Pea Farming – मटर की खेती की पूरी जानकारी अपनी भाषा हिंदी में

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Pea Farming
मटर की खेती (Pea Farming) की पूरी जानकारी 

मटर की खेती (Pea Farming) की पूरी जानकारी 

नमस्कार किसान दोस्तों, मटर देश की एक प्रमुख दलहनी फसल है.इसकी खेती देश के विभिन्न राज्यों में की जाती है.आज गाँव किसान (Gaon Kisan) के इस लेख के द्वारा मटर की खेती (Pea Farming) की पूरी जानकारी दी जायगी वह भी अपनी भाषा हिंदी में.जिससे किसान भाई इसकी खेती कर अधिक उपज के साथ अधिक मुनाफा भी कमा सके.तो आइये जाने मटर की खेती (Pea Farming) की पूरी जानकारी-

मटर के फायदे 

मटर से विभिन्न प्रकार के शाकाहारी भोजन बनाये जाते है.इसे मुख्य रूप से दाल और सब्जी के रूप में उपयोग करते है.इसके अलावा इसकी खेती पशु चारे के लिए भी की जाती है.इससे लगभग 25 कुंटल प्रति हेक्टेयर की दर से पौधे के अवशेष प्राप्त (Plants residue) होते है.जिसे पशु आहार के रूप में उपयोग किया जाता है.इसमें 22.5 प्रतिशत प्रोटीन, 62 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 1.8 प्रतिशत वसा होता है. इसके अलावा 64 मि० ग्रा० कैल्सियम, 4.8 मि० ग्रा० लोहा प्रति 100 ग्राम मटर में पाया जाता है.इसमें कुछ औषधीय गुण जैसे पोलिफिनोल (Polyphenol) पाए जाते है.जो पेट जनित कैंसर से बचाव करता है.इसमें अधिक मात्रा में प्रोटीन और रेशा होता है.जो मधुमेह रोगियों (डाईबेटिक टाइप-2) में चीनी के पचने की क्रिया में अवरोध पैदाकर इसकों नियंत्रण करने में सहयोग करता है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

मटर की उत्पत्ति को लेकर कई क्षेत्रों में संभावनाएं व्यक्त की गयी है इनमें से दक्षिणी-पश्चिम एशिया, उत्तरी-पश्चिम भारत, पकिस्तान, पूर्वी रूस के सटे भूभाग पर और अफगानिस्तान जहाँ से यूरोप के क्षेत्र में हुई है. भारत में इसकी खेती उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, पंजाब, आसाम, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, बिहार, तथा उड़ीसा आदि राज्यों में की जाती है.

उपयुक्त मिट्टी एवं जलवायु 

कम अवधि में तैयार होने वाली मटर के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है.इसके अलावा केवाल मिट्टी या सिल्ट दोमट मिट्टी में भी इसकी खेती की जा सकती है.खेत से पानी के निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए.

मटर के अच्छे वानस्पतिक विकास एवं प्रजनन के लिए दिन के समय 21 डिग्री सेल्सियस से लेकर 16 डिग्री सेल्सियस तक और रात का 16 डिग्री सेल्सियस से 10 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान उचित रहता है.27 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पौधों के विकास में अवरोधक होता है.तथा परागण की क्रिया को विपरीत रूप से प्रभावित करता है.

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खेत की तैयारी 

खेत में खरीफ की फसलों की कटाई के बाद बिना देरी किये खेत की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए.पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए.इसके बाद 2 से 3 जुताई कल्टीवेटर से करके पाटा लगाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए.जिससे खेत में जल का निकास सही से हो और खेत में पानी जमा नही हो पाए.

उन्नत किस्में 

किस्में  बुवाई का समय  पकने की अवधि (दिनों में) औसत उपज (कु० प्रति हे०) अभियुक्ति 
रचना 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर 135 से 140 दिन 20 से 25 लंबा पौधा, पाउडरी मिल्ड्यू रोग रोधी
अपर्णा 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर 125 से 130 दिन 20 से 25 बौनी किस्म पाउडरी मिल्ड्यू रोग रोधी
मालवीय मटर 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर 125 से 130 दिन 20 से 25 बौनी किस्म रोग पाउडरी मिल्ड्यू अवरोधी
पूसा प्रभात 15 अक्टूबर से 30 नवम्बर 60 से 70 दिन (हरी फली) 100 से 105 दिन दाना के लिए 60 से 65 कु० (हरी फली) 12 से 15 कु० दाना मध्यम अवधि

बीज दर 

मटर की बुवाई के लिए 75 से 80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की जरुरत होती है.वही पूसा प्रभात के बीज दर 95 से 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है.

बीजोपचार 

मटर की बुवाई से पूर्व बीज को 24 घंटे पूर्व 2.5 ग्राम फफूंदी नाशकदवा थीरम अथवा कैप्टान से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित करना चाहिए.उकठा रोग के लिए ट्राईकोडर्मा से बीज को उपचारित करे.

बोने की दूरी

मटर की बुवाई पंक्ति विधि से करने से अच्छी उपज होती है.बुवाई में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेमी० तथा पौध से पौधे की दूरी 10 सेमी० रखना चाहिए.

उर्वरक प्रबन्धन 

मटर की अच्छी उपज के लिए उर्वरक की उचित मात्रा खेत में देना आवश्यक है.इसलिए 20 किलोग्राम नत्रजन, 40 से 50 किलोग्राम स्फूर (100 किलोग्राम डी० ए० पी०) प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए.उर्वरकों की पूरी मात्रा बुवाई के पूर्व अंतिम जुताई के समय एक सामान रूप से खेत में मिला देना चाहिए.

निराई-गुड़ाई एवं खरपतवार प्रबन्धन 

मटर में दो बार निराई-गुड़ाई की आवशयकता पड़ती है.प्रथम निराई-गुड़ाई बुवाई के 25 से 30 दिनों बाद करनी चाहिए.दूसरी निराई-गुड़ाई 40 से 45 दिनों बाद करनी चाहिए.यदि खेत में खरपतवार की मात्रा अधिक है तो इसका नियंत्रण रासायनिक विधि से करना चाहिए.इसके लिए पेंडीमिथालिन 30 ई० सी० की 3 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के उपरान्त अंकुरण पूर्व छिड़काव करना चाहिए.

सिंचाई प्रबन्धन 

मटर की अच्छी उपज के लिए फूल आने से पूर्व एवं फली बनने के समय खेत में पर्याप्त मात्रा में नमी का होना आवश्यक है.नमी होने की दशा में 2 से 3 हल्की सिंचाई कर देना चाहिए.

मिश्रित खेती

मटर की खेती में सरसों, तीसी एवं मक्का के साथ मिश्रित कर कर सकते है.

कीट एवं व्याधि प्रबंधन

क्र०सं० फसल का नाम  कीट व्याधि रोग का नाम  कीट व्याधियां/रोग के कारक  लक्षण  प्रबन्धन 
1. मटर (Pea) मटर फली छेदक (pea pod borer) इटिएला जिन्किनेला (Etiella zinnkenella) शिशु फलियों को क्षतिग्रस्त करती है. फली के अन्दर पहुंचकर यह पहले हाईलम भाग को खाती है. फिर दाल के भाग को खाती है. जिसमें मल भी भरा रहता है. बाद में फली चिपचिपा होकर सड़ने लगती है. इस कीट की रोकथाम के लिए डायमेथो 0.02 प्रतिशत या कार्बारिल 0.1 प्रतिशत को 2 से 3 सप्ताह के अंतराल पर छिड़काव कारन चाहिए.
चूर्णी असिता या बुकनी रोग (Powdery mildew) इरिसिफी पोलीगोनी (Erysiphe polygoni) पत्तियों की ऊपरी सतह पीली तथा निचली सतह पर सफ़ेद चूर्ण दिखाई पड़ता है. घुलनशील गंधक (0.3 प्रतिशत) का 2 से 3 छिड़काव करना लाभकारी है. मैंकोजेब (0.2 प्रतिशत) का 2 से 3 छिड़काव करना चाहिए.

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कटाई, दौनी एवं भण्डारण

हरी फलियों की तुड़ाई 60 से 65 दिनों बाद शुरू हो जाती है.बीज हेतू मटर के पौधे पूर्ण रूप से सूख जाय इसके लिए पौधों को धूप में अच्छी तरह सुखाकर ही दौनी करनी चाहिए एवं दानों को धूप में सुखाकर ही भंडारित करना चाहिए.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों, उम्मीद है गाँव किसान (Gaon Kisan) के इस लेख से आप सभी को मटर की खेती (Pea Farming) की पूरी जानकारी मिल पायी होगी.गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा मटर के फायदे से लेकर मटर के कटाई, दौनी एवं भंडारण तक की सभी जानकारी दी गयी है.किसान भाईयों फिर भी मटर की खेती (Pea Farming)से सम्बंधित कोई प्रश्न हो कमेन्ट बाक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है, साथ ही यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट करके जरुर बताये.महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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