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Date farming – खजूर की खेती की पूरी जानकारी (हिंदी में)

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खजूर की खेती (Date farming) की पूरी जानकारी

खजूर की खेती (Date farming) की पूरी जानकारी

नमस्कार किसान भाईयों, खजूर की खेती (Date farming) मानव सभ्यता द्वारा की जाने वाली फलों की खेती में से एक है. व्यावसायिक तरीके से इसे उगाकर अच्छा लाभ कमाया जा सकता है. गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख के जरिये खजूर की खेती (Date farming) से सम्बन्धित पूरी जानकारी अपने देश की भाषा हिंदी में देगा. जिससे किसान भाई इसे उगाकर अच्छी उपज प्राप्त कर सके. तो आइये जानते है खजूर की खेती (Date farming) की पूरी जानकारी-

खजूर के फायदे 

खजूर के फल काफी पौष्टिक होते है. यह उच्च पोषक गुणवत्तायुक्त खाद्य पदार्थ का अच्छा स्रोत है. इसमें अन्य फलों एवं भोज्य पदार्थों की तुलना में अधिक कैलोरी पायी जाती है. इसके अलावा इसमें 70 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है. इसकी अधिकांश प्रजातियों में शर्करा ग्लूकोज व फ्रक्टोज के रूप में पायी जाती है. इसके सेवन से खून की कमी व अंधेपन जैसी बीमारियाँ नही होती है. खजूर से विभिन्न तरह के उत्पाद जैसे चटनी, आचार, जैम, जूस और अन्य बेकरी उत्पाद बनाने के लिए भी प्रयोग किया जाता है.

खजूर के फलों के गूदें में लगभग 20 प्रतिशत नमी के अलावा 60 से 64 प्रतिशत शर्करा, लगभग 2.5 प्रतिशत रेशा, 2 प्रतिशत प्रोटीन, 2 प्रतिशत से कम वसा, 2 प्रतिशत से खनिज तत्व (लोहा, पोटेशियम, कैल्सियम, तांबा, मैग्नीशियम, क्लोरीन, गंधक, फ़ॉस्फोरस आदि) तथा 2 प्रतिशत से कम पेक्टिक पदार्थ पाए जाते है. इसमें विटामिन-ए, विटामिन-बी, और विटामिन बी-2 भी पाया जाता है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

खजूर शुष्क जलवायु में उगाया जाने वाला फलदार वृक्ष है. इसका वानस्पतिक नाम फीनिक्स डेक्टीलीफेरा है. यह पाल्मेसी कुल का पौधा है. विद्वानों में मतानुसार इसकी उत्पत्ति फारस की खाड़ी में समझी जाती है. दक्षिणी ईराक (मेसोपोटामिया) में इसकी खेती ईसा से 4000 वर्ष पूर्व प्रचलित थी. इसकी व्यावसायिक खेती सर्वप्रथम ईराक में ही शुरू हुई थी.

विश्व में सर्वाधिक खजूर उत्पादक देशों में ईराक, सऊदी अरब, ईरान, मिस्र, लीबिया, पाकिस्तान, मोरक्कों, ट्यूनीशिया, सूडान, संयुक्त राज्य अमेरिका व स्पेन प्रमुख है. भारत में इसकी खेती पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात आदि राज्यों में की जाती है.

जलवायु एवं भूमि (Date farming)

खजूर की अच्छी उपज के लिए शुष्क एवं अर्ध्द शुष्क क्षेत्र जहाँ लम्बी गर्म हवाएं व अधिकतम गर्मी, कम वर्षा व कम आर्द्रता हो उपयुक्त होती है. फूल आते समय तेज हवा परगन को नुकसान पहुंचा सकती है. लेकिन खजूर के फूलों एवं फलों के अच्छे विकास के लिए गर्म एवं शुष्क जलवायु आवश्यक है. इसके पौधे को गर्मी में 50 डिग्री सर्दी के मौसम में माइनस 5 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान को सहन करने की क्षमता होती है. 

खजूर की सर्वोत्तम खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे अधिक उपयुक्त होती है. इसके अलावा ऐसी लवणीय भूमि जिसका पी० एच० मान 8 से 9 के बीच तक हो इसकी खेती के लिए उपयुक्त होती है. भूमि से जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए.

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उन्नत किस्में (Date farming)

भारत में ज्यादातर उगाई जाने वाली खजूर की किस्मों को अरब से लाया गया है. अरब देशों में खजूर की 1000 से ज्यादा किस्में पायी जाती है. लेकिन इसमें से कुछ ही ऐसी किस्में है जिनकों व्यवसायिक तौर खेती की जाती है. खजूर की खेती के लिए कुछ उन्नत किस्में निम्नवत है-

बरही – खजूर की यह किस्म अधिक उपज देने वाली है. इस किस्म के फल मध्यम आकर के व डोका अवस्था में सुनहले पीले रंग के होते है. और खाने में फल मीठे, स्वादिष्ट और मुलायम होते है. इसके फल का वजन 13.6 ग्राम तथा इसमें घुलनशील ठोस पदार्थ 31.5 प्रतिशत तक पाया जाता है. यह मध्यम देर से पकने वाली किस्म है. इसकी औसत उपज 100 से 150 किलोग्राम प्रति पौधा है.

जामली – खजूर की यह किस्म देर से पकने वाली है. लेकिन इसकी पेदवाल अधिक है. इसके फलों का रंग पीला सुनहरा है. पूर्ण डोका अवस्था में फल खाने में मीठे और मुलायम होते है. इसमें घुलनशील ठोस पदार्थ 32 प्रतिशत पाया जाता है. इसकी औसत उपज 80 से 100 किलोग्राम प्रति पौधा होती है.

सगई – खजूर की इस किस्म के फल पीले रंग के होते है. साथ ही पूर्ण पकने पर खाने योग्य होते है. इस फल खाने में खसखसाहट मालूम होती है. इसके फल फल खाने में स्वादिष्ट नही होते है. इसकी उपज प्रति पौधा 60 से 100 किलोग्राम तक होती है.

खुनेजी – खजूर की इस किस्म के फल पककर जल्दी तैयार होते है. इस किस्म के फल डोका अवस्था में लाल रंग के एवं मीठे होते है. फल खाने में कुरकुरे एवं स्वादिष्ट होते है. फल का औसत वजन 10.2 ग्राम तथा उसमें कुल घुलनशील ठोस पदार्थ 43 प्रतिशत पाया जाता है. इसकी उपज 40 से 60 किलोग्राम प्रति पौधा तक हो जाती है.

धमानी मेल (नर किस्म) – खजूर की इस किस्म के पौधे में 10 से 15 फूल आते है तथा प्रत्येक फूल में औसतन 15 से 20 ग्राम परागण निकलते है. यह किस्म अधिक मात्रा में परागन प्राप्त करने के लिए उपयुक्त है. परन्तु इस किस्म में परागन 8 से 10 दिन देरी से प्राप्त होते है.

खजूर की प्रवर्धन विधियाँ 

खजूर के पौधों में नर और मादा फूल अलग-अलग पौधों पर आते है. एक बीजपत्री होने के कारण खजूर के पौधे कायिक प्रवर्धन द्वारा नही किये जा सकते है. इसका प्रसारण बीज, सकर्स व टिशू कल्चर विधियों द्वारा किया जाता है.

पौधा लगाने का समय एवं दूरी

खजूर को लागने लिए अप्रैल का महीना सबसे उत्तम होता है. कतार से कतार तथा पौधे से पौधे के बीच की दूरी 10 x 10 मीटर की दूरी पर रोपना चाहिए. खजूर एक लिंगी पेड़ होने से नर व मादा पुष्पन अलग-अलग पेड़ों पर आते है. इसलिए खेत में परागण हेतु नर पेड़ों का होना आवश्यक है. एक नर पेड़ से 10 से 15 मादा पेड़ों के लिए पर्याप्त परागण उपलब्ध हो सकते है.

पौध रोपण (Date farming)

खजूर का पौधा लगाने के लिए मार्च के महीने में 1 मीटर लम्बे, 1 मीटर चौड़े व एक मीटर गहरे गड्ढे खोद लेना चाहिए. इन गड्ढों में ऊपर की उपजाऊ की उपजाऊ मिट्टी तथा 20 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई गोबर की खाद, 1.60 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट एवं 250 ग्राम क्यूनालफ़ॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण या फैनवलरेट 0.4 प्रतिशत चूर्ण मिलाकर गड्ढे में भर देना चाहिए. पौधा लगाने से पहले गड्ढे में हल्का पानी डाल देना चाहिए. जिससे मिट्टी नीचे बैठ जाए. पौधों को लगाते समय थैली को नीचे से काट देना चाहिए. पौधा लगाते समय यह ध्यान रखे कि पौधे के बल्ब का केवल 3/4 हिस्सा मिट्टी के अन्दर रहे तथा काउन मिट्टी में न दबे.

खाद एवं उर्वरक (Date farming)

खजूर के पौधे की अच्छी वृध्दि एवं अच्छी उपज के लिए खाद एवं उर्वरक बहुत ही आवश्यक है. इसके पौधे के लिए नाइट्रोजन 600 ग्राम, फास्फोरस 100 ग्राम व पोटाश 70 ग्राम प्रति पेड़ प्रति वर्ष पेड़ के फैलाव में प्रयोग करना चाहिए. पांच वर्ष तक आयु वाले पौधे को 40 से 50 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद प्रति पेड़ प्रति वर्ष देनी चाहिए.

सिंचाई (Date farming)

खजूर की सिंचाई गर्मियों में 10 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए तथा जड़े के मौसम में 30 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए. मध्य ग्रीष्म ऋतु में सिंचाई दोपहर के बाद या रात में करनी चाहिए.

फूल तथा फल आने का समय 

खजूर के पेड़ में फरवरी से मार्च तक फूल आ जाते है. यह फूल जुलाई तक फल बनकर पाक जाते है और तुड़ाई लायक हो जाते है.

फलों की तुड़ाई एवं उपज 

खजूर के फल पकने के समय वर्षा आरम्भ हो जाने से पेड़ पर पूर्ण परिपक्वता प्राप्त करना संभव नही है. अतः अधिकतर जगह फलों के गुच्छो को डोका अवस्था में ही पेड़ों से काट लिया जाता है. कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी तुड़ाई प्रायः डांग अवस्था में की जा सकती है.

फलों की तुड़ाई के बाद प्लास्टिक केट्स में रखकर चाकू से गुच्छो से अलग करके छटनी कर लेनी चाहिए. फलों की छटनी के उपरान्त अच्छी पैकिंग करके बाजार भेजे या उपयुक्त तापक्रम पर भंडारित करके रखे. पके फलों को टोकरियों में 5.5 से 7.2 डिग्री सेल्सियस तापक्रम व 85 से 90 प्रतिशत आपेक्षित आर्द्रता में शीतग्रह में 2 सप्ताह तक भंडारित करके रखा जा सकता है.

खजूर के पेड़ लगभग 4 वर्षों में फल देने के लिए तैयार हो जाता है. लेकिन टिश्यू कल्चर से तैयार पौधा तीसरे वर्ष फल देना शुरू कर देता है. खजूर का एक वृक्ष औसतन 50 से 60 किलोग्राम प्रति वृक्ष प्रति वर्ष फल देता है.

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खजूर के कीट एवं रोग प्रबन्धन 

खजूर के पेड़ में रोग एवं कीट का प्रकोप कम होता है फिर भी कुछ कीट और रोग इसको प्रभावित करते है. वह निम्नवत है-

प्रमुख रोग एवं रोकथाम

मिथ्याकंड – खजूर का यह रोग प्रायः अधिक आर्द्रता की परिस्थिति में अधिक होता है. यह ग्राफियोला फिनिसिस नामक फफूंद से होती है. पत्तियों की दोनों सतहों पर भूरे रंग के असंख्य धब्बे दिखाई देते है. इस रोग से पूर्ण ग्रसित पत्तियां सूख जाती है.

रोकथाम – इसकी रोकथाम के लिए प्रभावित पत्तियों को काटकर नष्ट कर देना चाहिए. तान्बायुक्त फफूंदनाशी या डाईथेन एम-45 या फाइटोलान 2 ग्राम प्रति लीटर के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए.

लीफ स्पॉट – यह रोग अल्टरनेरिया फंगस द्वारा होता है. जिससे पत्तियों की दोनों सतह पर अनियमित आकार के भूरे काले रंग के धब्बे पाए जाते है. उग्र अवस्था में यह रोग पौधे के तने व फलों को भी प्रभावित करता है.

रोकथाम – इस रोग की रोकथाम के लिए प्रभावित पत्तियों को काटकर जला देते है. इसके अलावा पौधे पर कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम प्रतिलीटर पानी में घोलकर 15 दिन के अंतराल पर दो या तीन बार छिड़काव करना चाहिए.

प्रमुख कीट एवं प्रबन्धन 

दीमक से खजूर के फलों एवं पेड़ों दोनों को हानि पहुंचता है. यह भूमिगत या तने के पास खाकर हानि पहुंचाती है. छोटे पौधे की वृध्दि रुक जाती है. तथा वे मुरझाकर सूख जाता है.

रोकथाम – इस कीट की रोकथाम के लिए हर माह या दो माह पर क्लोरोपायरीफ़ॉस 1 मिलीलीटर प्रति 1 लीटर पानी में घोल कर थालों में अच्छी तरह सिंचाई कर देनी चाहिए.

स्केल कीट – खजूर का शल्क अथवा स्केल कीट भी बहुत ही हानि पहुंचाता है. निम्फ व मादा पत्तियों का रस चूसकर हानि पहुंचाते है. अधिक प्रकोप होने पर ये कीट कच्चे फलों को भी खाते है. इसके प्रकोप से पौधों के विकास में भी बाँधा पहुंचती है.

रोकथाम – इस कीट के नियंत्रण के लिए सबसे पहले प्रभावित पत्तियों को काटकर नष्ट कर देते है. इसके अलावा प्रभावित पत्तियों पर डायमेथोएट 30 ई० सी० 1 मिली० प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है किगाँव किसान (Gaon Kisan) के खजूर की खेती (Date farming) से सम्बन्धित इस लेख से सभी जानकारियां मिल पायी होगी. गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा खजूर के फायदे से लेकर खजूर के कीट एवं रोग प्रबन्धन तक की सभी जानकारियां दी गयी है. फिर भी खजूर की खेती (Date farming) से सम्बन्धित कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताएं, महान कृपा होगी.

आप सभी लोगो का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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