बार निराई अवश्य करनी चाहिए. उन्नत विधियाँ अपनाने से मकचरी की चारे की फसल में रोग एवं कीट नही लगते है. विशेष अवस्थाओं में मक्के की फसल सुरक्षा सम्बन्धी उपायों को अपनाना चाहिए.

कटाई एवं प्रबन्धन

फरवारी के अंत में बोई गई फसल मई या जून के प्रथम सप्ताह में पहली चारा कटाई के लिए तैयार हो जाती है. इसकी दूसरी कटाई अगस्त तथा तीसरी कटाई मध्य नवम्बर तक की जा सकती है.

प्रत्येक कटाई के समय पौधों को कम से कम 6 से 10 सेमी० तक का निचला भाग खेत में छोड़ने से पौधों की पुनर्वृध्दि अच्छी और जल्दी होती है.

जून-जुलाई में बुवाई करने पर कटाई सितम्बर-अक्टूबर में की जा सकती है. इस फसल का ‘हे’ अच्छा नही बनता है. दाना निकलने के पश्चात् इसका तना कड़ा हो जाता है.

पोषक तत्वों की पर्याप्त मात्रा तथा अच्छी उपज के लिए पौधों को 1.75 से 2 मीटर की ऊंचाई के होने के बाद काटना चाहिए. इस प्रकार कम से कम दो बार कटाई की जा सकती है.

मकचरी के चारे की कुल उपज 600 से 700 कुंटल प्रति हेक्टेयर तक हो जाती है.

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