Banana Farming – केला की खेती कैसे करे ? (हिंदी में)

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केला की खेती (Banana Farming) कैसे करे ?

केला की खेती (Banana Farming) कैसे करे ?

  नमस्कार किसान भाईयों, देश में केला की खेती (Banana Farming) सभी भागों में की जाती है. जिससे किसानों को काफी अच्छा लाभ प्राप्त होता है. इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने लेख में केला की खेती (Banana Farming) की पूरी जानकारी देगा. वह भी अपने देश की भाषा हिंदी मे. जिससे किसान भाई इसकी अच्छी उपज ले सके. तो आइये जानते है केला की खेती (Banana Farming) की पूरी जानकारी

केला के फायदे 

केला एक बहुत ही पौष्टिक फल है. जिससे 67 से 137 कैलोरी ऊर्जा एवं 27 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट प्राप्त होता है. इसके अलावा इसमें 290 पी० पी० एम० फास्फोरस एवं 80 पी० पी० एम० कैल्शियम पाया जाता है. यह काफी स्वास्थ्यवर्धक होता है. इसके सेवन से पेट सम्बन्धी रोग, दमें के इलाज, मुंह के छालों, पीलिया आदि रोगों में काफी फायेदेमंद होता है. इसमें आयरन, तांबा और मैग्नीशियम भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. जो रक्त को शुद्ध तथा इसका निर्माण में अहम भूमिका निभाते है

उत्पत्ति एवं क्षेत्र

केला (Musa accuminatax Musa bulbisiana colla.) म्यूसेसी (Musaceae) कुल का एक प्रमुख फल है. जो मुख्य रूप से एक उष्ण जलवायु का फल (Tropical fruits crop) है. जो उपोष्ण जलवायु (Subtropical climate) में भी सफलता पूर्वक उगाया जा सकता है. यह एक प्राचीनतम फल वृक्ष माना जाता है एवं दक्षिण पूर्व एशिया या भारतीय उपमहाद्वीप (असम, बर्मा, इंडो चाइना) को इसका उत्पत्ति स्थल माना गया है. हमारे देश में केले की खेती बड़े पैमाने पर होती है. केला उत्पादन में विश्व में भारत का प्रथम स्थान है. भारत के प्रमुख केला उत्पादक राज्यों में तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं बिहार आदि है

केले के पौधे के प्रमुख भाग 

केले का मुख्य तना भूमिगत होता है. जिसे प्रकन्द कहते है. इसे ही केले का सत्य तना (True stem) कहते है. जबकि भूमि के ऊपर दिखने वाले भाग को तना कहा जाता है. क्योकि यह पत्तियों के एक दूसरे के ऊपर कसे होने से बनता है. केले की पत्तियों का आकार काफी बड़ा होता है. केले के एक पौधे में पुष्प आने के समय तक कुल 40 पत्तियां निकल आती है. केले में स्पेडिक्स प्रकार का पुष्पक्रम पाया जाता है. केले के घौंद में आधार की तरफ मादा पुष्प एवं सिरे की तरफ नर पुष्प होते है. केवल मादा पुष्पों से ही फल बनते है. केले के फलों के पूरे गुच्छे गहर या घौंद कहा जाता है. पूरा घौंद पुनः फलों के छोटे-छोटे गुच्छों में बंटा होता है, जिन्हें हत्था कहते है जबकि केवल एक फल छीमी (Finger) कहलाता है. केले के फल बेरी प्रकार के होते है

मृदा एवं जलवायु (Banana farming)

केले की खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट भूमि जिसमें कार्बनिक पदार्थ अधिक मात्रा में उपस्थित हो उपयुक्त मानी जाती है. मृदा का पी० एच० मान 4.5 से 7.5 के बीच का होंना चाहिए.

केला मुख्या रूप से उष्ण जलवायु का पौधा है. इसलिए इसकी समुचित वृध्दि, विकास एवं अच्छी उपज के लिए गर्म एवं आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है. इसकी खेती के लिए अनुकूलतम तापमान 20 से 40 डिग्री सेल्सियस होता है. तापमान 10 डिग्री सेल्सियस से कम होने पर पौधे की वृध्दि रुक जाती है.

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उन्नत किस्में (Banana farming)

केले की कुछ प्रजातियां पके फल के रूप में जबकि कुछ को सब्जी के रूप में खाया जाता है.

  • पके फल के रूप में खायी जाने वाली किस्मों में ड्वार्फ कोवेंडिश, रोबस्ता, मालभोग, चिनिया, चम्पा, अल्पान, जी-09 आदि प्रमुख है.
  • सब्जी के रूप में खायी जाने वाली किस्मों में नेंद्रन, मुठिया, बंथन आदि प्रमुख है.

प्रसारण (Banana Farming)

केले का प्रसारण अधोभूस्तारी (Suckers) एवं ऊतक संवर्धन तकनीक (Tissue culture technique) से विकसित पौधों द्वारा किया जाता है.

अधोभूस्तारी दो प्रकार के होते है- 1. नुकीली पत्तियों वाले तलवारी सकर (Sword sucker) 2. चौड़ी पत्तियों वाले (Water sucker)

केले के प्रसारण हेतु तलवारी सकर या टीशू कल्चर तकनीकि से तैयार पौधे उपयुक्त होते है. इस तकनीकि से तैयार पौधे रोगमुक्त होते है.

पौधे लगाना (Banana farming)

रोपण की दूरी 

केले की बौनी प्रजातियों के लिए 1.5 X 1.5 – 1.8 X 1.8 मीटर की दूरी पर्याप्त होती है जबकि केले की लम्बी प्रजातियों के लिए 2.0 X 2.0 – 2.5 X 2.5 मीटर की दूरी पर्याप्त होती है.

रोपाई का समय 

केले की रोपाई का सबसे उचित समय जून से लेकर जुलाई माह तक कर सकते है.

पौधे के लिए गड्ढे 

केले लगाने के लिए 60 X 60 X 60 सेमी० के गड्ढे खोदकर उसमे से निकली मिट्टी में 20 किग्रा० कम्पोस्ट, 1 किग्रा० नीम की खली तथा 1 किग्रा० बोन मील एवं 100 ग्राम डाई अमोनियम फ़ॉस्फेट मिलाकर गड्ढों को भर देते है. इस मिट्टी को गड्ढे में भरने के बाद सिंचाई कर देते है. जब गड्ढों की मिट्टी बैठ जाती है उसके बाद ही पौधे लगाते है.

खाद एवं उर्वरक (Banana Farming)

केले के प्रत्येक पौधे को 20 किग्रा कम्पोस्ट, 1 किग्रा० बोन मील, 1 किग्रा० नीम की खली, 300 ग्राम नाइट्रोजन, 45 से 50 ग्राम फ़ॉस्फोरस एवं 400 ग्राम पोटैशियम की आवश्यकता होती है. कम्पोस्ट एवं फ़ॉस्फोरस की पूरी मात्रा को गड्ढे भरते समय मिट्टी को मिला देना चाहिए. नाइट्रोजन की पूरी मात्रा को चार भागो में बात कर रोपाई के 1, 3, 5, एवं 7 महीने बाद देना चाहिए, जबकि पोटेशियम की पूरी मात्रा को 5 भागों में बांटकर रोपाई के 1, 3, 5 एवं 7 बाद एवं आखिरी गहर निकलने के समय देना चाहिए.

सिंचाई (Banana farming)

केले को बरसात के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नही होती है. परन्तु गर्मी के मौसम में 5 से 7 दिन और ठण्ड के मौसम में 10 से 12 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए. इसके अलावा टपक सिंचाई प्रणाली द्वारा पानी देना पानी की बचत एवं पौधे के विकास दोनों ही द्रष्टि कोण से लाभदायक होता है. इस सिंचाई प्रणाली में पतली पाइपो के माध्यम से नियंत्रित दाब के अंतर्गत प्रत्येक पौधे के जड़ क्षेत्र में बूँद-बूँद पानी देकर सिंचाई की जाती है.

केले की विशेष शस्य क्रियाएं 

पौधे के बढ़ने के साथ-साथ नीचे की पत्तियां सूखने लगती है. जिन्हें समय-समय पर काट कर हटाते रहना चाहिए. पौधों के कुछ बड़े होने के बाद भूमि से पौधे के बगल से नए सकर्स निकलते रहते है. जिन्हें समय-समय पर हटाते रहना चाहिए. यह कार्य 45 दिन में एक बार अवश्य करना चाहिए. वर्षा ऋतु के पहले पौधों पर मिट्टी चढ़ानी चाहिए, ताकि अधिक वर्षा एवं तेज हवाओं के समय पौधों के गिरने या उखाड़ने का खतरा न रहे. केले के पौधों में फलों के घौंद के वजन से एक तरफ झुक जाते है जिन्हें गिरने से बचाने के लिए बांस की कैची बनाकर घौंद के नीचे से लगाकर सहारा देते है. इस प्रक्रिया को प्रोपिंग कहते है. केले के घौंद में सबसे अंत में पंख के आकार का गाढे लाल रंग की आकृति होती है. जिसके अन्दर नर पुष्प रहते है.जब घौंद के सभी फल बाहर निकल आते है, तो इसे काटकर हटा देना चाहिए. इस क्रिया को डेनावेलिंग कहा जाता है. जब घौंद में सभी फल निकल आये तो ऊपर से नीचे की तरफ घौंद को पाली प्रोपाइलीन बैग जो एक तरह का महीन छिद्रयुक्त कपडे का बना होता है. उसी से ढक दिया जाता है. इससे फलों में स्कैरिंग भ्रंग से बचाव होता है तथा उपज में लगभग 20 प्रतिशत तक की वृध्दि होती है.

खर-पतवार नियंत्रण  

केले के खेत को खर-पतवार से मुक्त रखना चाहिए. जब तक पौधे पूरी तरह से नीचे की जमीन को न ढक ले, तब तक नियमित रूप से निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए. प्रत्येक सिंचाई के बाद हल्की निराई-गुड़ाई लाभप्रद होती है.

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कीट एवं रोग प्रबन्धन 

 बेधक तना

यह कीट केले के तने में घुसकर सुरंग बनता है जिससे पत्तियां पीली पद जाती है और सूखने लगाती है. बाद में पौधा पूरी तरह से सड़कर नष्ट हो जाता है. यह 4 से 5 महीने पुराने पेड़ में ज्यादा होता है.

रोकथाम 

पेड़ की प्रभावित पत्तियों को जलाकर नष्ट कर देना चाहिए. गुड़ाई कर खरपतवार नष्ट करने के बाद इमिडाक्लोरपिड के घोल बनाकर छिड़काव करे.

पत्ती खाने वाला कीट  

यह कीट केले की पत्तियों को खाकर नुकसान पहुंचता है.इया कीट का लार्वा नयी निकलने वाली पत्तियों को काटकर छेंद बनाता है.

रोकथाम 

इस कीट की रोकथाम के लिए 8 से 10 फेरोमेन ट्रेप प्रति हेक्टेयर लगाना चाहिए.अधिक प्रकोप होने पर ट्राईजोफ़ॉस 2.5 मिली० प्रति लीटर का घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए.

पत्ती गुच्छा रोग 

यह रोग विषाणु जनित रोग है. इससे पत्तियां छोटी हो जाती है और गुच्छे का रूप ले लेती है.

रोकथाम 

इस विषाणु से ग्रसित पौधों को नष्ट कर देना चाहिए. और कीटों की रोकथाम के लिए इमिडाक्लओरप्रिड 1 मिली० प्रति लीटर पानी के घोल का छिड़काव करना चाहिये.

जड़ गलन 

इस रोग के कारण केले की जड़ सड़ जाती है जिससे केले का पौधा बारिश या आंधी के कारण गिर जाता है.

रोकथाम 

इस रोग की रोकथाम के लिए खेत में पानी निकास की उचित व्यवस्था करनी चाहिए. और केले का पौधा लगाने से पहले उसके कन्द को कार्बान्डाजिम के 2 ग्राम प्रति लीटर के पानी के घोल से उपचारित कर लेना चाहिए.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है गाँव किसान (Gaon Kisan) के केला की खेती (Banana Farming) से सम्बंधित इस लेख से आप को सभी जानकारियाँ मिल पायी होगी. गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा केले के फायदे से लेकर कीट एवं रोग प्रबन्धन तक की सभी जाकारियां दी गयी है. फिर भी केला की खेती (Banana Farming) से सम्बंधित आप का कोई प्रश्न हो, तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा यह लेख आप को कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताएं. महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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