चुकंदर की उपज की खुदाई एवं कारखाने को भेजा जाने का क्या महत्व है ? आइए जाने पूरी जानकारी 

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importance of digging beet produce
उपज की खुदाई एवं कारखाने को भेजा जाना

उपज की खुदाई एवं कारखाने को भेजा जाना

चुकंदर की उपज में जड़ों की खुदाई एवं उसको कारखाने में भेजने का विशेष महत्व है. क्योंकि इसकी परिपक्वता पर सही समय पर खुदाई एवं पत्तों आदि की कटाई की गई जड़ों का चीनी की उपलब्धता एवं अंततः कारखाने की सफलता पर विशेष प्रभाव पड़ता है तो आइए जानते हैं चुकंदर की उपज की खुदाई एवं कारखाने को भेजे जाने का क्या महत्व है ? इसकी पूरी जानकारी-

चुकंदर की उपज की खुदाई

देश में चुकंदर की खुदाई मार्च के अंतिम सप्ताह से मई के मध्य तक होती है. इसकी उपज के इस अंतिम चरणों में जड़ों की खुदाई से संबंधित मूल उद्देश्य होता है. कि साबुत जड़े खेत से ही निकाली जाए. जिनके साथ कम से कम मिट्टी चिपकी हो एवं पत्तों आदि को उपयुक्त स्थान से जहां वे जड़ से लगे रहते हैं. उसी भाग से सीधी काट दी जाए.

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विदेशों में चुकंदर की खुदाई एवं पत्तों की कटाई तथा कारखाने में भेजने हेतु योग्य जड़ों को ठेलों में भरने आदि का कार्य पूर्ण रूप से यांत्रिक होता है. भारत में या अन्य किसी देश में जहां चुकंदर की खेती बहुत बड़े पैमाने पर अभी तक शुरू नहीं हुई है. वह या तो पूर्णतः मानव शक्ति द्वारा या मानव शक्ति एवं यांत्रिक शक्ति के मिले-जुले तरीके से इसकी खुदाई की जाती है तथा कारखानों में भेजा जाता है.

चुकंदर खुदाई के लिए नमी 

चुकंदर की वांछित खुदाई के लिए खेत की नमी की स्थिति का बहुत असर पड़ता है. भूमि के प्रकार पर निर्भर अंतिम सिंचाई खुदाई  से 2 सप्ताह अथवा कम से कम 1 सप्ताह पूर्व  की जानी चाहिए.  यदि खेत में बिल्कुल भी नमी नहीं है एवं यदि खेत की मिट्टी भारी है. तो खुदाई के समय जड़े बहुत अधिक मात्रा में टूटेगी एवं यदि मिट्टी बहुत गीली है तो जड़ों के साथ अधिक मिट्टी चिपकी हुई निकलेगी तथा जोड़ों में शर्करा की मात्रा और तथा रस की गुणवत्ता में भी कमी होगी.

शर्करा की मात्रा की करे जांच 

चुकंदर की जड़ों की उपयुक्त परिपक्वता का पता लगाने के लिए खेत से नमूने की जड़े लेकर उनमें शर्करा की मात्रा का विधवत पता लगाया जाना चाहिए. एवं जब शर्करा की मात्रा अधिकतम सीमा पर पहुंच जाती है. तभी जड़ों की उपयुक्त परिपक्वता मानी जाएगी. वैसे से मोटे तौर पर यह स्थित अर्थात जड़ों की उपर्युक्त परिपक्वता खेत को देखकर भी समुचित सीमा तक ही प्रकार से आंकी जा सकती है.

इस स्थिति में खेत के किनारों पर लगे हुए चुकंदर के पौधों के पत्ते तो गहरे हरे रंग के होते हैं. किंतु खेत के मध्य भाग के पौधों के पत्ते पत्ते पीले रंग के हो जाते हैं. तब या समझा जाता है कि इस की जड़ों में अधिकतम शर्करा एकत्रित हो गई है. तथा खेत की जड़े खुदाई योग्य हो गई हैं. खेत की इस स्थिति से स्पष्ट किनारों का असर (Border Effect) कहते हैं.

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चुकंदर में एक फसल में दो फसल

खुदाई के उपरांत चुकंदर की जड़ों के ऊपरी भाग को जहां सबसे नीची पत्ती का निशान होता है. वहां से सीधा काट देना चाहिए. सही स्थान से काटी गई चुकंदर से कारखानों से प्राप्त रस की शुद्धता अधिक पाई जाती है. एवं चीनी की उपलब्धता भी अधिक होती है. जड़ का काटा हुआ ऊपरी भाग तथा पत्ते पशुओं के लिए अत्यधिक पौष्टिक आहार होते हैं. एवं इन्हें पशु अत्यधिक चाव से खाते हैं. पशु आहार चुकंदर के पत्तों एवं जड़ के ऊपरी भाग को पौष्टिकता के विस्तृत अध्ययन के आधार पर बहुत उच्च कोटि का माना गया है. इसी कारण चुकंदर को एक फसल में दो फसल भी कहा जाता है.

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