लहसुन के ये दो रोग फसल को पहुंचाते भारी है नुकसान, किसान भाई रहे सतर्क वर्ना उठाना पडेगा घाटा

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lahsun ke do rog
लहसुन के दो घातक रोगों से बचाव 

लहसुन के दो घातक रोगों से बचाव 

लहसुन संसार में उगाई जाने प्रमुख मसाला फसलों में से एक है. वही इसको उगाने के मामले में भारत का दूसरा का स्थान है. यह स्वास्थ्य वर्धक होने के साथ-साथ सब्जियों को स्वादिष्ट बनाने का कार्य करता है. इसलिए पूरे साल इसकी माग रहती है. जिससे इसकी कीमत भी अच्छी रहती है. जिससे किसानों को काफी लाभ भी मिलता है.

वैसे देखा जाय तो अन्य फसलों की अपेक्षा लहसुन की फसल में रोग एवं कीटों का कम ही प्रकोप होता है. लेकिन जिन स्थानों पर इसको बार-बार उगाया जाता है. वहां कई फफूंद जनित रोग पनप जाते है. जो इसकी फसल को बहुत नुकसान पहुंचता है. इनमे ये दो रोग प्रमुख है. जो किसानों की लहसुन की फसल को अधिक नुकसान पहुंचता है.आइये इनके बारे में विस्तार से जानते है –

लहसुन का झुलसा रोग

लहसुन की फसल में झुलसा रोग एक फफूंद जनित रोग है. जो कि स्टैमफाइलियम वैकेरियम नामक फफूंद द्वारा होता है. जनवरी-फरवरी के महीनों में यदि हल्की तेज वर्षा हो जाए तब यह रोग तेजी से फैल जाता है.

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लहसुन की फसल का यह रोग सर्वप्रथम निचले पत्तों पर हलके हरे रंग के लम्बूतरे धब्बे के रूप में देखे जाते है. फसल पर ज्यादा प्रकोप होने पर इन धब्बों का आकार बड़ा हो जाता है. तथा उनके बीच गहरे हरे रंग का फफूंद का पाउडर जैसा नजर आने लगता है. यदि अधिक फैल जाया तो पूरा खेत झुलासा सा दिखाई पड़ता है. साथ ही लहसुन के कन्द भी छोटे रह जाते है.

रोग की रोकथाम कैसे करे  

झुलसा रोग की रोकथाम के लिए किसान भाई रोग के लक्षण दिखाई पड़ते ही मैटालेक्सिल + मैन्कोजेब (250 ग्राम/100 लीटर पानी) का छिड़काव करना चाहिए.

दवाई के घोल में स्टीकर जरुर मिलाना चाहिए क्योकि लहसुन की पत्तियों पर दवा मुश्किल से ही चिपकती है. रोग की अधिकता होने पर 15 से 20 दिन के अंतराल पर पुनः छिडकाव करना चाहिए.

किसान है इस बात का ध्यान रखे रोगग्रस्त फसल के अवशेषों को खेत में या मेड में या गोबर के ढेर में यहं-वहां नही फेकना चाहिए. बल्कि इन अवशेषों को नष्ट कर देना चाहिए. जिससे फफूंद अगले साल तक जिन्दा न रहे. वही जिस खेत में अधिक रोग हो उसका बीज बिलकुल नही रखना चाहिए.

लहसुन का सफ़ेद गलन रोग

लहसुन की फसल का यह रोग भी एक फफूंद जनित रोग होता है. जो कि स्कलैरोशियम सेपिवोरम नामक फफूंद से फैलता है. जोकि एक मिट्टी व बीज जनित फफूंद होता है. जिन खेतों में कई वर्षो से लगातार लहसुन की खेती हो रही हो उसमें इसके उभरने की ज्यादा आशंका अधिक होती है. खेत में यह रोग यहाँ-वहां छोटी-छोटी घेरों के रूप में धीरे-धीरे फैलता है. शुरू में रोग ग्रस्त पौधों के ऊपरी भाग हल्का पीला हो जाता है. तथा बाद में सूख जाते है. यह रोगी पौधों को उखाड़ कर देखा जाय तो इनकी गठ्ठी पर तने तक सफ़ेद रंग की फफूंद की मोती परत जमी हुई नजर आती है. इसलिए इस रोग को सफ़ेद गलन नाम दिया गया है.

कुछ समय बाद सफ़ेद परत पर फफूंद के काले-काले दाने (स्क्लैरोशिया) धंसे हुए नजर आते है. इस रोग द्वारा पौधा पूरी तरह सूख या सड़ जाता है. तथा किसान भाइयों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है.

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रोग की रोकथाम कैसे करे किसान

इस रोग का उपचार मिट्टी में फफूंदनाशकों द्वारा करना काफी कठिन कार्य है. सबसे पहले रोग के लक्षण नजर आते ही उन पौधों को जड़ व गठ्ठी के साथ उखाड़कर जलाकर नष्ट कर दें. प्रकोपित खेत में बीज न ले. रोपाई से पहले बीज का उपचार मैन्कोजेब (250) + कार्बेन्डाजिम (100ग्राम) प्रति 100 लीटर पानी के घोल से लगभग 1 घंटे तक करना चाहिए. इसके लिए ट्राईकोडर्मा को 100 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद में मिलाएं. इसका ढेर बनाकर इस पर जूट की बोरी को पानी से गीला करके देखे. एक सप्ताह के भीतर गोबर में सफ़ेद व हरे-नील रंग की फफूंद उगी नजर आने लगेगी. इसके उपरांत गोबर को पुनः मिलाएं तथा खेत में डाले. इसमें थोडा सा गोबर बचाकर रख लेना चाहिए. जिसे दोबारा से अगले गोबर के ढेर में मिलाकर दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है.

किसान भी इसके अलावा खेत में सरसों की खली, नीम की खली आदि भी डाली जा सकती है. जोकि रोग को कम करने में सहायक होती है.

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