बच की उन्नत खेती – Sweet flag cultivation

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बच की उन्नत खेती
बच की उन्नत खेती - Sweet flag cultivation

बच की उन्नत खेती – Sweet flag cultivation

नमस्कार किसान भाइयों, बच की उन्नत खेती (Sweet flag cultivation) देश के कई राज्यों में की जाती है. यह एक औषधीय और सगंधीय पौधा है. इसकी खेती कर किसान भाई अच्छा मुनाफा कमा सकते है. इसलिए गाँव किसान (Gaon kisan) आज अपने इस लेख में बच की उन्नत खेती (Sweet flag cultivation) के बारे में पूरी जानकारी देगा. जिससे किसान भाई इसकी अच्छी उपज प्राप्त कर सके. तो आइये जानते है बच की उन्नत खेती (Sweet flag cultivation) के बारे में पूरी जानकारी-

बच के फायदे 

बच के बहुशाखीय सुगन्धित आकंद विभिन्न प्रकार औषधीय बनाने के काम में आती है. बच के राइजोम का तेल ग्रेस्ट्रिक, श्वास रोगों में, बदहजमी, दस्त, मूत्र एवं गर्भ रोगों में, हिस्टीरिया एवं खांसी इत्यादि रोगों में प्रयुक्त होता है.

इसके तेल से पेय व भोज्य पदार्थों को सुवासित करने, कीटनाशक व गंधद्रव्य आदि कार्यों उपयोगी है. इसके आकंद को सुखकर चूर्ण बनाया जाता है. इस चूर्ण से कीड़ों को नष्ट करने, मिर्गी, बुखार, कफ व दमा आदि रोगों के उपचार के काम में लिया जाता है.

क्षेत्र एवं विस्तार 

बच का वानस्पतिक नाम एकोरस केलमस (Araceae calamus) है. यह एरेसी (Araceae) कुल का पौधा है. इसको अंग्रेजी में स्वीट फ्लैग (Sweet flag) कहा जाता है. इसकी उत्पत्ति दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्र है. परन्तु यह पूरे विश्व में पाई जाती है. जिसमें यूरोपीय देश भी शामिल है.

बच का पौधा सम्पूर्ण भारत वर्ष में मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार आदि प्रदेशों में पाया जाता है.

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जलवायु एवं भूमि 

बच की उन्नत खेती के लिए तापमान 10 डिग्री से 38 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त होता है. इसके अलावा वार्षिक वर्षा 70 सेमी० से 250 सेमी० तक हो उपयुक्त होती है.

इसकी खेती विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है. लेकिन बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है. इस बात का ध्यान जरुर रखे भूमि पर सिंचाई की उपयुक्त व्यवस्था होनी चाहिए. क्योकि सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था न होने से बच की खेती नही करनी चाहिए.

भूमि की तैयारी

बच की खेती के लिए वर्षा से पहले भूमि की दो-तीन बार अच्छी तरह जुताई कर लेनी चाहिए। रोपाई से पहले भूमि की तैयारी धान की तैयारी की तरह की जानी चाहिए। भूमि को थोड़ी दलदली बनाया जाए तो ज्यादा उपयुक्त होगा।

बच की बिजाई अथवा संवर्धन

बच की खेती के लिए इसके राइजोम को लगाया जाता है। इसके लिए प्लांटिंग मेटेरियल प्राप्त करने हेतु इसके पुराने राइजोम को ऐसी मिट्टी में जहां लगातार नमी बनी रहती हो, दबाकर रखा जाता है। इनमें नये अंकुरण होने पर इन राइजोम को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर इनका रोपण किया जाता है।

रोपाई

काटे गए राइजोम के टुकड़ों को तैयार की गई भूमि में 30×30 से.मी. के अंतराल पर मिट्टी के लगभग 4 से.मी. अंदर बरसात शुरू होने से पहले अथवा बरसात शुरू होते ही जून माह में लगाया जाता है। इस प्रकार प्रति हेक्टेयर लगभग 1,11,000 पौधे लगाये जाते है। यदि भूमि गीली अथवा दलदली न हो तो रोपाई के तुरन्त बाद आवश्यक रूप से पानी देना चाहिए। बच की वृद्धि दर बहुत अच्छी होती है। तथा दूसरे दिन से ही पौधों में वृद्धि दिखाई पड़ने लगती है।

खाद

अच्छी फसल के लिए लगभग 15 ट्राली गोबर खाद अथवा कम्पोस्ट खाद प्रति हैक्टेयर की दर से रोपाई से पहले भूमि में मिला देनी चाहिए।

सिंचाई

बच की कृषि तकनीकि का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसके लिए पानी की अत्याधिक आवश्यकता है। वर्षा ऋतु में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। बाकी दिनों में 2-3 दिन के अंतराल में सिंचाई होना वांछित होता है। विशेष रूप से नदी-नालों के किनारे की जमीनें जहां हमेशा दलदल रहता हो या जहां पानी भरा रहता हो तथा जहां कोई अन्य खेती न ली जा सकती हो, वहां इसकी खेती बहुत अधिक लाभदायक होती है।

निकाई-गुड़ाई

बच की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए खरपतवार पर नियंत्रण तथा जमीन के वायु विनमय के लिए समय-समय पर निकाई एवं गुड़ाई आवश्यकतानुसार करते रहना चाहिए।

राइजोम का निकालना

8-9 माह की खेती के बाद मार्च-अप्रैल माह में जब बच के पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगती है व सूखने लगती हैं तब इसके पौधे को जड़ समेत जमीन से खोदकर निकाल लेना चाहिए। यदि खेती बड़े स्तर पर की जा रही हो तो हल चलाकर भी राइजोम निकाले जा सकते हैं। पत्तियों को राइजोम से काटकर अलग कर लिया जाना चाहिए।

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सुखाना

निकाले गए राइजोम को पानी में धोए बिना साफ करके छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर छायादार जगह में फैलाकर सुखाया जाता है। (जिससे इसमें उपस्थित तेल की मात्रा का हास न हो) तथा तद्नुसार बोरों में भरकर विक्रय हेतु भिजवाया जा सकता है।

प्रसंस्कृत उत्पाद

उडनशील तेल (Volatile Oil)

बच के सूखे राईजोम को वाष्प आसवन करने से 1.5-3.5 प्रतिशत तक उड़नशील सुगंधित तेल निकाला जाता है। हल्के पीला रंग के इस तेल की सुगंध कुछ पचौली के तेल के सदृश्य है। वाष्प आसवन के पूर्व सूखे राईजोम को छोटे-छोटे टुकड़ों में डिस्इन्टीगेटर द्वारा किया जाता है जिससे सुगंधित तेल का उत्पादन ज्यादा लगभग 4.6 प्रतिशत तक हो जाता है। आसवन में समय ज्यादा लगभग 12-14 घंटा लगता है।

बच के सुगंधित तेल की कीमत 2005 में 1300-1400 /किलोग्राम था जो 2009-10 में 2300-2500/किलोग्राम हुआ। वैश्विक बाजार में बच के तेल की कीमत वर्तमान दर लगभग 6600/- किलोग्राम है। राज्य में आगामी खरीफ में बच की खेती अच्छी आय देने वाला फसल हो सकता है।

किसान भाईयों उम्मीद है बच की उन्नत खेती के बारे में आप सभी को जानकारी मिल पायी होगी. जानकरी पसंद आई हो तो कमेंट और शेयर जरुर करे. जिससे ज्यादा से ज्यादा किसान भाईयों को लाभ मिल सके.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द .

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