Tamarind Farming – इमली की खेती की पूरी जानकारी (हिंदी में)

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Tamarind farming
इमली की खेती (Tamarind Farming) की पूरी जानकारी

इमली की खेती (Tamarind Farming) की पूरी जानकारी

नमस्कार किसान भाईयों, इमली की खेती (Tamarind Farming) इसके फल के लिए की जाती है. यह काफी लाभप्रद होता है. वैसे इमली तो एक जंगली पौधा है. लेकिन किसान भाई इसे उगाकर अच्छा लाभ ले सकते है. इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख के द्वारा इमली की खेती (Tamarind Farming) की पूरी जानकारी देगा, वह भी अपनी भाषा हिंदी में. जिससे किसान भाई इसे अच्छी तरह उगाकर अच्छी उपज ले सके. तो आइये जानते है इमली की खेती (Tamarind Farming) की पूरी जानकारी-

इमली के फायदे 

इमली के वृक्ष से किसान भाई कई प्रकार से लाभ प्राप्त कर सकते है जो निम्नवत है-

निर्माण कार्य में – इमली के पेड़ से प्राप्त लकड़ी कठोर और मजबूत होती है. इसका उपयोग नक्खाशीदार कार्यों में उपयोग की जाती है. इससे दरवाजे की नक्खाशी दार चौखटे बनायी जाती है. इसके अलावा फर्नीचर, तख्तों एवं स्थानीय रूप से कृषि यंत्रों में होता है.

ईधन के रूप में – इमली की लकड़ी कठोर और भारी होती है. इसका विशिष्ट घनत्व लगभग 0.86 होता है. यह ईधन के लिए बिलकुल उपयुक्त होती है. इसकी लकड़ी से उत्तम कोटि का चारकोल बनाया जाता है. इसकी लकड़ी से बारूद भी बनाया जाता है.

चारे के रूप में – इमली की पत्तियां चारे के रूप में उपयोगी रहती है. इसकी पत्तियों में पोषक तत्वों उचित मात्रा में पाया जाता है. इमली की पत्तियों से कच्चे प्रोटीन की मात्रा 13.4 प्रतिशत, रेशा की मात्रा 15.9 प्रतिशत, नाइट्रोजन 46 प्रतिशत, ईथर की मात्रा 8.9 प्रतिशत आदि पोषक तत्व प्राप्त होते है.

औषधि के रूप में – इमली की जड़ से लेकर फल तक किसी न किसी रूप में औषधि के लिए उपयोग किया जाता है. इमली की जड़ की छल को सुखाकर काढ़ा बनाकर पीने से पेचिस एवं अतिसार में फायदा मिलता है. वृक्ष की छाल की राख पाचक एवं शक्तिवर्धक होती है. इसकी पत्तियों को पीसकर सूजन या फोड़े पर लगाने से दर्द कम हो जाता है. इसके अलावा यह पित्त, बुखार और मूत्र की जलन को भी कम करती है.

इसकी फलियों से विभिन्न प्रकार की औषधियों का निर्माण किया जाता है. इससे वात, विकार, रेचक, ज्वर आदि रोगों की औषधियों में प्रयोग किया जाता है. इसकी पुरानी फलियों से पेट दर्द, गठिया एवं उल्टी में लाभदायक होती है. इससे खाने वाले उत्पादों का भी निर्माण किया जाता है. इससे सॉस, चटनी एवं शीतल पेय आदि बनाया जाता है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

इमली का वानस्पतिक नाम टैमेरिंडस इंडिका (Tamarindus indica linn.) है. यह लेग्यूमिनोसी कुल का पौधा है. इमली का उत्पत्ति स्थल अफ्रीका के उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में विशेष रूप से मध्य अफ्रीका देशों में है. विश्व में यह बर्मा, श्रीलंका, भारत एवं दक्षिण पूर्व एशिया आदि देशों में पाया जाता है. भारत में यह हिमालय क्षेत्रों में उत्तर पश्चिम में झेलम नदी तक इमली का सर्वत्र व्यापक क्षेत्र है. भारत के ज्यादातर राज्यों मे इसके वृक्ष पाए जाते है.

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जलवायु एवं मिट्टी (Tamarind Farming)

इमली के वृक्ष के लिए उष्ण कटिबंधीय जलवायु उत्तम रहती है. उष्ण जलवायु की गर्मी एवं गर्म हवाओं (लू) को सहन करने में सक्षम है. जबकि ठंडी जलवायु में पाले से इसकी वृध्दि पर बुरा एवं विपरीत प्रभाव पड़ता है.

इसका वृक्ष लगभग सभी प्रकार की भूमि में सफलता पूर्वक उगाये जा सकते है. यह दोमट, जलोढ़, बलुई एवं लवण युक्त मृदा में भी वृध्दि करने में सक्षम है. इमली के वृक्षों की अच्छी बढवार के लिए नमी युक्त गहरी दोमट मिट्टी एवं गहरी जलोढ़ मिट्टी उपयुक्त होती है.

इमली की किस्में

इमली की कोई विशेष विकसित किस्म नहीं है फिर भी कुछ किस्मों में उरगम, तेतेली, तेंतुल, आमली, पुली आदि प्रमुख है.

बुवाई के लिए बीज (Tamarind Farming)

इमली के बीज के लिए फलियों को पेड़ पर पूरी तरह पकने दिया जाता है. पकने पर इनको तोड़कर इक्कठा कर लिया जाता है. पकी हुई फलियों को 10 से 12 दिन तेज धूप में सुखाया जाता है. जिससे छिलका अपने आप से हट जाता है. जिसे हाथ से आसानी से हटाया जा सकता है. एक फली में सामान्यतः 8 से 12 बीज होते है. इन्हें पानी से धोकर सुखाकर भंडारित किया जाता है. एक किलोग्राम बीज में सामान्यत 900 से 1000 बीज होते है. यदि बीज हल्के और छोटे है तो इनकी संख्या 1800 से 2000 तक होती है.

पौध बुवाई एवं तैयारी

इमली की पौध तैयार करने के लिए उस भूमि का चयन करना चाहिए. जहाँ पर सिंचाई के उचित साधन उपलब्ध हो. मार्च महीने में खेत को अच्छी प्रकार साफ कर जुताई करके क्यारियाँ तैयार कर लेनी चाहिए. क्यारियों में सिंचाई हेतु नालियां भी बना लेनी चाहिए. क्यारियों की लम्बाई एवं चौड़ाई 1 x 5 मीटर रखनी चाहिए.

सभी क्यारियों गोबर की सड़ी हुई खाद मिट्टी में अच्छी प्रकार मिलानी चाहिए. इसके बाद मार्च के द्वितीय सप्ताह से अप्रैल के प्रथम सप्ताह के मध्य में बीज की बुवाई का उपयुक्त समय होता है. अच्छे अंकुरण के लिए बीजों को 24 घंटे पहले पानी में भिगोना चाहिए.

बीजों की बुवाई 6 से 7 सेमी० गरी में 15 से 20 सेमी० की दूरी पर लाइनों में करना चाहिए. बीजों का अंकुरण एक सप्ताह बाद शुरू हो जाता है. एवं पूर्ण अंकुरण में 1 माह तक का समय लग जाता है. इस दौरान क्यारी में पर्याप्त नमी बनाये रखने के लिए सप्ताह समय-समय पर सिंचाई अवश्य करे.

निराई-गुड़ाई एवं उर्वरक 

जब पौधा का अंकुरण हो जाय तो तो खरपतवार के नियंत्रण के लिए गुड़ाई बहुत ही आवश्यक है. खरपतवार रहित भूमि में पौधे की अच्छी वृध्दि होती है. जुलाई-अगस्त में 15 से 20 ग्राम प्रति पौधे की दर से उर्वरक देने पर एक वर्ष में ये अंकुरित पौधे 60 सेमी० तक वृध्दि करने में सफल रहते है. बुवाई के तीन से चार माह बाद पौधे एक फुट के हो जाते है. रोपण के उपयुक्त हो जाते है.

पौध रोपण (Tamarind Farming)

नर्सरी में तैयार पौधों की रोपाई के लिए मानसून के पूर्व एक घन फुट आकार के गड्ढे तैयार कर लेना चाहिए. इन गड्ढों के मध्य 4 x 4 मीटर अथवा 5 x 5 मीटर की दूरी रखनी चाहिए. बाग़ के रूप में लगाने हेतु 10 से 12 मीटर की दूरी पर आधे घन मीटर के आकार के गड्ढे तैयार करने चाहिए. सडक के किनारे दोनों किनारे पर आकर्षक एवं छायादार रोपण के उद्देश्य से 6-6 मीटर की दूरी पर गड्ढे बनाने चाहिए. नर्सरी में तैयार पौधों को मिट्टी की पिंडी सहित निकाल कर रोपित करने के बाद पर्याप्त मात्रा में पानी देना चाहिए.

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रोग एवं कीट रोकथाम 

प्रमुख रोग एवं रोकथाम 

नर्सरी में इमली के पौधों को अंकुरण के दौरान या बाद में स्क्लेरोशियम रोल्फसाई नामक कवक के आक्रमण से प्रभावित हो जाता है. जिसके कारण पौधों में विगलन शुरू हो जाता है. कभी-कभी पूर्व नियंत्रण के अभाव में नर्सरी में इमली के पौधों का नुकसान पहुँचता है.

रोकथाम के लिए रोग ग्रस्त टहनियों, पत्तियों एवं फलियों को बढ़ने से रोकने के लिए तोड़कर जला देना चाहिए. नर्सरी में पौधों के विगलन को रोकने के लिए बीज बोने से पूर्व कवकनाशी रसायन से बीज को उपचारित कर लेना चाहिए.

प्रमुख कीट एवं रोकथाम 

इमली के पेड़ में विभिन्न प्रकार के कीटों का प्रकोप रहता है. जिसमे मुख्य रूप से तना भेदक कीट, फलियों एवं पत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट है. भंडारित किये गये बीजों को भी कीट से हानि होती है.

रोकथाम के लिए कीटनाशी रसायन के लिए का छिड़काव करना चाहिए. बीजों को भंडारण से पहले साथ में कीट रोधी दवा का इस्तेमाल करना चाहिए.

उपज (Tamarind Farming)

इमली की एक वृक्ष से औसतन एक वर्ष में 50 से 100 किग्रा० फलियाँ प्राप्त होती है. पूर्ण विकसित वृक्ष से अधिकतम 2 कुंटल फलियाँ वार्षिक प्राप्त होती है.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है गाँव किसान (Gaon Kisan) के इमली की खेती (Tamarind Farming) से सम्बन्धित इस लेख से सभी जानकारियां मिल पायी होगी. गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा इमली के फायदे से लेकर इमली की उपज तक की सभी जानकारियां दी गयी है. फिर भी इमली की खेती (Tamarind Farming) से सम्बंधित आप का कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा गाँव किसान (Gaon Kisan) का यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताये. महान कृपा होगी.

आप सभी लोगो का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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