Taro cultivation in india – अरवी की खेती कैसे करे ? (हिंदी में)

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Taro cultivation in india
अरवी की खेती (Taro cultivation in india) कैसे करे ?

अरवी की खेती (Taro cultivation in india) कैसे करे ?

नमस्कार किसान भाईयों, अरवी की खेती (taro cultivation in india) देश के ज्यादातर राज्यों में की जाती है. यह एक कन्द वाली सब्जी है. किसान भाई इसकी खेती कर अच्छा लाभ ले सकते है. इसलिए गाँव किसान (Gaon kisan) आज अपने इस लेख में अरवी की खेती (taro cultivation in india) कैसे करे ? पूरी जानकरी देगा, वह भी अपने देश की भाषा हिंदी में. जिससे किसान भाई इसकी अच्छी उपज प्राप्त कर सके. तो आइये जानते है अरवी की खेती (taro cultivation in india) की पूरी जानकारी-

अरवी के फायदे 

अरवी को अरबी भी कहते है. मुख्य रूप से इसकी खेती सब्जी के लिए की जाती है. इसके कंडों को उबालकर अथवा भून कर अथवा तेल में फ्राई करके खाया जाता है. इसका उपयोग करीभाजी (पत्तियों एवं डंठल को मांस अथवा मछली के साथ पकाते है) के रूप में भी किया जाता है. कंदों में स्टार्च की मात्रा ज्यादा होने के कारण फक्टोज सिरप तथा अल्कोहल बनाने में किया जाता है.

पोषक तत्वो से भरपूर अरवी का उपयोग सब्जी के साथ-साथ अनेकों आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने में किया जाता है. अरबी के रश से बाल झड़ने की समस्या दूर हो जाती जा है. इसके सेवन से कब्ज, नींद न आने, शारीरिक कमजोरी दूर करने, भूख बढाने, हाई ब्लड प्रेशर, दस्त रोकने, आदि में काफी फायदा मिलाता है. इसके कंदों में तीक्षणता कैल्सियम आक्जेलेट के कारण होती है. जो पानी के साथ उबालने पर समाप्त हो जाती है.

अरवी की उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

अरवी का वानस्पतिक नाम कोलोकेसिया एस्कुलेंटा (Scientific Name of Arbi or Colocasia)  है. यह ऐरेसी (Aracea) कुल का पौधा है. इसको घुइयाँ भी कहा जाता है. इसका उत्पत्ति स्थान भारत ही है. यह देश के लगभग सभी गर्म प्रदेशों में इसकी खेती को जाती है.

जलवायु एवं मिट्टी 

मुख्य रूप से अरवी गर्म जलवायु की सब्जी है. जिसे लगातार पानी की आवश्यकता होती है. इसके अच्छे विकास एवं उपज के लिए 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान एवं 1000 मिमी० वर्षा उपयुक्त होती है. नम जलवायु में इसे 20 से 21 डिग्री० सेल्सियस तापमान पर उगाया जा सकता है.

अरवी की खेती के लिए जीवांशयुक्त गहरी भुरभुरी बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम होता है. जिसका पी० एच० मान 5.5 से 7.0 के बीच का उपयुक्त होता है. भूमि में जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए.

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उन्नत किस्में

अरवी की उन्नत किस्मों में सतमुखी, श्रीपल्लवी, श्रीरश्मी, सहस्रगाछी, ककाकाचू तथा पंचमुखी आदि प्रमुख है.

खेत की तैयारी 

अरवी की अच्छी उपज के लिए सबसे पहले मिट्टी पलटने के लिए और बाकी दो से तीन जुताइयाँ कल्टीवेटर या देशी हल से करते है जिससे मिट्टी अच्छी तरह भुरभुरी ही जाए. खेत को समतल करने के लिए हर बार पाटा जरुर लगायें. पानी निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए.

बीज, समय, बुवाई एवं दूरी 

अरवी की व्यवसायिक खेती करने के लिए 10 से 12 कुंटल बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है. बुवाई के लिए असिंचित क्षेत्रों के लिए अप्रैल-जून इसकों लगाने का उपयुक्त समय होता है. भारत के उत्तरी पूर्वी भागों में लगाने के लिए का उपयुक्त समय सिंचित दशा में फरवरी तथा असिंचित दशा के लिए जून का महीना है. अधिक उपज के लिए इसकी बुवाई 60 x 45 सेमी० कतार से कतार एवं पौध से पौध की दूरी पर करते है.

खाद एवं उर्वरक 

अरवी की अच्छी उपज के लिए 10 से 15 टन गोबर की सड़ी हुई खाद प्रति हेक्टेयर खेत की तैयारी करते समय जरुर डालना चाहिए.इसके अलावा 80 किलोग्राम नत्रजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस एवं 120 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर जरुर डालनी चाहिए. इसमें फास्फोरस की पूरी मात्रा एवं नत्रजन एवं पोटाश की आधी मात्रा बुवाई के समय देनी चाहिए. तथा बची हुई शेष नत्रजन एवं पोटाश की मात्रा को दो बार में देना चाहिए. पहली मात्रा अंकुरण के 7 से 10 दिन बाद एवं दूसरी मात्र उसके एक महीने बाद देनी चाहिए.

सिंचाई 

अरवी के पौधे के अच्छी वृध्दि के लिए सिंचाई महत्वपूर्ण होती है. इसके लिए खेत में पर्याप्त नमी नही होने पर पहली सिंचाई बुवाई के तुरंत बाद करने से जमाव एक समान होता है. बाद की सिंचाई समय-समय पर आवश्यकतानुसार 7 से 8 सिंचाई करनी चाहिए. दशीन की तुलना में इडोड टाइप अधिक जल की आवश्यकता होती है.

निराई-गुड़ाई  

सामान्य तौर पर पौधे की अच्छी विकास एवं ट्यूबर बनाने के लिए दो निराई-गुड़ाई आवश्यक रूप से करनी चाहिए. पहली जमाव के 7 से 10 दिन बाद निराई गुड़ाई करने के उपरांत मिट्टी चढ़ा देते है. तथा दूसरी एक माह बाद करते है.

खुदाई 

जब अरवी की फसल की पत्तियां पीली पड़कर सूख जाय तो इसकी खुदाई कर लेनी चाहिए. यह लगभग 5 से 7 महीने में तैयार हो जाती है. इडोड टाइप दशीन टाइप की तुलना जल्दी परिपक्व हो जाती है.

उपज 

फसल प्रबन्धन, प्रजाति एवं खुदाई की अवस्था के अनुसार इसकी औसत उपज लगभग 20 से 40 टन प्रति हेक्टेयर तक हो जाती है.

भण्डारण 

अरवी की खुदाई के उपरांत क्षतिग्रस्त ट्यूबर को निकालकर अच्छे ट्यूबर को छायादार सूखे स्थान पर अच्छी तरह फैला देते है. इसे गड्ढो में अथवा हवादार कमरे में ढेर बनाकर भंडारित करना चाहिए.

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अरवी में रोग एवं कीट प्रबन्धन 

प्रमुख रोग एवं प्रबन्धन 

अरवी में मुख्यतः लीफ ब्लाईट की समस्या आती है. जिसके कारण कभी-कभी 50 प्रतिशत तक का फसल का नुसान हो जाता है. इसके नियंत्रण के लिए हमें प्रतिरोधी किस्में जैसे मुक्तकेशी तथा जन्खेरी का प्रयोग करना चाहिए. जल्दी बुवाई करना चाहिए. जिससे फसल पर भारी बरसात का असर न पड़े. सदैव अच्छी सामग्री का उपयोग करे. फफूंदीनाशक मेन्कोजेब (0.02 प्रतिशत) या रिडोमिल 2 ग्राम प्रति लीटर की दर से घोल बनाकर छिड़काव करे एवं कंदों की बुवाई से पूर्व ट्राईकोडर्मा विरिडी से उपचारित करे.

प्रमुख कीट एवं प्रबंधन 

अरवी में एफिड तथा इल्ली इसके पत्तियों को हानि पहुंचती है. इसके नियंत्रण हेतू 0.05 प्रतिशत क्यूनालफ़ॉस या डायमेथोएट का घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए. मिली बग व स्केल कीट इसके कन्द को हानि पहुंचाते है. इसके नियंत्रण हेतु हमें ऐसी रोपण सामग्री का प्रयोग करना चाहिए, जो इस कीट से मुक्त हो एवं बुवाई से पहले उसे 10 मिनट तक 0.05 प्रतिशत के घोल में डुबाकर रखना चाहिए. उसके बाद बुवाई करनी चाहिए.

निष्कर्ष  

किसान भाईयों उम्मीद है गाँव किसान (Gaon kisan) के अरवी की खेती (taro cultivation in india) से सम्बंधित इस लेख से सभी जानकारियां मिल पायी होगी. गाँव किसान (Gaon kisan) द्वारा अरवी के फायदे से लेकर अरवी के रोग एवं कीट प्रबन्धन तक की सभी जानकारियां दी गयी है. फिर भी अरवी की खेती (taro cultivation in india) से सम्बंधित कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा गाँव किसान (Gaon kisan) का यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताये. महान कृपा होगी.

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द. 

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