small cardamom cultivation – छोटी इलायची की खेती कैसे करे ?

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small cardamom cultivation
छोटी इलायची की खेती (small cardamom cultivation) कैसे करे ?

छोटी इलायची की खेती (small cardamom cultivation) कैसे करे ?

नमस्कार किसान भाईयों छोटी इलायची की खेती (small cardamom cultivation) देश में इसके बीजों के मसाले के लिए की जाती है. इसका उपयोग मुख्य रूप से व्यंजनों एवं मिठाइयों में की जाती है. किसान भाई इसकों लगाकर अच्छा लाभ कमा सकते है. इसलिए गाँव किसान (gaon kisan) आज अपने इस लेख के द्वारा इलायची की खेती (small cardamom cultivation) की पूरी जानकारी देगा. वह भी अपने देश की भाषा हिन्दी में. जिससे किसान भाई इसकों अच्छी तरह उगा सके. तो आइये जानते है इलायची की खेती (small cardamom cultivation) की पूरी जानकारी-

छोटी इलायची के फायदे

प्राचीन काल से इलायची के बीजों का मसालों में प्रमुख स्थान रहा है. अपनी मधुर सुगंध तथा सुवासित स्वाद के कारण इलायची को मसालों की रानी कहा जाता है. इसकी सुगंध तथा स्वाद का मुख्य स्रोत इसके बीजों में पाए जाने वाला वाष्पशील तेल है. सामान्य तौर पर इसमें वाष्प तेल की मात्रा 5.5 से 10.5 प्रतिशत तक होती है. तेल के अलावा इलायाची में अन्य पदार्थ जैसे प्रोटीन 7 से 14 प्रतिशत, स्टार्च 50 प्रतिशत, भस्म 3.8 से 6.9 प्रतिशत, कैल्सियम 3.5 प्रतिशत, फास्फोरस 0.21 प्रतिशत, सोडियम 0.01 प्रतिशत, पोटेशियम 1.20 प्रतिशत पाए जाते है.

इसके अलाव इलायची में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. प्रति 100 ग्राम इलायची के बीजों में बी-1 की मात्रा 0.18 मिग्रा०, बी-2 की 0.23 मिग्रा० व सी की 12.0 मिग्रा० तथा ए की मात्रा 175 अ ई पाई जाती है.

इलायची के दानों का उपयोग इसकों साबुत पीसकर मिठाइयाँ, अचार, सॉस आदि खाद्य पदार्थों को सुगन्धित करने में किया जाता है. भारत में इलायची को पान के साथ या अकेले चबाने के काम में लिया जाता है. इसका मसालों के अलावा विभिन्न प्रकार की दवाइयों के रूप में भी इलायची का मुख्य स्थान है. इसके आयुर्वेदिक औषधियों, विशेषकर जो अपच, वायु विकार तथा उदार-शूल में प्रयुक्त होती है, में इलायची का उपयोग किया जाता है. दवाइयों की बदबू दबाने में भी इलायची के तेल का मुख्य स्थान है.

इलायची की उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

इलायची का वानस्पतिक नाम इलेट्टेरिया कार्डेमोमस (Elettaria cardamomum matom) है. यह जिंजिबेरेसी (Zingiberaceae) कुल का पौधा है. छोटी इलायची का पौधा सामान्यतः समुद्र किनारे पाया जाता है. विश्व में इसकी खेती भारत, श्री लंका एवं म्यांमार में की जाती है. भर के दक्षिणी भागों में 750 से 1500 मीटर की ऊंचाई पर कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु आदि राज्यों के पश्चिमी घात के सदाहरित वनों में भी इलायची पाई जाती है.

जलवायु एवं मिट्टी 

इलायची के पौधे समुद्र तल से 750 से 1350 मीटर की उंचाई वाले सदाबहार उष्ण जंगलों में अच्छी प्रकार पनपते है. इसकी अच्छी बधवार के लिए 12 से 15 डिग्री सेल्सियस वार्षिक तापक्रम तथा पूर्ण रूप से वितरित 200 से 500 सेमी० वार्षिक वर्षा उपयुक्त होती है.

इसकी अच्छी उपज के लिए दोमट और लाल हल्की लेटराईट मिट्टी सर्वोताम होती है. मिट्टी में प्रचुर मात्रा में जीवांश उपलब्ध होने चाहिए. इस बात का ध्यान रखे पौधे लगाए जाने स्थान पर जल निकास की उय्चित व्यवस्था होनी चाहिए.

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उन्नत किस्में  

इलायची की उन्नत किस्में निम्नाकिंत है-

मुडिगीरी-1 – इस किस्म को साल 1984 में मुडिगेरे बैगलूर में विकसित किया गया है. यह अधिक पैदावार वाली किस्म है. यह कर्नाटक राज्य के लिए उपयुक्त है. इसकी पैदावार 250 से 300 किग्रा० प्रति हेक्टेयर है.

पी०वी०-1 – इसक किस्म को पम्पादुम्पारा (के०ए०यू०) विकसित किया गया है. यह केरल राज्य के लिए उपयुक्त किस्म है. इसकी पैदावार 150 किग्रा० प्रति हेक्टेयर तक की है.

इसके अलावा सी० एल०-37, एम०सी०सी०-61, 49 आदि किस्में है. जिनकी अच्छी पैदावार है.

पौध तैयार करना (small cardamom cultivation)

इलायची बाग़ लगाने से पहले बढ़िया किस्म के पौधे तैयार करना पहली आवश्यकता होती है. इसके पौधे दो तरीके से तैयार किये जा सकते है-

कायिक प्रवर्धन 

कायिक प्रवर्धन के लिए उचित किस्म क्व चयनित पुंजों से प्रकन्द खंड लिए जाते है. ऐसे प्रकन्द खंड जिनमे एक वर्धित व एक नया वावयी व प्ररोह हो, बोने के लिए उचित रहते है. बाग़ में पहले से तैयार किये गये गड्ढों में ऐसे प्रकन्द खंडो को बोकर मिट्टी से ढक देते है. व पलवार लगा देते है.

प्रकन्द खण्डों की गहराई में अधिक न हो अन्यथा पौधों के जमने पर विपरीत प्रभव पडेगा. बुवाई वर्षा के प्रारम्भ में की जाती है. परन्तु जिन क्षेत्रों में जून-जुलाई माह में अधिक वर्षा हो, उनमे अगस्त-सितम्बर में करनी चाहिए.

बीजों से 

अच्छी किस्म के स्वस्थ व पूर्ण विकसित डोडो के बीजों से नर्सरी में पौध तैयार की जाती है. बीजों को पहले प्राथमिक नर्सरी में बोते है. प्राथमिक नर्सरी में जब पौधों पर 5 से 6 पत्तियां आ जाती है. तब उन्हें द्वितीय नर्सरी में स्थानांतरित कर देते है.

नर्सरी तैयार करना (small cardamom cultivation)

नर्सरी तैयार करने के लिए हल्की ढलान वाली भूमि उपयुक्त होती है. नर्सरी में सिंचाई व जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए. नर्सरी के लिए खाली स्थान का चयन कर खरपतवार मुक्त कर देना चाहिए. तथा जमीन को 30 से 45 सेमी० गहरी खोदकर एक मीटर चौड़ी भूमि की सतह से 30 सेमी० ऊँची क्यारियाँ बना ली जाती है.

बीज, बीजोपचार एवं बुवाई 

बुवाई के लिए अधिक उपज वाले स्वस्थ पौधे-पुंजों से ही बीज लेने चाहिए. ऐसे पुंजों से भली-भांति पके हुए डोडे तोड़ लिए जाते है. तथा छिलके हटाकर बीज अलग कर लेते है. अलग किये बीजों को पानी से अच्छी तरह धो लेते है. जिससे उन पर लगा हुआ चिपचिपा पदार्थ दूर हो जाय. इसके बाद लकड़ी की राख में मिलाकर एक दिन छाया में सुखाते है. इन बीजों को शीघ्र ही बो देना चाहिए.

बुवाई से पहले बीजों को 25 प्रतिशत नाइट्रिक अम्ल से दस मिनट तक उपचार करके बहते हुए पानी में आधा घंटा धोना चाहिए. इस तरह उअप्चारित बीजों का उपरी कवच नरम हो जाता है. और उनमे अन्कुरण शीघ्रता से होता है.

उपचार के बाद उपचार के बाद बीजों को प्राथमिक नर्सरी में बो देते है. अगर पौधों को प्राथमिक नर्सरी से सीधा ही बाग़ में बोना हो तो नर्सरी में कतार से कतार की दूरी 15 सेमी० रखनी चाहिए. इस प्रकार बुवाई के लिए 2.0 ग्राम बीज एक वर्ग मीटर के लिए पर्याप्त होंगे और दस महीने में बाग़ में प्रति रोपण के लिए पौध तैयार हो जाती है.

भूमि की तैयारी व पौध लगाना 

बाग़ लगाने के लिए खेत की अच्छी प्रकार सफाई करनी चाहिए. साफ भूमि पर अप्रैल-मई के महीने में 45 x 45 x 45 सेमी० आकार के गड्ढे बना लेते है. तथा उसमें सहती मिट्टी, कम्पोस्ट या अच्छी सड़ी हुई खाद का मिश्रण भर देते है. समतल भूमि में गड्ढे कतार में बनाना चाहिए. लेकिन ढालू जमीन में कंटूर बनाकर उस के साथ-साथ गड्ढे बनाने चाहिए.

पौधे लगाने के लिए तैयार किये गये गड्ढे के बीच थोडा सा गड्ढा बनाकर उसमें पौध लगा दी जाती है. पौध को कॉलर संधि के ऊपर मिट्टी न चढ़ाये. पौध लगाने के तुरंत बाद प्ररोह के पास में छड़ी रोपकर सहारा दे. और पौधे के चारों ओर पलवार लगा दे. पौधों के लगाने का उपयुक्त समय तो वर्षा के आरम्भ होते ही जून-जुलाई का है. परन्तु जहाँ अधिक वर्षा होती है. वहां मानसून कम होने पर पौध लगाए. बाग़ में जल निकास की उचित व्यवस्था आवश्यक है. क्योकि अत्यधिक पानी पौधों को हानि पहुंचता है.

खाद एवं उर्वरक (small cardamom cultivation)

भूमि की उर्वरा शक्ति को ध्यान में रखते हुए अच्छी फसल के लिए प्रति पौधा 5 किलोग्राम सड़ी हुई खाद या कम्पोस्ट खाद या कम्पोस्ट देना चाहिए. और साथ ही प्रति हेक्टेयर 75 किलोग्राम नत्रजन, 75 किलोग्राम फ़ोस्फोरस व 150 किलोग्राम पोटाश दो भागों में बांटकर दे. उअर्वर्कों की पहली मात्रा मई महीने में दे. दूसरी क़िस्त सितम्बर महीने में देनी चाहिए. पहले वर्ष बताई गयी मात्रा की आधी उर्वरक देनी चाहिए. दुसरे वर्ष उर्वरक की मात्रा पूरी देनी चाहिए.

सिंचाई (small cardamom cultivation)

गर्म या शुष्क मौसम में सिंचाई आवश्यक है. भूमि की जलधारण क्षमता के अनुसार गर्मियों में 10 से 15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए. जिससे पौधे को सूखे का सामना न करने पड़े.

निराई-गुड़ा (small cardamom cultivation)

बाग़ में से खरपतवार को, विशेषतः प्रथम वर्ष में, समय-समय पर निकालते रहना चाहिए. इसके बाद वर्ष में, प्रथम मई-जून, दूसरी अगस्त-सितम्बर व तीसरी दिसम्बर-जनवरी में निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए.

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कटाई  एवं सुखाई 

इलायची के पौधों में तीसरे साल फल आने शुरू हो जाते है. परन्तु इसकी अच्छी उपज चौथे वर्ष प्रारम्भ हो जाती है. डोडों के विकास व पकने में 3 से 4 महीने लग जाते है. चूंकि सभी एक साथ नही पकती, इसलिए फसल की कटाई 15 से 20 दिन के अंतर से डोडों को हाथ से तोड़कर की जाती है. फसल की कटाई मौसम व किस्म के अनुसार जुलाई-अगस्त से शुरू होकर फरवरी-मार्च तक चलती है. परन्तु अक्टूबर-नवम्बर महीने में उत्पादन सर्वाधिक होता है.

डोडो के अधिक हरेपन के लिए इनको पूरा पकने से थोडा पहले पुष्पावलीवृंत सहित तोड़ लिया जाता है. पकने के बाद अगर डोडो को अधि समय तक पौधों पर छोड़ दिया जाय तो उनका रंग बिगड़ जाता है.और उनके फटने का भी डर रहता है. जिससे गुणवत्ता तो कम होगी ही, साथ ही उपज में भी कमी आ सकती है.

डोडों को पौधों से तोड़ने के बाद धुप में या सुखाई यंत्र से सुखाया जाता है. सुखाने से पहले 10 मिनट तक धुलाई-सोडा के 2 प्रतिशत घोल में डुबोकर रखना चाहिए. धुप में सुखाने के लिए डोडों को टाट या बोरोन पर अच्छी तरह फैला देते है. और उनको उलटते-पलटते रहना चाहिए. तीन से चार दिन में डोडे सूख जाते है.

उपज 

किस्म, वातावरण व उन्नत कृषि प्रक्रियों के स्तर के अनुसार इलायची की उपज दुसरे या तीसरे वर्ष शुरू होकर चौथे-पांचवे वर्ष पूर्ण क्षमता पर पहुँचती है. इलायची उन्नत कृषि कियायें अपनाकर वर्ष में 75 से 300 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है गाँव किसान के इलायची की खेती (small cardamom cultivation) से सम्बंधित इस लेख से सभी जानकारियां दी गयी है. गाँव किसान द्वारा इलायची के फायदे से लेकर इसकी उपज तक की सभी जानकारियां दी गयी है. फिर भी इलायची की खेती (small cardamom cultivation) से सम्बंधित आपका कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलाव यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताये. महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द. 

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