Grapes farming – अंगूर की खेती कैसे करे ? (हिंदी में)

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Grapes farming
अंगूर की खेती (Grapes farming) कैसे करे ?

अंगूर की खेती (Grapes farming) कैसे करे ?

नमस्कार किसान भाईयों, अंगूर की खेती (Grapes farming) विश्व के अधिकतर देशों में बहुत बड़े पैमाने पर की जाती है. यह एक जल्दी तैयार होने वाला फल है. इस फल की खेती करके अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है. गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख में अंगूर की खेती (Grapes farming) की पूरी जानकारी देगा, वह भी अपनी भाषा हिंदी में. जिससे किसान भाई इसकी अच्छी उपज पा सके. तो आइये जानते है अंगूर की खेती (Grapes farming) की पूरी जानकारी-

अंगूर के फायदे 

अंगूर के फलों में मुख्य रूप से ग्लूकोस शर्करा होती है. इसके अलावा इसमें कार्बनिक अम्ल भी होते है. ग्लूकोस के अतरिक्त यह फक्टोस का भी अच्छा स्रोत होता है. अम्लों में टारटेनिक और मलिक अम्ल प्रमुख रूप से पाए जाते है. शक्कर और कार्बनिक अम्लों के कारण ही अंगूर खट्टे-मीठे लगते है. अंगूर में अमीनों अम्ल, विटामिन, लवण और ऑक्सीकरण-रोधी एन्थ्रोसाइनिन भी पाया जाता है. यही कारण है अंगूर एक श्रेष्ठ फल और पोषक पदार्थ है.

दुनिया भर में उत्पादित लगभग 80 प्रतिशत अंगूर का उपयोग तो वाइन नामक शराब बनाने में किया जाता है. शेष 10 प्रतिशत ताजे फल के रूप में खाए जाते है और बाकी सुखाकर ड्राई फ्रूट्स के रूप में किया जाता है.

अंगूर एक फल होने साथ-साथ यह एक औषधि भी है. यह खाने में स्वादिष्ट होने के साथ ऊर्जा से भरपूर होता है. अंगूर के पत्ते भी औषधीय गुणों की खान है. इसकी पत्तियों में स्रावरोधी और सूजनरोधी गुण होते है. इसमें टेनिन क्वेरसीटिन टारटेट, इनसीटोल, कोलीन और कैरोटीन प्रचुरता से मिलते है.

अंगूर की छाल का सत आँखों की बीमारियों के उपचार के काम में आता है. जिन लोगो का लीवर कमजोर होता है. या जिनकी पित्त निर्माण की प्रक्रिया धीमी होती है. उन्हें भोजन के रूप में अंगूर खाने की सलाह दी जाती है. प्रसिध्द टॉनिक च्वनप्राश में भी अंगूर एक घटक के रूप में डाला जाता है. कुल मिलाकर यह एक श्रेष्ठ फल है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

अंगूर का वैज्ञानिक नाम वायटिक वाइनीफेरा है. यह वायटेसी कुल का पौधा है. इसकी लगभग 12,000 प्रजातियाँ पायी जाती है. इसमें से अधिकांश उत्तरी अमेरिका की देशज है. विश्व में अंगूर संयुक्त राज्य अमेरिका, इटली, फ्रांस, स्पेन, टर्की, अर्जेंटिना, चीन, ईरान व आस्ट्रेलिया आदि देशों में प्रमुख रूप से उगाया जाता है.

भारत में अंगूर की खेती दो तरह की जलवायु में अलग-अलग की जाती है. अंगूर की अधिकांश व्यासायिक खेती लगभग 85 प्रतिशत उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रो में जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, और तमिलनाडु आदि राज्यों में की जाती है. इसके अलावा उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले उत्तरी राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तथा दिल्ली व राजस्थान आदि में की जाती है. जिससे जून माह में अंगूर मिलते है.

जलवायु एवं भूमि (Grapes farming)

अंगूर की अच्छी उपज के लिए शुष्क एवं वर्षा रहित गर्मी तथा अति ठण्ड वाले सर्दी मौसम की जरुरत होती है. फलों के पकने के वक्त मई-जून में बारिश इसकी उपज के लिए हानिकारक होती है. इससे फलों में मिठास की कमी हो जाती है. और इसके फल चटक जाते है.

अंगूर की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सर्वोताम होती है. इसके अलावा मिट्टी में भरपूर मात्रा में जीवांश इसके उत्पादन को बढ़ा देते है. भूमि का पी० एच० मान 6.5 से 8.0 तक का उचित होता है. भूमि से जल निकास का उचित प्रबंध होना आवश्यक है.

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उन्नत किस्में (Grapes farming)

विश्व में अंगूर की लगभग 12,000 किस्में पायी जाती है. भारत में भी अंगूर की लगभग 1,500 किस्में पायी जाती है. लेकिन व्यवसायिक स्तर पर केवल 15 से 20 किस्में ही उगाई जाती है. जो निम्नवत है-

  • अनाव-ए-शाही, बेंगलौर ब्ल्यू, भोकरी, चीमा साहिब, परलेट, ब्यूटी सीडलेस, पूसा सीडलेस, किशमिश बेली, किशमिश चरनी, गोल्ड, अर्ली मस्कट, कार्डिनल, गुलाबी, डिलाईट, अरकावती, अर्काश्याम, अर्काहंस, अर्का कंचन, पूसा उर्वशी एवं पूसा नवरंग आदि है.

पूसा नवरंग – अंगूर की यह किस्म जून के प्रथम या दूसरे सप्ताह में पककर तैयार हो जाती है. दानों में बीज पाए जाते है. अंगूर के गुच्छो का वजन 180 से 250 ग्राम तक होता है. इनका रंग गहरे काले बैंगनी राग का होता है. यह किस्म जूस एवं रंगीन मदिरा के लिए उपयुक्त होती है.

पूसा सीडलेस – अंगूर की यह किस्म जून के तीसरे सप्ताह में पककर तैयार हो जाती है. इसके गुच्छे मध्यम से लम्बे आकार के गठीले होते है. दाने बीज रहित और हरापन लिए होते है. इसका गूदा मीठा और मुलायम होता है.

ब्यूटी सीडलेस – अंगूर की यह किस्म संयुक्त राज्य अमेरिका से लायी गयी है. यह जून के प्रथम सप्ताह में पककर तैयार हो जाती है. इसके गुच्छे छोटे शंक्वाकार व मध्यम आकर के होते है. इसके फलों का गूदा मुलायम और हल्का सा अम्लीय होता है.

खेत की तैयारी (Grapes farming)

अंगूर की अच्छी उपज के लिए खेत को दो से तीन बार अच्छी तरह जुताई कर पाटा चला देते है. जिससे मिट्टी अच्छी प्रकार भुरभुरी और समतल बन जाय . इसके अलावा खेत से खरपतवार जुताई से पहले ही साफ़ कर लेना चाहिए.

प्रवर्धन विधि (Grapes farming)

अंगूर की किस्मों का प्रवर्धन कलम विधि द्वारा किया जाता है. जिसका प्रवर्धन तने में किया जाता है. कलम जनवरी व जुलाई माह में लगानी चाहिए. इसमें पौधे की जो शाखाएं पेन्सिल की आकार की मोटी हो, लम्बाई 20 से 25 सेमी०, जिसमें 3 से 4 स्वस्थ गाठे हो उपयुक्त होती है.

पौधा लगाने का समय व दूरी 

अंगूर का पौधा लगाने सबसे उचित समय जनवरी, अक्टूबर-नवम्बर व मार्च-अप्रैल होता है. अंगूर के पौधे की रोपाई 3 x 3 मीटर रखनी उचित रहती है.

नवम्बर-दिस्मबर के दौरान 75 सेमी० x 75 सेमी० आकार के गड्ढे खोदकर उसमें 10 किलो गोबर की खाद और 1 किलों नीम की खली को मिट्टी के साथ 1:1 में मिला देना चाहिए.

सधाई एवं काट-छांट 

अंगूर की कम वृध्दि वाली किस्मों को शीर्ष, निफिन या टेलीफोन विधि से और अति वृध्दि वाली किस्मों को पंडाल विधि से सधाई करते है. उत्तर भारत में छंटाई जनवरी महींने में करते है. दक्षिण भारत में छंटाई अप्रैल और अक्टूबर में करते है.

खाद एवं उर्वरक (Grapes farming)

अंगूर की अच्छी उपज के लिए खाद एवं उर्वरक का प्रयोग सर्वोत्तम होता है. दक्षिण भारत में 1000 से 1200 किग्रा० नाइट्रोजन, 750 से 875 किग्रा० फ़ॉस्फोरस, 800 से 1000 किग्रा० पोटाश प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष देनी चाहिए. इसके अलावा गोबर की खाद 75 किग्रा० प्रति पेड़ डालनी चाहिए.

उत्तर भारत में 125 से 250 किग्रा० नाइट्रोजन, 62.5 से 125 किग्रा० फ़ॉस्फोरस तथा 250 से 375 किग्रा० पोटाश प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष डालना चाहिए.

सिंचाई (Grapes farming)

नए पौधे की रोपाई के बाद पानी देना आवश्यक होता है. खाद एवं उर्वरक देने के पश्चात भी पानी देना आवश्यक होता है. गर्मी के मौसम में 10 से 15 दिन के अंतर पर पानी देना आवश्यक होता है. टपक विधि से सिंचाई करने से अच्छे परिणाम प्राप्त होते है.

फूल तथा फल आने का समय

उत्तर भारत में अंगूर की फसल में मार्च-अप्रैल में फूल आते है. तथा जून-जुलाई में फल पकते है. वही दक्षिण भारत में अक्टूबर-नवम्बर तथा मार्च-अप्रैल में फल आते है.

फलों की तुड़ाई 

फलों की तुड़ाई तभी करनी चाहिए जब फल पूरी तरह से बेल पर ही पक जाय. टुडे के उपरांत फलों के रखरखाव का तुरंत ही प्रबन्धन करना चाहिए. क्योकि यह जल्द ही ख़राब हो जाते है.

इसके लिए गुच्छों को कैची से काटकर सावधानीपूर्वक टोकरी में रखना चाहिए. इसके बाद सड़े-गले, दूषित अंगूरों को काटकर अलग कर देना चाहिए. अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए कम तापमान 15 से 20 डिग्री सेल्सियस में रखा जा सकता है. तोड़ाई के बाद अंगूर को शीघ्र ही स्थानीय मंडी में जाकर बेच देना चाहिए.

उपज 

अंगूर की अच्छी फसल से 20 से 25 टन उपज प्रति हेक्टेयर तक हो जाती है.

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कीट एवं रोग प्रबन्धन 

प्रमुख रोग एवं रोकथाम 

अंगूर की फसल में तीन रोग प्रमुख रूप से प्रभावित करते है जो निम्नवत है-

डाउनी मिल्ड्यू – अंगूर का यह रोग पत्ती निकलने की अवस्था से फल बनने तक काफी नुकसान पहुंचता है. जिससे उपज प्रभावित होती है.

रोकथाम – इसकी रोकथाम के लिए फफूंद रोधी रसायन का छिड़काव करना चाहिये. जब शाखों में 3 से 5 या 7 पत्ती निकल आयें..

पाउडरी मिल्ड्यू – यह रोग पत्ती और शाखों में होता है. इस रोग का समय से ही उपचार करना चाहिए नही तो फलों की बाजार में कीमत कम हो जाती है.

रोकथाम – इस रोग के लक्षण नजर आते ही फफूंद नाशी का तुरंत की छिड़काव करना चाहिए.

एन्थ्रोक्नोज – यह बीमारी नए अंकुर, नई पत्तियों तथा फूलों एवं नए पूर्ण विकसित फलों में होती है.

रोकथाम – इसके लिए किसी अच्छी फफूंद नाशी द्वारा नए अंकुरों का बचाव करना चाहिए. फफूंद रोधी छिड़काव के पूर्व संक्रमित तनों की छंटाई करनी चाहिए.

प्रमुख कीट एवं रोकथाम 

मिली बग – निर्यात किये जाने वाले अंगूरों में मिली बग एक गंभीर समस्या है. क्योकि पके हुए अंगूरों को यह काफी नुकसान पहुंचाते है. और निर्यात के लिए अनुपयुक्त बना देते है.

रोकथाम – इसकी रोकथाम के लिए सितम्बर महीने में इसकी सूखी छाल पर हाथो से छिपकने वाला पदार्थ लेप लगाना चाहिए. अधिक प्रकोप होने पर कीटनाशी का छिड़काव करना चाहिए.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है किसान (Gaon Kisan) के अंगूर की खेती (Grapes farming)से सम्बंधित लेख से सभी जानकारियां मिल पायी होंगी. किसान (Gaon Kisan) द्वारा अंगूर के फायदे से लेकर अंगूर के कीट एवं रोग प्रबन्धन तक की सभी जानकारियां दी गयी है. फिर भी अंगूर की खेती (Grapes farming) से सम्बंधित कोई प्रश्न हो तो कम्नेट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताये, महान कृपा होगी.

[भारतीय अंगूर प्रसंस्करण बोर्ड के बारे में जानने के लिए यह क्लिक करे]

आप सभी लोगो का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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