Wheat farming | अधिक पैदावार के लिए गेहूँ की खेती कैसे करे ?

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Wheat farming
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गेहूँ (Wheat farming) की खेती कैसे करे ?

नमस्कार,किसान भाईयों गेहूँ (Wheat farming) की खेती की तैयारी के लिए यह उचित समय है.इसलिए गाँव किसान अपने इस लेख के जरिये आप सभी को अधिक पैदावार के लिए गेहूँ की खेती कैसे करे ? इसकी पूरी जानकारी देगा.इस जानकारी से आप गेहूँ (Wheat farming) की खेती में अधिक उपज व लाभ पा सकेगें.

गेहूँ के फायदे (Benefits of wheat)

गेहूँ रबी की फसलों में एक महत्वपूर्ण फसल है.खाद्यान्न फसलों में धान के बाद गेहूँ का दूसरा स्थान है.गेहूँ में उपलब्ध प्रोटीन की मात्रा,नाइसीन,थाइएनिन तथा ग्लूटेन के कारण यह एक पौष्टिक आहार है इसके अलावा गेहूँ बिस्कुट,केक और ब्रेड उद्योग के लिए अति महत्वपूर्ण है.इसका भूसा पशुओं के लिए चारे का भी अच्छा स्रोत है.

गेहूँ की उत्पत्ति एवं विकास (Origin and development of wheat)

पुरानी सभ्यताओं के अवशेषों से पता चलता है कि गेहूँ की उत्पत्ति का स्थान दक्षिण-पश्चिम एशिया में रहा होगा.ईराक के जारमो जोकि संसार का सबसे पुराना गाँव है वहां से मिले गेहूँ के कार्बनयुक्त दानों से पता चलता है कि संभवतः गेहूँ की खेती का प्रारंभ यही से हुआ था.ऐसा माना जाता है कि भारत में आर्यों द्वारा गेहूँ लाया गया तथा उसी समय से भारत में गेहूँ की खेती की जा रही है.

द्वितीय विश्व युध्द के उपरान्त मैक्सिको तथा संयुक्त राज्य अमेरिका (wheat farming in usa) के कुछ अनुसन्धानकर्ताओं ने जापान में नोरिन नाम का एक गेहूँ उगता हुआ देखा,जिसकी ऊँचाई दूसरे गेहूँ की किस्मों से कम थी,लेकिन नोरिन की उत्पादन क्षमता कम थी और उसमें अनेक दूसरे अवगुण थे.इस गेहूँ के कुछ नमूने वैज्ञानिक अपने साथ ले गये.डॉ० ओ० ए० वोगल ने वाशिंगटन राज्य में सर्वप्रथम गेहूँ के साथ नोरिन का संकरण कराया.इस प्रकार नोरिन गेहूँ का बौनापन और दूसरी उत्तम जातियों की उत्पादन क्षमता तथा रोग रोधित को एक नई किस्म में एकत्रित करने का प्रत्यन किया गया और संयुक्त राज्य अमेरिका में सर्वप्रथम एक बौना गेहूँ जेन्स के नाम से किसानों को दिया गया.

इसके अलावा मैक्सिको में भी नोबल पुरूस्कार विजेता नॉरमन आर्नेस्ट बोरलॉग के नेतृत्व में नोरिन गेहूँ के बौनेपन का वसंतकालीन गेहूँ में समावेश किया गया.भारत में समय की बचत के लिए (वह जो बौने किस्मों को निकालने में लगता) कृषि वैज्ञानिकों ने अमेरिका के रॉकफेलर फाउन्डेशन से कुछ बौनी किस्मों के बीज देने के लिए आग्रह किया.इस प्रकार भारत (wheat farming in india) में सर्वप्रथम सन 1963 में गेहूँ की बौनी किस्म आई.प्रारम्भ में सोनोरा-63,सोनोरा-64,लरमारोहो,64 ए,मायो-64 में से प्रत्येक किस्म का 100 किलोग्राम बीज तथा 613 दूसरी किस्मों के नमूने भी मिले.रबी,1954 में अखिल भारतीय गेहूँ विकास परियोजना के अंतर्गत देश के 155 शोध केन्द्रों पर मैक्सिको से आये बौने गेहूँ के किस्मों का परिक्षण किया गया.परिक्षण में सोनोरा-64 तथा लरमारोजो का उपज स्थानीय लम्बी किस्मों की तुलना में ज्यादा मिला.सन 1965 में सोनोरा-64 और लरमारोजो के बीज को किसानों को प्रत्यक्षण हेतु दिया गया.इसके साथ ही गेहूँ की किस्मों के विकास में सोनालिका,कल्यानण सोना आया.सन 1970 में यू०पी० 301,हीरा तथा लाल बहादुर किस्मों को विकसित किया गया.प्रत्येक वर्ष गेहूँ की बौनी किस्मों का विकास देश के कृषि जलवायु क्षेत्र के हिसाब से निरंतर किया जा रहा है.

गेहूँ का क्षेत्र विस्तार (wheat field expansion)         

देश के ज्यादातर राज्यों में गेहूँ (Wheat farming) की खेती की जाती है.देश में पंजाब,हरियाणा,उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश,बिहार,महाराष्ट्र, गुजरात आदि राज्यों में गेहूँ की खेती की जाती है.

गेहूं के लिए जलवायु (climate for wheat)

गेहूँ (farming of wheat) ठंढे मौसम की फसल है.इसके लिए विभिन्न अवस्थाओं पर भिन्न-भिन्न तापमान की आवश्यकता होती है.अंकुरण के लिए अधिकतम तापमान 20 से 25 डिग्री से० और बढवार के लिए अधिकतम तापमान 25 डिग्री सेल्सियस तथा दाना भरते समय (पकते समय) अधिकतम औसत तापमान 14 से 15 डिग्री से० उपयुक्त है.

गेहूं के लिए भूमि (land for wheat)

गेहूँ की खेती के लिए दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है.जल निकासी और सिंचाई के उचित प्रबन्धन से मटियार और रेतीली मिट्टी में भी गेहूँ की खेती की जा सकती है.गेहूँ के लिए मिट्टी का पी० एच० मान 7.0 अच्छा होता है.अम्लीय या क्षारीय मिट्टी में गेहूँ की अच्छी पैदावार नही होती है.

यह भी पढ़ेलीची की खेती (Litchi Farming) की पूरी जानकारी अपनी भाषा हिंदी में

गेहूं की किस्में एवं बुवाई का समय (Wheat varieties and sowing time)

गेहूँ की खेती का मूल्यरूप से दो परिस्थितयां है.पहला सिंचित समय से बुवाई और दूसरा सिंचित बिलम्ब से बुवाई.कुछ क्षेत्रों में असिंचित अवस्था में भी गेहूँ की एकल या मिलवाँ खेती की जाती है.विभिन्न परिस्थितियों के लिए निम्न लिखित अनुसंसित किस्में –

विभिन्न परिस्थितियों में उपयुक्त किस्में,बीज दर एवं बुवाई का समय

परिस्थिति किस्म बुवाई का समय पकने की अवधि (दिनों में) औसत उपज
(कु०/हे०)
बीज दर
(किलो/हे०)
कतार से कतार
की दूरी (से०मी०)
असिंचित सी० 306, के 8027,
एच० डी० 2888,
बी० आर० डब्ल्यू 3722
15 अक्टूबर से 10 नवम्बर तक

अक्टूबर अंतिम सप्ताह से नवम्बर मध्य तक
135-140

125-135
25-30

25-30 (असंचित)
25-40 (सिंचित)
125


125
20


20
सिंचित
(समय पर बुवाई)
के० 9107,के० 307, पी० बी० डब्ल्यू 343,पी० बी० डब्ल्यू 443,एच० यु० डब्ल्यू 486,एच० पी० 1761, आर० डब्ल्यू 3413,एच० डी 2824,एच०डी० 2824
एच०डी० 2967,डी० बी० डब्ल्यू 39,सी०बी० डब्ल्यू 38,
राज 4120,के० 9017
बी०आर० डब्ल्यू 3708
15 नवम्बर से 30 नवम्बर तक



15 नवम्बर से 30 नवम्बर तक
125 से 130




120 से 125
40 से 50





45 से 50
125





125
20





20
सिंचित
(विलम्ब से बुवाई)
डी०बी० डब्ल्यू-14,एच० डी० 2985,एच० आई० 1563,
एन० डब्ल्यू० 2036,एच० डब्लू 2045,पी०बी० डब्ल्यू 373,
डब्ल्यू० आर० 544,बी० आर० डब्ल्यू (सबौर श्रेष्ठ)
  110 से 115



105 से 110
30 से 40





42 से 45
150





150
18





18

गेहूं के लिए खेत की तैयारी (Field preparation for wheat)

गेहूँ (Wheat farming) की खेती में भूमि की तैयारी को लेकर धारणा में बहुत बदलाव आया है.पहले मिट्टी को मैदा की तरह बहुत ही भुरभुरी बनाने के लिए कई बार जुताई की जाती थी.अब गेहूँ की खेती में मात्र एक या दो जुताई करने से ही अगर खेत खरपतवार रहित हो जाय,भूमि में पर्याप्त नमी रहे तथा बीज का आसानी से समान दूरी व गहराई पर बुवाई हो जाय,पर्याप्त है.खरीफ के फसल की कटाई के बाद खेत को बिना जुअताई किये हुए,शून्य जुताई मशीन से गेहूँ की बुवाई का प्रचलन बढा है.

गेहूं का बीजोपचार (wheat germ treatment)

भीटाभेक्स,थीरम या एग्रोसेन जी० एन० नामक किसी एक दवा के 2.5 ग्राम/किग्रा० बीज की डर से बीजोपचार करे.उपचारित बीज से बीज जनित रोग होने का भय नही रहता तथा अंकुरण भी अच्छा होता है.

गेहूं की बुवाई कैसे करे ? (How to sow wheat?)

गेहूँ की समय से बुवाई की अवस्था में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 20.0 से 22.5 सेमी० तथा विलम्ब से बुवाई की अवस्था में 15 से 20 सेमी० दूरी रखते है.

गेहूँ (Wheat farming) की खेती में बीज बोने की गहराई काफी महत्वपूर्ण होती है.बीज की बुवाई 4 से 5 सेमी० की गहराई पर ही करे.अधिक गहराई पर बुवाई करने से पौधे का जमाव में 2 से 3 दिनों का साथ ही बाली आने में 5 से 6 दिनों का विलम्ब हो सकता है.

बुवाई की विधियाँ

गेहूँ की बुवाई मुख्यतः छिटकवाँ,सीड ड्रील और शून्य जुताई मशीन के द्वारा किया जाता है.

छिटकवाँ विधि

कल्टीवेटर लगे ट्रैक्टर से खेत की जुताई कर बीज की छिटकवाँ विधि से जुताई करते है.पुनः कल्टीवेटर से बीज को मिलाकर खेत में पाटा लगा दिया जाता है.इस विधि से की गई बुवाई में न तो पंक्ति की दूरी और न ही गहराई का ध्यान रखा जाता है.

सीड ड्रील द्वारा

सीड ड्रील बीज बोने का एक यन्त्र है.इसमें बीज और उर्वरक के लिए अलग-अलग बक्सा लगा होता है.खेत की तैयारी के उपरांत इस यंत्र के द्वारा उपयुक्त पंक्तियों की दूरी एवं गहराई के अनुसार बुवाई की जाती है.

शून्य जुताई मशीन द्वारा

सीड ड्रील मशीन की तरह ही शून्य जुताई मशीन भी बुवाई का कार्य करती है.फर्क सिर्फ इतना है कि इस यन्त्र से बुवाई करने से पूर्व खेत की जुताई की जरुरत नही पड़ती है.इस मशीन के हल के फाल की जगह ब्लेड लगा होता है.जिससे मिट्टी में एक चीरा बनता जाता है और खाद तथा बीज की बुवाई बिलकुल सही स्थान पर हो जाती है.इस मशीन के द्वारा बीज गिरने की दर एवं गहराई का आवश्यकतानुसार बुवाई से पूर्व ही ठीक कर लेना जरुरी होता है.बुवाई के बाद खेत में पाटा लगाने की जरुरत नही पड़ती है.

गेहूं में उर्वरक की मात्रा एवं प्रयोग विधि (Fertilizer quantity and application method in wheat)

परिस्थिति उर्वरक
(एन०पी०के० किलो०/हे०)
प्रयोग विधि
सिंचित (समय पर बुवाई ) 150:60:40 नत्रजन की आधी तथा स्फूर और पोटाश की पूरी मात्रा
अर्थात 130 किग्रा० डी० ए० पी० 112 किग्रा० यूरिया
एवं 67 किग्रा० म्यूरेट ऑफ पोटाश अंतिम जुताई के
पहले खेत में अच्छी तरह मिला दे.नत्रजन की बची मात्रा
अर्थात 139 किग्रा० यूरिया को दो बराबर भाग में प्रथम एवं
द्वितीय सिचाई के बाद उपरिवेशित करे.
सिंचित (विलम्ब से बुवाई) 120:40:20 नत्रजन की आधी तथा स्फूर और पोटाश की पूरी मात्रा
अर्थात 87 किग्रा० डी०ए०पी०,96 किग्रा० यूरिया एवं
33 किग्रा० म्यूरेट ऑफ अंतिम जुताई के समय दे तथा
नत्रजन की शेष मात्रा अर्थात 130 किग्रा० यूरिया को दो
बराबर भाग में प्रथम एवं द्वितीय सिंचाई के बाद उपरिवेशित करें.
असिंचित 60:30:20 नत्रजन,स्फुर और पोटाश की पूरी मात्रा अर्थात 66 किग्रा०
डी०ए०पी०,106 किग्रा यूरिया और 33 किग्रा म्यूरेट ऑफ पोटाश
अंतिम जुताई के समय खेत में डाल दे.वर्षा होने पर खड़ी फसल में
20 किग्रा० नत्रजन अर्थात 45 किग्रा० यूरिया/हे० की दर से
उपरिवेशित करे.

गेहूं की सिंचाई एवं जल प्रबन्धन (Wheat irrigation and water management)

गेहूँ की अच्छी पैदावार के लिए आवश्यक है कि समय से फसल की सिंचाई की जाय.आमतौर पर गेहूँ में 3 से 4 सिंचाई की आवश्यता पड़ती है.गेहूँ में हमेशा हल्की सिंचाई करनी चाहिए ताकि खेत में 6 से 8 घंटे बाद पानी न दिखाई पड़े.अन्यथा अधिक जल-जमाव से पौधे पीले पड़ जायेगें तथा उनमें श्वसन की क्रिया अस्थायी रूप से रुक जायेगी.

सिंचाई जल की उपलब्धता के आधार पर निम्न क्रांतिक अवस्थाओं पर सिंचाई

सिंचाई जल की उपलब्धता फसल की क्रांतिक अवस्था बुवाई के कितने दिन बाद
पहली सिंचाई शीर्ष जड़े (क्राउन रूट) निकलते समय 20 से 25 दिनों बाद
दूसरी सिंचाई बाली निकलते समय 40 से 45 दिनों बाद
तीसरी सिंचाई गेहूँ के दानों में दूध बनते समय 65 से 70 दिनों बाद
चौथी सिंचाई दाने की दुग्धावस्था में 90 से 100 दिनों बाद

ध्यान रखे : फसल में बाली निकलने के बाद तेज हवा चले की स्थित में सिंचाई न करे.

गेहूं की निराई गुड़ाई एवं खरपतवार प्रबन्धन (Wheat weeding and weed management)

गेहूँ (wheat farming in hindi) की फसल में खरपतवार के कारण उपज में 10 से 40 प्रतिशत तक की कमी हो जाती है.इसलिए खरपतवारों का नियंत्रण अति आवश्यक है.गेहूँ की बुवाई के 25 से 30 दिनों बाद अथवा प्रथम सिंचाई के पश्चात हैण्ड हो द्वारा निराई कर घास-फूस निकालने से उपज पर अच्छा प्रभाव पड़ता है.इसके अलावा रसायनों द्वारा खरपतवार नियंत्रण की अवस्था में पर्याप्त नमी होना काफी महत्वपूर्ण है तथा रसायनों का प्रयोग आर्थिक द्रष्टि से अपेक्षाकृत कम खर्चीला होता है.

खरपतवार प्रबन्धन
घास कुल के खरपतवार जैसे-गुल्ली डंडा
(वन गेहूँ),जंगली जई आदि.
बुवाई के 2 से 3 दिन बाद पेंडीमेथिलीन 30 ई०सी० खरपतवारनाशी रसायन
का 1.0 किग्रा सक्रीय तत्व (3.3 लीटर दवा) प्रति हेक्टेयर 600 से 700
लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करना चाहिए.
सकरी पत्ती वाले खरपतवार बुवाई से 25 से 30 दिन बाद आइसोप्रोट्युरॉन 50 डब्ल्यू 1.0 किग्रा० सक्रिय
तत्व (2 किग्रा० दवा) 600 से 700 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की
दर से छिडकाव करना चाहिए.
चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार 2.4 डी० (इथाइल इस्टर लवण) नामक खरपतवारनाशी रसायन का 500
ग्राम सक्रिय तत्व (1.25 लीटर दवा) को 600 से 700 लीटर पानी में
घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के 25 से 30 दिनों बाद छिडकाव
करना चाहिए.
कारफेंट्राजोन की 20 ग्राम सक्रिय तत्व (50 ग्राम दवा) की मात्रा को 600
से 700 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करना
चाहिए.
चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार के साथ बन गेहूँ सल्फोसल्फुरॉन का 25 ग्राम सक्रिय तत्व (33 ग्राम दवा)600 से 700 लीटर
पानी में घोलकर/हेक्टेयर की दर से बुवाई के 25 से 30 दिनों के बाद छिडकाव
करना चाहिए.
संकरी एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार 2.4 डी० 0.5 किग्रा० + आइसोप्रोट्युरॉनप 1.0 किग्रा० सक्रिय तत्व 600 से
700 लीटर पानी में घोलकर/हेक्टेयर की दर से बुवाई के 25 से 30 दिनों
बाद छिडकाव करना चाहिए.
जीरो टिलेज गेहूँ में खरपतवार प्रबन्धन ग्लाईफ़ोसेट दवा का 1.0 किग्रा० तथा 2 से 4 डी० ई० (38 ई० सी०) 600
ग्राम प्रति हेक्टेयर बुवाई के 7 से 10 दिन पहले 500 से 600 लीटर पानी
में घोलकर छिडकाव करना चाहिए.छिडकाव हेतु फैलेटफेन नोजन का प्रयोग
करना चाहिए.

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गेहूं में कीट एवं रोग प्रबन्धन (Pest and Disease Management in Wheat)

कीट-रोग / रोग का नाम कीट रोग/रोग के कारकों का नाम लक्षण प्रबन्धन
गेहूँ का ककरा कीट (Cut worm of wheat) एग्रोटीस इप्सिलॉन (Agrotis ipsilon) छोटे पौधों को विभिन्न जगह काटकर हानि पहुंचाते है. क्लोरपायरिफ़ॉस 20 ई० सी० से बीजोपचार (8 मिली०/किग्रा० बीज)करके बुवाई करना चाहिए.
खड़ी फसल में आक्रमण होने पर क्लोरपायरिफ़ॉस
3 लीटर/हेक्टेयर की दर छिडकाव करना चाहिए.
अनाकृत कलिका (Loose smut) यूस्टिलागो ट्रिटिसी
(Ustilago tritici)
संक्रमित पौधे में बालियाँ पहले निकलती है.बालियों में दानों की जगह काला चूर्ण बन जाता है. बीज को धूप में सुखाना चाहिए.बीटावैक्स या वेबिस्टीन (दो ग्राम प्रति किलो बीज) से बीज
उपचार करना चाहिए.

गेहूं की कटाई एवं खंदाई (Wheat harvesting and quarrying)

फसल पकने पर सुबह के समय ही कटाई करनी चाहिए.कटाई के उपारांत थ्रेशर से खदाई कराकर बीज को अलग कर लेते है.

गेहूं का भंडारण (wheat storage)

भंडारण में रखने से पूर्व बीज को अच्छी तरह से धूप में सुखा ले और बीज हेतु रखी जाने वाली किस्मों में दवा से उपचारित कर भंडारण करना चाहिए.

निष्कर्ष

तो किसान भाईयों उम्मीद है कि इस लेख के द्वारा गेंहू (Wheat farming) की खेती की पूरी जानकारी आप सभी को मिली होगी.इस लेख के जरिये गाँव किसान पर गेहूँ (Wheat farming) के फायदे से लेकर भण्डारण तक की सभी जानकारियों उपलब्ध कराई गयी है.जिसका लाभ आप सभी को मिला पाया होगा.आपको यह लेख गेंहू (Wheat farming) की खेती कैसे करे ? कैसा लगा एवं कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट करके जरुर बताये.

आप सभी लोगो का बहुत-बहुत धन्यवाद,जय हिन्द |

अन्य पूछे जाने वाले प्रश्न (Other FAQ)

प्रश्न : गेहूं की फसल में कौन सा खाद देना चाहिए?

उत्तर : गेहूँ की अच्छी उपज के लिए खरीफ की फसल के बाद भूमि में 150 कि०ग्रा० नत्रजन, 60 कि०ग्रा० फास्फोरस, तथा 40 कि०ग्रा० पोटाश प्रति हैक्टर तथा देर से बुवाई करने पर 80 कि०ग्रा० नत्रजन, 60 कि०ग्रा० फास्फोरस, तथा 40 कि०ग्रा० पोटाश देनी चाहिए.

प्रश्न : अधिक पैदावार वाली गेहूं कौन सा है?

उत्तर :  गेहूं की पूसा तेजस (Pusa Tejas Wheat) किस्म किसी वरदान से कम नहीं है. गेहूं की यह किस्म दो साल पहले ही किसानों के बीच आई है. हालांकि इसे इंदौर कृषि अनुसंधान केन्द्र ने 2016 में विकसित किया था. इसकी पैदावार 75 कुंतल प्रति हेक्टेयर है.

प्रश्न : 1 एकड़ गेहूं कितना होना चाहिए?

उत्तर : गेहूं सघनीकरण पद्धति (श्री विधि) से खेती करने पर परंपरागत विधि से प्राप्त 10-20 क्विंटल प्रति एकड़ की तुलना में 25 से 50 प्रतिशत अधिक उपज और आमदनी ली जा सकती है।

प्रश्न : गेहूं में फुटाव के लिए क्या डालें?

उत्तर :  गेहूं फसल कि 45 दिन की अवस्था में फुटाव होने पर 500 ग्राम जिंक सल्फेट 21 प्रतिशत 2.5 किग्रा यूरिया को 100 लीटर पानी में मिला कर एक एकड़ में स्प्रे करें। इसकी लागत मात्रा 30 रुपये है। इसलिए हर किसान को यह अवश्य करना चाहिए.

प्रश्न : गेहूं का बीज सबसे अच्छा कौन सा है?

उत्तर : बीज आधारित कई तकनीकी मूल्यांकन के बाद पाया गया कि HI-8663 (पोषण्) गेहूं की सबसे अच्छी और ज्यादा उपज देने वाली किस्म थी।

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