ग्वार चारा की खेती की पूरी जानकारी – Guar fodder farming

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ग्वार चारा की खेती
ग्वार चारा की खेती की पूरी जानकारी - Guar fodder farming

ग्वार चारा की खेती की पूरी जानकारी – Guar fodder farming

नमस्कार किसान भाईयों, ग्वार चारा की खेती एक पौष्टिक एवं फलीदार चारे की फसल के रूप में की जाती है. यह देश में काफी प्राचीन समय से उगाई जा रही है. इसका इस्तेमाल लोग सब्जी के रूप में भी करते है. गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख में ग्वार चारा की खेती के बारे में पूरी जानकारी देगा. जिससे किसान भाई अपने पशुओं के लिए इसकी अच्छी उपज प्राप्त कर सके. तो आइये जानते है ग्वार चारा की खेती की पूरी जानकारी-

ग्वार चारा के फायदे 

ग्वार चारा फसल पशुओं के लिए पौष्टिक चारे की फसल है, जिसमें लगभग 18 प्रतिशत प्रोटीन, 32 प्रतिशत रेशा तथा 37 से 38 प्रतिशत नाइट्रोजन रहित निष्कर्ष पाया जाता है. इसके अलावा  इसमें कैल्सियम, फ़ॉस्फोरस, मैग्नीशियम, सोडियम, पोटाश आदि आदि पौष्टिक तत्व पाए जाते है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

ग्वार का वानस्पतिक नाम सायमाप्सिस सोरेलाइडीज (Cyamopsis psoratoides) है. कृषि वैज्ञानिको के अनुसार इसका भौगोलिक केंद्र भारत को बताया गया है. लेकिन कुछ का मनना है इसकी उत्पत्ति का मुख्य केंद्र उष्ण कटिबंधी अफ्रीका है. क्योकि वहां ग्वार की जंगली जातियां अब भी पायी जाती है. सन 1905 में इसे भारत से संयुक्त राज्य अमेरिका ले जाया गया. भारत में इसे अधिकतर हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र तथा मध्य प्रदेश में उगाई जाती है.

जलवायु एवं भूमि 

ग्वार शुष्क भागों के लिए महत्वपूर्ण फसल है. यह फसल बलुई दोमट भूमि में उगाई जाती है. यह फसल मृदा में अधिक नमी को नही सहन कर पाती है. तथा पानी की अधिकता से पौधे मर जाते है.

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फसल चक्र 

ग्वार को कई फसलों के साथ उगाया जा सकता है. यदि दाने की फसलों के फसल चक्र में उगाना हो, तो इसको गेहूं की फसल के बाद गर्मी में उगाना चाहिए. चारे की फसल निम्न फसल चक्रों में उगाई जा सकती है –

  • बाजार + ग्वार-बरसीम (एक वर्षीय)
  • ज्वार + ग्वार-बरसीम-ग्वार (एक वर्षीय)
  • ग्वार-बरसीम-मक्का (एक वर्षीय)

उन्नत किस्में 

ग्वार चारा फसलों में मुख्य किस्मों में हरियाणा ग्वार नंबर 2, ऍफ़० ओ० एस० 277, आई० जी० ऍफ़० आर० आई० 212 तथा हिसार आदि है.

खेत की तैयारी 

इसके लिए खेत की विशेष तैयारी नही करनी पडती है. खेत की तैयारी पिछली फसल पर निर्भर करती है. प्रायः 2 से 3 बार हैरो से जुताई करके खेत की मिट्टी को भुरभुरी बना लेते है. इसके पश्चात् पाटा चलाकर खेत को समतल बना लेना चाहिए.

बुवाई 

ग्वार की बुवाई दो मौसमों में की जाती है. सिंचित क्षेत्रों में बुवाई मार्च के प्रारंभ में की जाती है. इसे बसंत या गर्मी की फसल कहते है. इस फसल को पलेवा देकर बोना चाहिए. इसमें 3 से 5 तक सिंचाईयों की आवश्यकता पड़ती है. चारे के लिए ग्वार 2 से 2.5 माह में तैयार हो जाती है. अन्य स्थानों पर फसल को प्रथम मानसून के बाद या जून-जुलाई में बोते है. यह फसल सितम्बर तक चारे के लिए तैयार हो जाती है.

चारे के लिए ग्वार की बीज दर 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होनी चाहिए. दाने या बीज के लिए 20 से 21 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता पड़ती है. चारे के लिए फसल की बुवाई लाइनों में या छिटकवा विधि से करते है. लाइनों में बुवाई करने के लिए लाइन से लाइन की दूरी 25 से 30 सेमी० रखनी चाहिए. प्रायः यह फसल चारे के लिए छिटकवाँ विधि द्वारा बोई जाती है. बीज को खेत में बराबरी पर छिडक देते है. इसके पश्चात् हैरो चलाकर मिट्टी को अच्छी प्रकार मिला देना चाहिए. ताकि बीज कम से कम 1.5 से 3 सेमी० की गहराई में जाकर मिट्टी से ढक जाए. इससे अंकुरण एक समान और अच्छा होता है. गर्मी वाली फसल लाइनों में ही बोनी चाहिए.

खाद एवं उर्वरक 

अन्य दलहनी फसलों की भांति ग्वार के लिए भी नाइट्रोजन की आवश्यकता बहुत कम होती है. बुवाई के समय 25 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन तथा 50 से 60 किलोग्राम फ़ॉस्फोरिक अम्ल प्रति हेक्टेयर खेत में फैलाकर मिट्टी में अच्छी प्रकार मिला देना चाहिए. यदि आवश्यकता पड़े तो बाद में अंकुरण के 15 दिन बाद 5 किलोग्राम यूरिया को पानी में एक समान घोलकर लाभकर होता है.

सिंचाई एवं जल-निकास

ग्वार को प्रायः मानसून के प्रारंभ में बोया जाता है. तब इसको सामान्यतः सिंचाई की आवश्यकता नही होती है. केवल बीज उत्पादन के लिए कभी-कभी एक सिंचाई की जा सकती है. सिंचाई से अधिक महत्व जल निकास का है. निकास का उचित प्रबन्धन होना चाहिए. क्योकि खेत में पानी भरने से पौधे मर जाते है.

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फसल सुरक्षा 

चारे की फसल में बीमारी या कीड़े की कोई विशेष समस्या नही होती है. कभी-कभी रोमिल इल्ली का आक्रमण होता है. इसके लिए एक लीटर थायोडान को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से फसल पर छिड़काव करना चाहिए.ऐसी फसल को कम से कम 20 दिनों तक पशुओं को नही खिलाना चाहिए.

जहाँ पर खरपतवारों की समस्या है. उन स्थानों पर फसल को कम से कम 20 से 25 दिन तक खरपतवार मुक्त रखने के लिए प्रारंभ में ही खुरपी द्वारा खरपतवारों को निकाल देना चाहिए.

कटाई-प्रबंधन एवं उपज

अच्छे चारे के लिए ग्वार के पौधों को पुष्पावस्था (2 माह) या फली बनने की अवस्था में काटना चाहिए. इससे जल्दी चारा कटाने से उपज कम हो जाती है. और देर से काटने पर चारे के पोषक तत्व कम हो जाते है. देर से चारा कटाई करने पर प्रोटीन तथा अन्य तत्वों की मात्रा घटती है. पर कार्बोहाइड्रेट और रेशे की मात्रा बढ़ जाती है.

ग्वार के हरे चारे की उपज 150 से 200 कुंटल तक होती है.

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निष्कर्ष 

किसान भाई उम्मीद है, गाँव किसान (Gaon Kisan) के इस लखे से ग्वार चारा की खेती की पूरी जानकारी आप सभी को मिल पायी होगी. अगर आपका ग्वार चारा की खेती से सम्बंधित कोई प्रश्न है तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताये, महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द. 

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