Ladyfinger Farming – भिन्डी की खेती करे आसान तरीके से (हिंदी में)

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भिन्डी की खेती करे (Ladyfinger Farming) आसान तरीके से

भिन्डी की खेती करे (Ladyfinger Farming) आसान तरीके से

  नमस्कार किसान भाईयों, भिन्डी की खेती (Ladyfinger farming) भारत के विभिन्न राज्यों में की जाती है. इसकी खेती टमाटर, बैगन, और मिर्च की तरह साल में दो बार आसानी से उगाई जा सकती है. यह देश की लोकप्रिय सब्जी है. जिसे लगभग सभी व्यक्ति काफी पसंद करते है. इसकी खेती कर किसान भाई अच्छा लाभ कमा सकते है. गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख में भिन्डी के खेती (Ladyfinger Farming) के बारे में पूरी जानकारी देगा, जिससे किसान भाई आसानी से इसकी खेती कर पायेगें. यह पूरी जानकारी आप को मिलेगी अपने देश की भाषा हिंदी में, तो आइये जानते है भिन्डी की खेती (Ladyfinger Farming) की पूरी जानकारी-

भिन्डी के फायदे 

भिन्डी एक पौष्टिक सब्जी है. यह स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद है. इसमें प्रचुर मात्रा में कैल्शियम, फ़ॉस्फोरस, विटामिन ए, बी तथा सी पाया जाता है. भिन्डी गैस्टिक, अल्सर, गले, पेट, मलाशय और मूत्रमार्ग में जलन से भी राहत देती है. भिन्डी के रेसों से ब्लड शुगर में आराम मिलाता है. कोलेस्ट्रोल की मात्रा को नियंत्रित जरती है. भिन्डी खनिज लवणों का स्रोत है.

उत्पति एवं क्षेत्र 

भिन्डी का वानस्पतिक नाम अबेल्मोस्कस एसकुलेंटस (Abelmoscus esculentus) है. यह मालवेसी (Malvacceae) कुल का पौधा है. इसकी उत्पत्ति स्थान अफ्रीका है. हमारे देश की जलवायु में भिन्डी की पूर्णरूपेण अनुकूलता व नै किस्मों के विकास से, आज भारत विश्व में भिन्डी का सबसे बड़ा उत्पादक राष्ट्र बन गया है. देश में इसकी खेती उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, बिहार, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में की जाती है.

जलवायु (ladyfinger farming)

भिन्डी गर्म जलवायु की सब्जी है.भिन्डी के पौधे पाले को सहन करने में असमर्थ होते है. लगातार वर्षा भिन्डी के लिए हानिकारक होती है. इसकी फसल से फालतू पानी निकाल देना चाहिए. इसके बीज के अंकुरण के लिए 27 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त होता है. तथा 17 डिग्री सेल्सियस पर बीज अंकुरित नही होते है. इसकी फसल ग्रीष्म तथा खरीफ दोनो ही ऋतुओं में उगाई जाती है.

मृदा (Ladyfinger Farming)

भिन्डी को उत्तम जल निकास वाली सभी तरह की भूमि में उगाया जा सकता है. किन्तु जीवांश पदार्थ युक्त दोमट मिट्टी इसकी अच्छी उपज के लिए सर्वोत्तम होती है. भूमि का पी० एच० मान 6 से 6.8 होना उपयुक्त रहता है.

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उन्नत किस्में (Ladyfinger Farming)

भिन्डी की उन्नतशील किस्में निम्नवत है-

कोयम्बतूर 1 :- इस किस्म के फल सिन्दूरी लाल रंग के होते है. फलों में रेशा कम, प्रोटीन और स्टार्च अधिक होता है. इस किस्म से 30 दिन में 14 टन प्रति हेक्टेयर तक की पैदावार हो जाती है.

पूसा ए-4 :- यह भिन्डी की उन्नत किस्म है. यह पीत रोधी किस्म है. फल मध्यम आकार के गहरे, कम लेस वाले तथा आकर्षक होते है. फूल बनने के लगभग 15 दिन बाद से फल आना शुरू हो जाते है. इसकी औसत पैदावार ग्रीष्म में 10 टन व खरीफ में 15 टन प्रति हेक्टेयर है.

परमनी क्रांति :- यह किस्म भी पीत रोग रोधी किस्म है. फल की बुवाई के लगभग 50 दिन बाद आना शुरू हो जाते है. फल गहरे हरे एवं 15 से 18 सेमी० लम्बे होते है. इसकी पैदावार 9 से 12 टन प्रति हेक्टेयर है.

पंजाब-7 :- यह किस्म पीत रोग रोधी है. फल हरे और मध्यम आकार के होते है. बुवाई के लगभग 55 दिन बाद फल आने शुरू हो जाते है. इसकी पैदावार 8 से 20 टन प्रति हेक्टेयर है.

इसके अलावा भिन्डी की अन्य उन्नत किस्में काशी, काशी विभूति, पंजाब पद्मिनी, हिसार उन्नत, वर्षा उपहार, काशी क्रांति एवं सोनाक्षी और शक्ति महत्वपूर्ण हाइब्रिड किस्में है.

खेत की तैयारी (Ladyfinger Farming)

सबसे पहले खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए. इसके बाद 2 से 3 जुताई कल्टीवेटर से करनी चाहिए, तथा दूसरी जुताई के साथ 150 से 200 कुंटल कम्पोस्ट खाद खेत में डालनी चाहिए. अंतिम जुताई के बाद पाटा चलाकर खेत का समतलीकरण कर देना चाहिए.

बीज की मात्रा (Ladyfinger Farming)

बरसाती फसल के लिए 8 से 10 किलोग्राम तथा गरमा मौसम के लिए 12 से 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है. संकर किस्मों के लिए 3.5 से 4.5 किग्रा० प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है. बुवाई से पूर्व बीज का उपचार 2 से 2.5 ग्राम कैप्टान या वैविस्टीन दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से करते है.

बुवाई का समय (Ladyfinger Farming)

भिन्डी की बरसाती फसल की बुवाई का समय जून से जुलाई तक समय उपयुक्त होता है, जबकि गरमा फसल की बुवाई का समय 15 जनवरी से फरवरी के अंत तक है.

बुवाई का तरीका 

भिन्डी के बीजों को सीधे खेत में बोया जाता है. बुवाई से पूर्व बीज को 24 घंटे के लिए पानी में भिगोकर रखते है. वर्षा कालीन फसल के लिए 60 सेमी० कतार से कतार व 30 सेमी० पौधों से पौधों की दूरी एवं गरमा फसल में पानी में फूले हुए बीजों को खेत में 45 सेमी० कतार से कतार व 30 सेमी० पौधे से पौधे की दूरी पर लगाते है. गरमा फसलों में बीजो का अंकुरण कम होता है. इसलिए एक स्थान पर दो बीजों की बुवाई करनी चाहिए. बरसाती फसल के लिए बुवाई मेढ़ों पर करनी चाहिए, जिससे जल निकास में सहायता मिलती है.

खाद एवं उर्वरक

भिड़ी की फसल के लिए खाद एवं उर्वरक की मात्रा का निर्धारण मिट्टी की जाँच के उपरांत करना चाहिए. सामान्यतः भिन्डी की अच्छी फसल लेने के लिए 150 से 200 कुंटल कम्पोस्ट या 60 से 80 कुंटल वर्मी कम्पोस्ट, 100 से 120 किलोग्राम नत्रजन, 60 से 80 किलोग्राम स्फूर और 80 से 100 किलोग्राम पोटाश की जरुरत होती है. नत्रजन की आधी मात्रा तथा स्फूर एवं पोटाश की पूरी मात्रा को अंतिम जुताई के समय खेत की मिट्टी में मिला देना चाहिए तथा नत्रजन की शेष आधी मात्रा को पौध ज़मने के 25 से 30 तथा 50 से 55 दिनों बाद दो बार पौधों की जड़ों के पास देकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए.

निराई-गुड़ाई एवं सिंचाई 

सामान्यतः सिंचाई करने के 3 से 4 दिनों के बाद निकाई, गुड़ाई करने से खरपतवार नष्ट हो जाते है. निराई-गुड़ाई करने से खेत की मिट्टी हल्की हो जाती है तथा जड़ों में मजबूती आती है.और खेत में नमी भी बनी रहती है. खेत में जब खर-पतवार ज्यादा उग आये तो ऐसी दशा में लासों दवा की 2 लीटर मात्रा प्रति 800 लीटर पानी में घोलकर खेत में छिड़काव करे. वर्षा ऋतु में भिन्डी की फसल को सिंचाई की आवश्यकता नही होती है, परन्तु अधिक दिनों तक वर्षा न होने की स्थिति में 10 से 15 दिनों पर सिंचाई करते है. गरमा मौसम में फसल की 8 से 10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए.

परिपक्वता के लक्षण

जब भिन्डी में फल 6 से 7 सेमी० लम्बे हो और कोमल फल का रंग हल्के हरे से गहरे रंग का हो जाता है. तब फलों की तुड़ाई की जा सकती है.

कटाई एवं उपज 

भिन्डी की तुड़ाई हर तीसरे या चौथे दिन आवश्यक हो जाती है. यदि तोड़ने में थोडा अधिक समय हो जाता है तो फल कड़ा हो जाता है. फल को फूल खिलने के 5 से 7 दिन के भीतर अवश्य तोड़ लेना चाहिए. उचित देख-रेख, उचित किस्म व खाद-उर्वरक के प्रयोग से प्रति हेक्टेयर लगभग  120 से 150 कुंटल हरे फल की उपज प्राप्त हो जाती है.

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रोग एवं कीट प्रबन्धन 

पीला शिरा रोग 

पीला शिरा रोग या यलो वेन मौजेक रोग भिन्डी का प्रमुख रोग है. इस रोग में पत्तियों शिरे हल्के पीले रंग के हो जाते है. बाद में पत्तियां पूरी तरह से पीली पड़ जाती है तथा वृध्दि रुक जाती है. यह एक विषाणु जनित रोग है.

रोकथाम 

इस रोग की रोकथाम के लिए ग्रसित पौधों को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए. व जंगली खर्पतावों को भी नष्ट कर देना चाहिए. इसके अलावा इमिडाक्लोप्रिड (1 मिली० प्रति 3 लीटर पानी में घोल कर) दवा का एक सप्ताह के अंतराल पर खड़ी फसल पर 2 बार छिड़काव करे, जिससे रोग वाहक कीट नष्ट हो जाए.

थ्रिप्स, माहू एवं जैसिड कीट  

यह कीट भिन्डी की पत्तियों का रस चूसते है. और इसकी उपज के लिए काफी हानिकारक होते है.

रोकथाम 

इन कीटों के नियंत्रण के लिए रोगर या मेटासिस्टाक्स 2 मिली० प्रति लीटर पानी में या इमिडाक्लोप्रिड (1 मिली० प्रति 3 लीटर पानी में घोल कर) छिड़काव करे.

तना, फल छेदक एवं फुदकाके 

यह कीट पेड़ तथा फल दोनों को नुकसान पहुंचाते है. जिससे उपज में भारी हानि होती है.

रोकथाम 

इसकी रोकथाम के लिए 100 से 150 मिली० इमिडावीर घोल का छिड़काव करे फलों को छिड़काव से पहले तोड़ लेना चाहिए तथा इसके अलावा कीड़े लगे फलों को तोड़कर जमीन में गाड़ देना चाहिए.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है, गाँव किसान (Gaon Kisan) के इस लेख से आप सभी को भिन्डी की खेती (Ladyfinger farming) की सभी जानकारियां मिल पायी होंगी. गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा भिन्डी के फायदे से लेकर भिन्डी के रोग एवं कीट प्रबन्धन की सभी जानकारियाँ मिल पायी होगी. फिर भी भिन्डी की खेती (Ladyfinger farming) से सम्बंधित आप का कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते हो. इसके अलावा यह लेख आप सभी को कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताएं. महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

 

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