Walnut farming – अखरोट की खेती कैसे करे ? (हिंदी में)

0
2008
walnut farming
अखरोट की खेती (Walnut farming) कैसे करे ?

अखरोट की खेती (Walnut farming) कैसे करे ?

नमस्कार किसान भाईयों, अखरोट की खेती (Walnut farming) देश के ज्यादातर पहाड़ी क्षेत्रों की जाती है. इसके फल से एक प्रकार का सूखा मेवा प्राप्त होता है. जो कि खाने के लिए उपयोग किया जाता है. अखरोट की खेती या बागवानी कर अच्छा लाभ कमाया जा सकता है. इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस के जरिये अखरोट की खेती (Walnut farming) की पूरी जानकारी देगा वह भी अपनी भाषा हिंदी में. जिससे किसान भाई इसकी अच्छी उपज प्राप्त कर सके. तो आइये जानते है अखरोट की खेती (Walnut farming) की पूरी जानकारी-

अखरोट के फायदे 

अखरोट का फल पोषक तत्वों से भरपूर होता है. इसमें फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट एवं असंत्रप्त फैटी अम्ल विशेषकर लिनोलेनिक एसिड और ओमेगा-3 फैटी एसिड पाए जाते है. जो ह्रदय के लिए बहुत ही लाभदायक होते है. नियमित अखरोट के सेवन से रक्त के थक्के बनने की संभावना कम हो जाता है. यह एच० डी० एल० नामक अच्छे कोलेस्ट्रोल को बढाता है. तथा एच० डी० एल० नाम ख़राब कोलेस्ट्रोल को कम करता है. जो ह्रदय के लिए लाभदायक होता है. यह रक्तचाप को नियमित रखने में मदद करता है. इसके अलावा यह हड्डियों एवं दिमाग की शक्ति को बढ़ता है.

इसके सेवन से विटामिन ए, विटामिन बी, विटामिन सी, प्रोटीन, फाइबर, फोलेट एवं आवश्यक खनिज तत्व जैसे पोटेशियम, फ़ॉस्फोरस, जिंक, लोहा, सोडियम एवं मैग्नीशियम भी प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

अखरोट का वानस्पतिक नाम जुग्लांस निग्रा (Jugians Nigra) है. जो कि जुग्लांस (Jugians) परिवार से तालुक रखता है. अखरोट का उत्पत्ति स्थान मध्य एशिया में ईरान तथा अफगानिस्तान माना जाता है. विश्व में भारत, मेक्सिकों, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, इटली, नेपाल, भूटान, श्री लंका, पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि देशों में की जाती है. भारत में इसकी खेती अव्यवस्थित एवं अव्यवसायिक रूप से हिमालयी राज्यों में जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश एवं अरुणाचल प्रदेश आदि राज्यों में की जाती है.

जलवायु एवं भूमि 

अखरोट की खेती 1300 से 2500 मीइतर की ऊंचाई तक के सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्र में सफलता पूर्वक की जा सकती है. लेकिन यह क्षेत्र पाला रहित एवं गर्मियों में अधिक तापमान न रहता हो . सुसुप्तावस्था में अखरोट -11 डिग्री सेल्सियस तापमान को भी सहन कर सकता है. लेकिन नई वृध्दि के लिए 2 से 3 डिग्री सेल्सियस तापमान भी फलों और पत्तियों के लिए नुकसानदायक होता है. इसी तरह 37.8 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान भी अखरोट के लिए नुकसानदायक होता है. 20 से 28 डिग्री सेल्सियस का तापमान अखरोट की खेती के लिए सर्वोत्तम होता है.

इसकी खेती के लिए गहरी जीवांशयुक्त दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है. भूमि की गहराई 3 मीटर होनी चाहिए. जो मोटे कंकड़ पत्थर से मुक्त हो, जिससे जड़ों का अच्छी प्रकार विकास हो सके. भूमि का पी० एच० मान 5.5 से 6.5 तक का होना उत्तम रहता है. भूमि से जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए.

यह भी पढ़े Pear Farming – नाशपाती की खेती कैसे करे ? (हिंदी में)

उन्नत किस्में (Walnut farming)

अखरोट के पेड़ बहुत ही सुन्दर और सुगन्धित होते है. इसकी दो जातियां पायी जाती है. पहले जंगली अखरोट जो अपने आप उग आते है. इनकी लम्बाई 100 से 200 फीट तक होती है. इसके फल का छिकला मोटा होता है. कृषिजन्य अखरोट के वृक्ष की लम्बाई 40 से 90 फुट तक होती है. और इसके फलों का छिकला पतला होता है. इन्हें कागजी अखरोट कहा जाता है.

आर्थिक द्रष्टिकोण से अधिक उत्पादन लेने के लिए उत्तम प्रजाति के पौधे लगाना चाहिए, जिससे अधिक से अधिक लाभ ले सके. भारत के मुख्य अखरोट उत्पादक राज्यों में उगाये जाने वाली प्रमुख अखरोट की किस्में निम्नवत है-

जम्मू-कश्मीर के लिए किस्में – गोविन्द, रूपा, यूरेका, प्लेसेंटिया, विल्सन आदि प्रमुख किस्में है.

उत्तराखंड के लिए किस्में – चकराता सेलेक्शन, चान्डलर, हार्टले आदि प्रमुख किस्में है.

आयातित किस्में – चान्डलर, हार्टले, पेने, फ्रेकेंट, सेर, एसले, सनलैंड, चीको, वीना, होवार्ड, पेड्रो, तेहामा, यूरेका, मेरिक, स्पैरो, थॉमस, ओहियो आदि प्रमुख किस्में है.

भारतीय किस्में – गोविन्द, रूपा, करण, लक्ष्मी, तपन, बुलबुल, चकराता सेलेक्शन आदि प्रमुख इसमें है.

प्रवर्धन की विधियाँ 

अखरोट का प्रवर्धन बीज व वानस्पतिक दोनों विधियों द्वारा किया जाता है. बीज द्वारा विकसित पौधे से प्राप्त फल सामान्यतः कम गुणवत्ता युक्त एवं कठोर होते है. और 8 से 10 वर्ष बाद फल देते है. बीज का मुख्य उपयोग मूल्व्रांत तैयार करने के लिए होता है. बीजू पौधे तैयार करने के लिए बीजों को नवम्बर-दिसम्बर में 3 से 5 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर अच्छी तरह से क्यारियों में 7 से 8 सेमी० गहराई पर 30 सेमी० पंक्ति से पंक्ति एवं बीज से बीज की दूरी पर बोया जाता है.

जिबरेलिक अम्ल 125 से 200 पी पी एम को 24 घंटे के उपचार से बीजों के अंकुरण में वृध्दि होती है. मार्च के शुरुवात में अंकुरण प्रारंभ हो जाता है तथा एक वर्ष पश्चात पौध रोपण तथा वानस्पतिक प्रवर्धन के लिए तैयार हो जाते है.

अखरोट का व्यवसायिक प्रवर्धन मुख्यतः वानस्पतिक प्रवर्धन विधियों जैसे ग्राफ्टिंग, बडिंग तथा स्टूलिंग द्वारा किया जाता है. हालाँकि प्रतिशत सफलता, पोम व स्टोन फलों की अपेक्षा बहुत कम होती है. पैच बडिंग अखरोट के प्रवर्धन की व्यवसायिक विधि है. जिसमें 30 से 35 प्रतिशत सफलता प्राप्त होती है. मध्य जून बडिंग का उचित समय माना जाता है. जबकि प्रवर्धन में क्लैफ्ट या जिव्हा कलम विधि बहुत ही प्रचलित है. जिसको मध्य जनवरी से मध्य मार्च के मध्य करना चाहिए.

रेखांकन एवं पौध रोपण 

पौध रोपण के लिए गड्ढे खोदने के पूर्व बगीचे का रेखांकन समतल भूमि पर वर्गाकार या आयताकार विधि से तथा ढलावदार भूमि पर कंटूर या सीढ़ीनुमा पद्यति से करना चाहिए. गड्ढों का रेखांकन अखरोट की किस्मों के बढवार के स्वभाव के अनुसार 10 से 12 मीटर की दूरी पर करना चाहिए. क्योकि अखरोट की टर्मिनल फलत वाली किस्मों को अधिक दूरी एवं लेटेरल फलत वाली किस्मों को कम दूरी की आवश्यकता होती है.

अन्य शीतोष्ण फलों की तरह अखरोट भी जाड़े के मौसम में, जब पौधे सुसुप्तावस्था में या पतझड़ में रहते है. तभी लगाया जाना चाहिए. पौधों पर की गई कलम (यूनियन) जमीन की सहत से कम-से-कम 10 से 15 सेमी० ऊपर होनी चाहिए.पौधे को चारो तरफ अच्छी तरह से दबा देना चाहिए. पौध रोपण का उचित समय दिसम्बर की समाप्ति से फरवरी के आरम्भ तक होता है. रोपाई के तुरंत बाद पौधे को हल्का पानी देना चाहिए.

गड्ढों की तैयारी (Walnut farming)

नर्सरी में तैयार अखरोट के कागजी कलमी पौधे के रोपण के लिए एक दो माह पूर्व अर्थात अक्टूबर माह में तैयारी शुरू कर देनी चाहिए. गड्ढों को एक घन मीटर का आकार किखुदै कर लेनी चाहिये. गड्ढा खोदते समय ऊपर एवं नीचे की मिट्टी को अलग-अलग रख लेना चाहिए. गड्ढे भरते समय प्रति गड्ढा 20 से 25 किग्रा गोबर की सड़ी हुई खाद को निचली मिट्टी में मिश्रित किया जाता है. जबकि उपरी सतह की मिट्टी में 15 से 20 किग्रा० गोबर की खाद, 500 ग्राम सिंगल सुपेर फ़ॉस्फेट, 50 ग्राम फ्यूराडान धूल या कार्बोफ्यूरान ग्रेन्यूल एवं 50 ग्राम डाईथेन एम-45 को मिलाया जाता है. गड्ढों को दबाकर भरा जाता है. कि गड्ढों की सतह भूमि की सतह से कम से कम 6 इंच ऊपर रहे. गड्ढे भरने के उपरांत हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए. जिससे मिट्टी ठीक प्रकार बैठ जाय.

खाद एवं उर्वरक (Walnut farming)

अखरोट की अच्छी उपज के लिए खाद एवं उर्वरकों की उचित मात्रा सही समय पर वृक्षों को देनी अति आवश्यक है. उराव्राको का प्रयोग वृक्ष के फैलाव के अनुसार थालों में नाली बनाकर करना चाहिए. इसके लिए गोबर की सड़ी हुई खाद 50 से 100 किग्रा प्रति पेड़ प्रति वर्ष देनी चाहिए. इसके अलावा 25 ग्राम नाइट्रोजन, 50 ग्राम फ़ॉस्फोरस और 25 ग्राम पोटाश प्रति पेड़ प्रति वर्ष के अनुसार बढाकर 25 वर्ष तक देनी चाहिए. इसके बाद मात्रा स्थिर कर देनी चाहिए. उर्वरकों का प्रयोग कलियों के फूटने से पूर्व फरवरी में करना चाहिए.

सिंचाई (Walnut farming)

अखरोट की सफल बागवानी के लिए सिंचाई का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है. गुणवत्ता पूर्ण अखरोट के फल के लिए अच्छी वृध्दि के लिए नियमित अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए. अखरोट के पेड़ को 50 प्रतिशत पानी ग्रीष्म ऋतु में आवश्यक होता है. अखरोट के फल की सर्वाधिक वृध्दि फूल आने के 5वें से 7वें सप्ताह में होती है. इस दौरान नियमित अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए. अन्यथा इसके फल की गुणवत्ता और आकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.

फूल और फल आने का समय 

अखरोट का बीजू पौधा 10 से 12 वर्ष एवं कलमी पौधा 4 से 5 वर्ष पश्चात फसलोत्पादन प्रारम्भ कर देता है. अखरोट का वृक्ष द्विलिंगी होता है. अर्थात नर व मादा पुष्प एक ही वृक्ष पर अलग-अलग लगते है. नर फूल पिछले वर्ष की पार्श्व शाखाओं पर 5 से 10 सेमी० लम्बे झुके हुए कैटकिन पर लगते है जबकि मादा फूल 2 से 5 फूलों के गुच्छे में वर्त्तमान वृध्दि वाली शाखाओं के शीर्ष पर लगते है. फूलो के निकलने का समय मध्य अप्रैल से मई के प्रथम सप्ताह तक होता है. तथा फल लगने का समय अगस्त से अक्टूबर तक किस्म तथा स्थान विशेष की जलवायु के अनुसार तैयार होते है.

तुड़ाई एवं उत्पादन (Walnut farming)

अखरोट के फलों की तुड़ाई कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सितम्बर-अक्टूबर तथा अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अक्टूबर-नवम्बर में की जाती है. उचित परिपक्व अवस्था के निर्धारण हेतु जब वृक्षों में लगभग 80 प्रतिशत अखरोटों के आवरण फट जाते है और फलको प्रदर्शित करने लगे तब कुछ दिनों के अंतराल पर 2 से 3 बार में तुड़ाई कर लेनी चाहिए.

वृक्ष की शाखों को हिलाकर या हाथों द्वारा तोड़कर फलों को जमीन या जाल पर गिराकर इकठ्ठा किया जाता है. फल को उठाकर साफ किया जाता है. तथा उनको धोकर एक चादर या फर्श पर सुखाया जाता है.

एक बीजू अखरोट का वृक्ष औसतन लगभग 10 से 12 वर्ष अखरोट पैदा करने में लेता है. जबकि कलमी पौधों से 4 से 5 वर्ष उपरान्त फल मिलने लगते है. एक स्वस्थ एवं परिपक्व अखरोट के वृक्ष से 50 से 150 किग्रा० अखरोट प्राप्त किये जा सकते है

यह भी पढ़े Ginger farming – अदरक की खेती की पूरी जानकारी (हिंदी में)

प्रमुख कीट व रोग एवं प्रबन्धन 

प्रमुख कीट एवं रोकथाम 

अखरोट वीविल – यह कीट अपने अंडे फल के ऊपर देते है. जो कि हैचिंग के उपरांत फल के अन्दर प्रविष्ट कर जाते है. और गिरी को खाते है. फलस्वरूप पकने के पूर्व फल गिर जाते है.

रोकथाम – इस कीट की रोकथाम के लिए ग्रसित फलों को एकत्र कर नष्ट कर दे. कालिका आने के उपरान्त 0.02 प्रतिशत कार्बेरिल का सात दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करे.

कोडलिंग मौथ – यह कीट लद्दाख क्षेत्र में पाया जाता है. और इसके फल को प्रभावित करता है

रोकथाम – इस कीट की रोकथाम के लिए डाइसल्फोटोन के 5 प्रतिशत मिश्रण को पेड़ के चारो तरफ मिलाये तथा फास्फ़ोमिडान 0.03 प्रतिशत का छिड़काव करे.

प्रमुख रोग एवं रोकथाम 

वालनट ब्लाईट – यह रोग जीवाणु जनित होता है जो कि इसकी पत्तियों एवं गिरी पर लगता है. अधिकतर गीले एवं नाम मौसम में लगता है. फलस्वरूप गिरी सिकुड़कर सूख जाती है या रंगहीन हो जाती है. इसके अलावा पत्तियां सूख जाती है.

रोकथाम – इस रोग की रोकथाम के लिए मादा फूल खिलने के साथ ही बोरडियाक्स मिश्रण का छिड़काव एक या दो सप्ताह के अंतराल पर करना चाहिए.

केंकर रोग – इस रोग का प्रभाव छाल और पत्तियों पर दिखाई पाता है. जिससे ग्रसित नई पत्तियां मर जाती है.

रोकथाम – इस रोग की रोकथाम के लिए ग्रसित भाग को खुरचकर निकल देना चाहिए. इसके अलावा 50 प्रतिशत कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के पेस्ट को ग्रसित भाग पर लगाना चाहिए. या ब्लाइटोक्स के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है गाँव किसान (Gaon Kisan) के अखरोट की खेती (Walnut farming) से सम्बन्धित इस लेख से आप को सभी जानकारियां मिल अपायी होगी. गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा अखरोट के फायदे से लेकर अखरोट के कीट एवं रोग प्रबन्धन तक की सभी जानकारियां दी गयी है. फिर भी अखरोट की खेती (Walnut farming) से सम्बन्धित कोई आपका प्रश्न हो तो कम्नेट बॉक्स में कम्नेट कर पूछ सकते है. इसके अलावा गाँव किसान (Gaon Kisan) का यह लेख आपको कैसा कमेन्ट कर जरुर बताएं. महान कृपा होगी.

आप सभी लोगो का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here