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Sapota cultivation in Hindi – चीकू की खेती कैसे करे ? (हिंदी में)

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Sapota cultivation in Hindi
चीकू की खेती (Sapota cultivation in Hindi) कैसे करे ?

चीकू की खेती (Sapota cultivation in Hindi) कैसे करे ?

नमस्कार किसान भाईयों, चीकू की खेती (Sapota cultivation in Hindi) देश में एक लोकप्रिय फल के रूप में की जाती है. इसकी खेती कम लागत में अधिक मुनाफे के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रही है. इसलिए पिछले कुछ वर्षों से इसकी खेती देश के अलग-अलग राज्यों में होने लगी है. इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख में चीकू की खेती (Sapota cultivation in Hindi) की पूरी जानकारी देगा वह भी अपने देश की भाषा हिंदी में. जिससे किसान भाई इसकी अच्छी उपज प्राप्त कर सके. तो आइये जानते है चीकू की खेती (Sapota cultivation in Hindi) की पूरी जानकारी-

Contents

चीकू के फायदे (Benefits of Sapota)

चीकू का फल खाने में बहुत ही स्वादिष्ट और मीठा होता है. इसका फल खाने में सुपाच्य भी होता है. इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, फाइबर, खनिज लवण, कैल्शियम और आयरन आदि तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते है. इसके सेवन से अतिसार, फोड़े सूखने, कमजोरी दूर करने, पित्त, सूजन कम, कैंसर, कब्ज, सर्दी-खांसी, वजन कम करने, त्वचा, गुर्दे की पथरी आदि रोग दूर होते है. इसके अलावा इसका उपयोग खाने में, जैम और जैली बनाने में भी किया जाता है.

चीकू की उत्पत्ति एवं क्षेत्र (Origin and scope of Sapota)

चीकू का वानस्पतिक नाम मैनिलकारा जपोटा (Manilkara zapota linn.) है. यह सैपोटेसी (Sapotaceae) कुछ का पौधा है. इसे अंग्रेजी में सैपोडिला (Sapodilla) भी कहा जाता है. इसकी उत्पत्ति मैक्सिको और मध्य अमेरिका माना जाता है. वही से इसे भारत लाया गया है. भारत में इसकी खेती आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तथा तमिलनाडु आदि राज्यों में की जाती है.

चीकू के लिए जलवायु एवं भूमि (Climate and land for Sapota)

चीकू की अच्छी उपज के लिए गर्म और नम मौसम की आवश्यकता होती है. इसके लिए 11 से 38 डिग्री सेल्सियस तापमान और 70 आर०एच० आर्द्रता वाली जलवायु सर्वोत्तम मानी जाती है. इस प्रकार की जलवायु में इसकी फसल वर्ष में दो बार ली जा सकती है. जबकि शुष्क जलवायु में, यह पूरे साल भर में केवल एक ही फसल देता है.

इसकी खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है. लेकिन इसकी अच्छी उपज के लिए गहरी उपजाऊ तथा बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम मानी जाती है. भूमि का पी०एच० मान 6 से 8 के बीच का होना चाहिए. भूमि से जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए.

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चीकू की उन्नत किस्में (Advanced varieties of Sapota)

देश में चीकू की लगभग 41 किस्मों की खेती की जाती है. जिसमें से क्रिकेट बाल, कालीपत्ती, भूरी पत्ती, पी०के०एम० 1, डी०एस०एच०-2, झुमकिया आदि किस्में सर्वोत्तम होती है. उत्तर भारत में इसकी बागवानी के लिए बारहमासी किस्में पसंद की जाती है.

काली पत्ती – फल अंडाकार, रसीले, सुगन्धित, मीठे, एक से चार बीज वाले होते है. फल गुच्छों में नही लगते है. शीत ऋतु में पकते है. यह अधिक पैदा देने वाली गुरात की किस्म है.

क्रिकेट बाल – यह किस्म बहुत बड़े आकार के गोलाकार फल, गूदा सख्त व दानेदार परन्तु मीठा होता है. यह अपेक्षाकृत कम उपज देने वाली किस्म है.

चीकू की प्रवर्धन विधि एवं समय (Sapota amplification method and timing)

चीकू का प्रवर्धन बीज, इनारचिंग, वायु लेयरिंग और सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग द्वारा किया जा सकता है. इसकी व्यावसायिक खेती के लिए इसे इनारचिंग द्वारा लगाते है. जिसके लिए खिरनी (रायन) मूल वृंत का उपयोग किया जाता है. क्योकि रायन पौधे की शक्ति, उत्पादकता और लम्बी उम्र वाला होता है. गमलों में तैयार पेन्सिल की मोटाई के दो वर्ष पुराने खिरनी मूलवृंत पौधों का उपयोग कलम बाँधने के लिए किया जाता है. इसकों लगाने के लिए दिसम्बर-जनवरी का महीना सबसे उपयुक्त होता है. पौधे खेत में रोपाई हेतु अगले वर्ष जून-जुलाई तक तैयार हो जाते है.

चीकू के पौध की रोपाई एवं समय (Planting and timing of Sapota plant)

चीकू के पौधे के रोपाई के लिए अप्रैल-मई महीने में 60 x 60 x 60 सेमी० आकार के गड्ढे खोद लेने चाहिए. और इन गड्ढों में 10 किलो गोबर की खाद, 3 किलो सिंगल सुपर फास्फेट और 1.5 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश और 10 ग्राम फोरेट धूल अथवा नीम की खली (1 किग्रा०) भरते है. गड्ढे भरने के एक महीने बाद मानसून के प्रारम्भ में (जुलाई) में पौधों की रोपाई कर देते है.

चीकू के पौधों की रोपाई की दूरी (Transplanting distance of Sapota plants)

चीकू के पौधों की अच्छी वृध्दि के लिए पौधे की दूरी उचित होनी चाहिए. इसके लिए पौधों से पौधे की दूरी 7.5 x 7.5 मीटर एवं पंक्ति से पंक्ति की दूरी 8 मीटर रखना उचित होता है. सघन घनत्व रोपण लिए 8 x 4 मीटर (312 पौधों/हेक्टेयर) दूरी पर रखते है.

चीकू के बाग़ में अंतर फसल (Difference crop in Chiku garden)

चीकू की बाग़ लगाने के 5 से 6 वर्ष तक सब्जी वाली फसले उगानी चाहिए. इसमें आप केला, टमाटर, बैंगन, गोभी, फूलगोभी, दलहनी और कद्दूवर्गीय आदि फसलें ली जा सकती है.

चीकू के लिए खाद एवं उर्वरक (Fertilizer and fertilizers for Chiku)

चीकू की अच्छी उपज के लिए खाद एवं उर्वरक की उचित मात्रा पौधों को देनी चाहिए. इसके लिए 50 किलो गोबर की सड़ी हुई खाद, 1000 ग्राम नाइट्रोजन, 500 ग्राम फास्फोरस और 500 ग्राम पोटाश की मात्रा प्रति वर्ष प्रति पौधा अवश्य देनी होती है. खाद को पेड़ के फैलाव की परिधि के नीचे 50 से 60 सेमी० चौड़ी व 15 सेमी० गहरी नाली बनाकर डालना लाभप्रद है. शुष्क क्षेत्रों में खाद वर्षा ऋतु के प्रारंभ में तथा अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में वर्षा ऋतु के अंत में देना लाभप्रद है.

चीकू की कटाई-छंटाई (Sapota Harvesting)

बीज से अंकुरित पौधे में कटाई-छंटाई की कोई जरुरत नही पड़ती है. लेकिन इनार्चिंग से तैयार किये गए पौधे को कटाई-छंटाई करके एक आकार में देनें की आवश्यकता होती है. पौधे की सूखी और रोग ग्रस्त शाखाओं को हटाने और पौधे को आकार देने के लिए पेड़ की हल्की कटाई-छंटाई की जाती है.

चीकू की सिंचाई (Sapota irrigation)

चीकू के पौधे लगाने के तुरंत बाद सिंचाई करनी चाहिए. इसके अलावा पौधा रोपाई के तीसरे या चौथे दिन भी दिन भी पौधों की सिंचाई कर देनी चाहिए. इसके बाद पौधों की 10 से 15 दिन के पश्चात सिंचाई करते रहना चाहिए. इसके अलावा जाड़ों के मौसम में 30 दिन के अंतराल पर सिंचाई की जानी चाहिए. तथा गर्मियों के मौसम में 15 दिन के अंतर पर सिंचाई की जानी चहिये. ड्रिप सिंचाई प्रणाली इसके लिए फायदेमंद होती है.

चीकू में फूल एवं फल आने का समय (Time for flowers and fruits in Sapota)

चीकू के पौधे में फरवरी से जून तथा सितम्बर से अक्टूबर तक फूल आते है. फूल लगने से फल पकने में लगभग 4 महीना का समय लग जाता है.

चीकू की तोड़ाई एवं प्रबन्धन (Weeding and Management of Sapota)

चीकू के फल परिपक्व होने पर उसका रंग हरे रंग से बदलकर हलके भूरे रंग का हो जाता है. और फल की त्वचा खरोचने पर पानी का रिसाव नही होता है. एक समान और जल्दी से पकने के लिए फलों का इथोफेन या इथ्रल रसायन के (1000 पीपीएम) घोल में डुबाकर 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तापक्रम पर रात भर के लिए रख देते है. इससे चीकू के फल जल्दी ख़राब नही होते है.

चीकू की उपज (Sapota produce)

चीकू का उत्पादन उसके प्रबन्धन पर निर्भर करता है. उचित प्रबन्धन से की गयी खेती में 15 से 20 टन फल प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो जाते है.

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चीकू में कीट एवं रोग प्रबन्धन (Pest and Disease Management in Sapota)

प्रमुख कीट एवं प्रबन्धन 

फल छेदक कीट – यह कीट चीकू के फलों को नुकसान पहुंचता है. यह फलों में छेद कर देता है. जिससे उनमे गोंद निकलने लगता है और वह सूख जाते है.

रोकथाम – इस कीट की रोकथाम के लिए क्यूनालफ़ॉस (0.05 प्रतिशत) या कार्बराइल 0.02 प्रतिशत का छिड़काव करवाना चाहिए.

मिली बग कीट – चीकू का यह कीट अग्रिम कलिकाओं पर और पत्तियों की सतह के नीचे सफ़ेद आटे का महीन चूर्ण दिखाई पड़ता है जिससे पत्तियां सूख जाती है.

रोकथाम – इस कीट की रोकथाम के लिए फेनथोइड 0.05 प्रतिशत या डाईमेक्रोंन की 30 मिली लीटर मात्रा 16 लीटर पानी में घोकर छिड़काव करवाना चाहिए.

प्रमुख रोग एवं प्रबंधन  

पत्ती धब्बा रोग – इस रोग से चीकू की पत्ती में कई छोटे, सफ़ेद केन्द्रों के साथ गुलाबी भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते है.

रोकथाम – इस रोग की रोकथाम के लिए इस रोग के लक्षण दिखाई पड़ने के 15 दिनों के अंतराल पर डाईथेन जेड-78 (0.2 प्रतिशत) का छिड़काव करवाना चाहिए.

सूटी मोल्ड – यह रोग कवक मिली बग द्वारा स्रावित मधु पर विकसित होता है. और धीरे-धीरे पूरी पत्ती पर फैल जाता है.

रोकथाम – इस रोग की रोकथाम के लिए स्टार्च/मैदा का छिड़काव किया जाता है. 100 ग्राम स्टार्च या मैदा लेकर 20 लीटर गरम पानी में घोल बनाते है. घोल ठंडा होने पर छिड़काव किया जाता है.

निष्कर्ष (The conclusion)

किसान भाईयों उम्मीद है गाँव किसान के चीकू की खेती (Sapota cultivation in Hindi) से सम्बंधित इस लेख से सभी जानकारियां मिल पायी होंगी. गाँव किसान द्वारा चीकू के फायदे से लेकर चीकू के कीट एवं रोग प्रबन्धन तक की सभी जानकारियां दी गयी है. फिर भी चीकू की खेती (Sapota cultivation in Hindi) से सम्बंधित आप का कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा गाँव किसान का यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताएं. महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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