Falsa farming in India | फालसा की खेती कैसे करे ? | Falsa ki kheti

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Falsa farming in India

Falsa farming in India | फालसा की खेती कैसे करे ?

फालसा  (falsa) देश के सबसे पुराने स्वदेशी फलों में से एक है. यह काफी पोषक फल है. इसकी मांग गर्मी के मौसम में अधिक रहती है. इसका ताजा और ठंठा पेय बहुत ही प्रचलित है.

इसके अलावा इसकी खेती में लागत बहुत कम और उपज अधिक होती है इसलिए आज गाँव किसान अपने इस लेख में फालसा की खेती (Falsa cultivation) की पूरी जानकारी देगा. जिससे किसान भाई इसकी खेती कर अच्छी उपज प्राप्त कर अधिक मुनाफा कमा सके.

तो आइये जानते है फालसा की खेती (Falsa Farming) की पूरी जानकारी, अपनी भाषा हिंदी में –

फालसा के फायदे (Benefits of Phalsa)

फालसा के पौधे के सभी भाग जड़, तना-टहनी, पत्ती एवं फल मानव तथा घरेलू पशुओं के लिए उअप्योगी साबित हुए है.

फालसा एक मूल्यवान फल है. जिसमें उच्च पोषण और औषधीय गुण होते है. इसके फल से रस और सीरप बनाया जाता है. जो एक ताजे और ठन्डे पेय के रूप में बहुत ही प्रसिध्द है.

इसके फलों के गूदे में फ्लेवोनॉइड्स, प्रोटीन और अमीनों अम्ल पाए जाते है जो पोषण के अच्छे स्रोत है.

फालसा के फल कैलोरी और वसा में कम होते है. लेकिन इसमें कई विटामिन, फाइबर और आवश्यक तत्व पाए जाते है.

फालसा के फलों को उच्च औषधीय मूल्यों के लिए जाना जाता है. क्योकि फल कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स और एंटीकैंसर गुणों के लिए जाने जाते है.

फालसा के फल और बीज में पोटेशियम, कैल्शियम, लोहा, फास्फोरस और सोडियम जैसे विभिन्न खनिजों में सम्रध्द होते है, जबकि जिंक, निकल, कोबाल्ट और क्रोमियम भी सूक्ष्म मात्रा में पाये जाते है.

फालसा के कच्चे फलों से सूजन कम करने, स्वास, ह्रदय, रक्त विकारों एवं बुखार के लिए लाभप्रद होता है.

इसके ताजे पत्ते ममेशियों के चारे के लिए काम में आते है.

इसकी छाल का उपयोग साबुन के विकल्प ले रूप में उपयोग किया जाता है.

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फालसा की उत्पत्ति एवं क्षेत्र (Origin and area of Phalsa)

फालसा का वैज्ञानिक नाम ग्रेविया एसियाटिका (Grewia asiatica) है. जो तिलासिया कुल का पौधा है. इसकी उत्पत्ति का स्थान भारत को माना गया है. विश्व में इसको भारत, पाकिस्तान, नेपाल, लाओस, थाइलैंड और कम्बोडिया में भी उगाया जाता हैं। ऑस्ट्रेलिया और फिलिपींस जैसे देशों में इसे खरपतवार माना जाता हैं.

भारत (Falsa farming in india) में इसकों पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और हिमालयी क्षेत्रो में व्यावसायिक रूप से उगाया जाता है. जबकि महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में छोटे स्तर पर उगाया जाता है.

फालसा के उपयुक्त जलवायु एवं मिट्टी (Suitable climate and soil for Phalsa)

फालसा की खेती (Falsa tree farming) के लिए उपोष्ण कटिबंधीय एवं उष्ण कटिबंधीय दोनों तरह की जलवायु उपयुक्त होती है. इसके लिए गर्म शुष्क एवं अर्ध शुष्क पारिस्थिकीय तंत्र के लिए बहुत ही उपयुक्त फसल है.

हालांकि फालसा की अच्छी उपज वाले क्षेत्र वह होते है जहाँ विशिष्ट गर्मी और सर्दियों का मौसम पाया जाता है. फलों के फकने, रंग के विकास और फलों की गुणवत्ता में सुधार के लिए पर्याप्त धूप और गर्म तापमान की आवश्यकता होती है.

फालसा को लगभग सभी प्रकार की भूमियों में उगाया जा सकता है. लेकिन पौधों के अच्छे विकास और अच्छी उपज के लिए बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है. भूमि से जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए.

फासला की उन्नत किस्में (Improved varieties of Fasla)

फालसा (Falsa tree) व्यवसायिक खेती के लिए कोई बेहतर किस्म उपलब्ध नही है. लेकिन कई वर्षों के कृषि वैज्ञानिक प्रयासों से दो किस्में विकसित की गयी है.

इन दोनों किस्मों में थार प्रगति एवं सी० आई० ए० एच०-1 प्रमुख है. यह किस्में बढ़िया गुणवत्ता वाली तथा कम पानी में अच्छी उपज देने में सक्षम है.

जिसमें थार किस्म अर्ध-शुष्क तथा  सी० आई० ए० एच०-1 शुष्क क्षेत्रों के लिए बहुत ही उपयुक्त साबित हुई है. इन किस्मों से वुवासयिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है.

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फालसा का पौध रोपण (Phalsa Planting)

फालसा के पौधों का रोपण जून-जुलाई महीने में मानसून के मौसम में किया जाता है. खेत में इसके पौधों को पंक्तियों में 3 X 2 मीटर या 3 X 1.5 मीटर (पंक्ति X पौधा) की दूरी पर करना चाहिए.

पौध रोपण के लिए एक से दो महीने पहले 60 X 60 X 60 सेमी० गहरे गड्ढे (मई-जून) गर्मियों में खोदकर उसमें अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिट्टी में मिलाकर भर देना चाहिए.

फालसा के पौधों की सिंचाई (Irrigation of Phalsa Plants)

फालसा के पौधे शुष्क और अर्ध शुष्क जलवायु के लिए अनुकूल होते है. इसलिए इसके पौधों को अधिक पानी की जरुरत नही पड़ती है. लेकिन अच्छी उपज के लिए सिंचाई की आवश्यकता होती है.

इसलिए गर्मी के मौसम में एक से दो हल्की सिंचाई की आवश्यकता होती है. जिससे पौधे गर्मी को सहन सके. इसके अलावा दिसम्बर और जनवरी माहीने में के पश्चात 15 दिन के अंतराल पर दो सिंचाई करनी चाहिए. जिससे पौधों में फुटान जल्दी और अच्छा हो सके.

पुष्पन और फलन के उपरांत तथा फल अच्छी तरह बन जाने पर मार्च-अप्रैल महीने में एक-एक सिंचाई करनी चहिये, जिससे फलों की गुणवता में अच्छी वृध्दि हो सके.

फासला के पौधों की कटाई एवं छटाई (Pruning and pruning of distance plants)

फालसा के पौधे के लिए कटाई एवं छटाई बहुत ही आवश्यक होती है. जिससे इसका पौधा एक झाड़ीनुमा आकार ले सके. क्योकि जितना यह झाड़ीनुमा होगा, उतने ही कल्ले (फ्रूटिंग शाखाएं) निकलेगे. जिससे उपज भी बढ़ जाएगी.

फालसा की उत्तर भारत में एक कटाई-छटाई एवं दक्षिण भारत में दो कटाई-छटाई करनी पड़ती है. इसके लिए पौधों को भूमि सतह से 15 से 20 सेमी० की उंचाई पर 15 से 20 जनवरी के आसपास प्रूनिंग करनी चाहिए.

दक्षिण भारत में में दो बार दिसम्बर और जनवरी में कटाई-छटाई करनी चाहिए. इससे ज्यादा से ज्यादा नये कल्ले निकलते है. जिससे फलों की गुणवत्ता भी बेहतर होती है. एवं उपज भी अधिक प्राप्त होता है.

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फालसा में खाद एवं उर्वरक प्रबंधन (Manure and Fertilizer Management in Phalsa) 

फालसा की खेती ज्यादा खाद एवं उर्वरक की आवशयकता नहीं पड़ती है. लेकिन मरुस्थलीय-रेतीली मिट्टी में गुणवत्तायुक्त उपज लेने के लिए खाद एवं उर्वरक की आवश्यकता पड़ती है.

पौधा लगे हुए खेत में उचित जीवांश तथा उर्वरा शक्ति बनाए रखने के लिए हर वर्ष गोबर की सड़ी हुई खाद जरुर देनी चाहिए.

पौधे के तीन वर्ष होने के पश्चात 10 किग्रा० सड़ी हुई गोबर की खाद के अलावा 100 ग्राम यूरिया, 50 ग्राम डाई अमोनियम फ़ॉस्फेट एवं 100 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति पौधा प्रति वर्ष देना चाहिए. इस मात्रा को दो बार में क महीने के अंतराल पर देते है.

फालसा में पुष्पन एवं फलन (Flowering and fruiting in Phalsa)

फालसा के पौधों की कटाई-छंटाई के उपरांत लगभग दो माह बाद इसमें फूल लगने लगते है. तथा 15 से 20 दिन में पूरी तरह से फूल खिल जाते है. इसके फूल पीले होते है. और गुच्छों में आते है.

पौधों की कटाई-छटाई के 90 से 100 दिनों के उपरांत अप्रैल महीने में इसमें फल पकना आरम्भ हो जाते है. जो पूरे मई महीने तक पकते रहते है.

फासला के फलों की तुड़ाई एवं विपणन (Harvesting and marketing of fruits of distance) 

फालसा के फलों (falsa fruit) की तुड़ाई अप्रैल के द्वितीय सप्ताह से (जब फल पकाना शुरू हो जाते है) मई के पूरे महीने तक चलती रहती है. इसके छोटे आकर के फल लाल से बैंगनी रंग के हो जाते है तब तुड़ाई के लिए एकदम उपयुक्त हो जाते है.

फालसा के पके फल स्वाद में थोड़ी खटास लिए मीठा होता है. फलों को तोड़कर टोकरी में रख लेना चाहिए. क्योकि इसके फल जल्दी खराब होने वाले होते है. इसके तोड़े गए फलों को 24 घंटे के अंदर ही उपभोग कर लेना चाहिए या बाजार में बेच देना चाहिए.

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अन्य पूछे जाने वाले प्रश्न (Other FAQ)

प्रश्न : फालसे का पेड़ कितना बड़ा होता है?
उत्तर : गर्मी के मौसम में मिलने वाला यह फल काफी फैला हुआ और झाड़ी युक्त छोटा पेड़ होता है. यह लगभग 8 मीटर लंबा होता है.
प्रश्न : फालसा का पेड़ कैसे लगाएं?
उत्तर : आमतौर पर, फालसा पौधों बीज द्वारा लगाया जाता है लेकिन पौधे को दृढ़ लकड़ी के कटाई के साथ-साथ लेयरिंग द्वारा आसानी से लगाया जा सकता है अंकुर रोपण से लगभग 12 से 15 महीने पहले अच्छी तरह से विकसित फलों की पहली फसल का उत्पादन करते हैं।
प्रश्न : फालसा कौन सा फल है?
उत्तर : फालसा फल का वैज्ञानिक नाम ग्रेविआ एशियाटिक है. इसमें विटामिन-सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. इसके अलावा इस फल में मैग्नीशियम, पोटैशियम, सोडियम, फॉस्फोरस, कैल्शियम, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और आयरन भी पाया जाता है.
प्रश्न : फालसा कहाँ पाया जाता है?
उत्तर : ऐसी मान्यता है कि फालसा भारत का स्वदेशी फल है। हालांकि इसे नेपाल, पाकिस्तान, लाओस, थाइलैंड और कम्बोडिया में भी उगाया जाता है।
प्रश्न : फलसा फ्रूट को हिंदी में क्या कहते हैं?
उत्तर : फालसा, 2. भीमल। फालसा (Grewia asiatica Linn.)

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