केला भृंग कीट (Banana beetle) की पूरी जानकारी – Banana Insect

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केला भृंग कीट
केला भृंग कीट (Banana beetle) की पूरी जानकारी

केला भृंग कीट (Banana beetle) की पूरी जानकारी

नमस्कार किसान भाईयों, देश में केला की खेती विभिन्न राज्यों में की जाती है. जिससे किसान भाई अच्छा मुनाफा कमा लेते है. लेकिन केले की खेती में कई प्रकार के कीट इसकी फसल को काफी नुकसान पहुंचाते है. इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख में केले के एक कीट केला भृंग कीट (Banana beetle) की पूरी जानकारी देगा. जिससे किसान भाई केले के इस कीट के प्रकोप से बच सके. तो आइये जानते है केला भृंग कीट ( (Banana beetle) की पूरी जानकारी-

केला भृंग कीट (Banana beetle) की पहचान 

इस कीट का वयस्क भृंग लगभग 2.5 सेमी० लंबा, हल्का गुलाबीपन लिए हुए काले रंग का होता है. इसका तुंड (snout) लंबा व आगे से मुड़ा हुआ होता है. पक्षवर्म उदार से थोड़ा छोटा होता है. और इस पर पतली-पतली धारियां होती है. भृंगक 8 से 12 मिमी० लम्बे, सिकुड़ी खाल वाले, पैर रहित, मांसल तथा क्रोमी सफ़ेद रंग के होता है.

कीट पाया जाना वाला क्षेत्र 

केला का यह कीट भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया के अलावा सभी केला उगाने वाले स्थानों में पाया जाता है. आस्ट्रेलिया, हवाई द्वीप समूह, दक्षिणी अफ्रीका व मध्य अमेरिका में यह कीट काफी क्षति पहुंचाता है. भारत में यह असम, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक व उत्तर प्रदेश में बहुत पाया जाता है.

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कीट द्वारा क्षति 

इस कीट के वयस्क व भृंगक, दोनों ही केले को क्षति पहुंचाते है. इस कीट की मादा कीट की पौधों के प्रकंदों के ऊपर छेद बना कर अंडे देती है. इसमें जो भृंगक निकलते है, वे प्रकंदों व मिथ्या तनों में छेद करके अन्दर ही अन्दर सुरंगे बनाते है. वयस्क कीट भी मिथ्या तनों व बगल से निकलने वाले अन्य अतः भूस्तारियों (suckers) में छिद्र व सुरंगें बना देते है.

इस प्रकार के पौधे बीमार दिखाई देते है. उनकी बढवार कम हो जाती है. गुच्छों में केलों की संख्या बहुत कम हो जाती है. और केले छोटे-छोटे लगते है. तेज हवा चलने पर क्षतिग्रस्त स्थान से पौधे टूटकर गिर जाते है. कभी-कभी तनों के छिद्रों से जीवाणुओं का संक्रमण हो जाने से दुर्गन्ध युक्त सड़न भी शुरू हो जाती है. तथा पौधे में अन्य अन्तःभूस्तारी (Suckers) कम निकलते है.

अन्य परपोषी पौधे 

यह केले का विशेष कीट है. केले की माल भोग और चम्पा जातियां इस कीट के लिए बहुत ग्रहणशील है.

कीट का जीवन चक्र

इस कीट की मादा भृंगक जमीन के पास केले के प्रकन्द के ऊपरी भाग पर, जहाँ से खुली हुई जड़े निकलती है. 10 से 50 अंडे देती है. ये अंडे कुछ लम्बाकार, सफ़ेद तथा लगभग एक मिमी० आकार के होते है. ये 3 से 5 दिन में फूट जाते है. और इनसे छोटे-छोटे भृंगक निकलते है. ये भृंगक गर्मियों में लगभग 15 दिनों और सर्दियों में 45 दिनों में पूर्ण विकसित हो जाते है. इसके बाद ये अपने द्वारा बनाई गयी सुरंग में प्यूपावस्था में परिवर्तित हो जाते है. ये प्यूपा गर्मियों में 8 से 10 दिनों और सर्दियों में 10 से 12 दिनों में फूट जाते है. और उनसे वयस्क निकल आते है.

वयस्क कीट पुनः संगम करके अपना जीवन चक्र शुरू कर देते है. वयस्क कई माह तक जीवित रहते है. वयस्क कीट कुछ समय तक जमीन में ही रहते है. और पौधे के भूमिगत भाग पर ही खाते है. इसके बाद मादाएं अंडे देने के लिए ऊपर आ जाती है. दिन में ये पत्तियों व अन्य कूड़े-करकट में छिपी रहती है. और रात्रि को सक्रिय रहती है. यह एक जीवन-चक्र 2 माह में पूरा करता है. एक वर्ष में 3 से 4 पीढियां पाई जाती है. वयस्क कीट 2 साल तक जीवित रहता है. यह कीट 6 माह तक बिना भोजन के जीवित रह सकता है.

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कीट का नियंत्रण  

इस कीट के नियंत्रण के लिए निम्न उपाय करना चाहिए-

  • क्षतिग्रस्त पौधों को प्रकन्द सहित नष्ट कर देना चाहिए.
  • पौधों के आस-पास पूरी सफाई रखनी चाहिए. सूखी पत्तियों एवं अन्य गन्दगी को साफ़ करके जला देना चाहिए.
  • जिस अन्तःभूस्तारी में इसका प्रकोप हो, उसे दूसरी जगह नही लगाना चाहिए. हमेशा स्वस्थ अन्तःभूस्तारी ही बाग़ लगाते समय प्रयोग करना चाहिए.
  • सर्वांगी कीटनाशी, जैसे प्यूराडान, थिमेट आदि का प्रयोग करना चाहिए.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है, गाँव किसान (Gaon Kisan) के इस लेख से केला भृंग कीट (Banana beetle) की पूरी जानकारी मिल पायी होगी. फिर भी इस लेख से सम्बंधित आपका कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताएं, महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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