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String beans farming – लोबिया की खेती की पूरी जानकारी (हिन्दी में)

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String beans farming
लोबिया की खेती (String beans farming) की पूरी जानकारी

लोबिया की खेती (String beans farming) की पूरी जानकारी

नमस्कार किसान दोस्तों, लोबिया की खेती (String beans farming) भारत में पूरे साल दाने और चारे के लिए की जाती है. इसकी खेती कर किसान भाई को अच्छा मुनाफा मिल सकता है इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख में लोबिया की खेती (String beans farming) की पूरी जानकारी लाया है, वह भी अपने देश की भाषा हिंदी में. जिससे किसान भाई इसकी अच्छी उपज प्राप्त कर सके. तो किसान भाई आइये जानते है लोबिया की खेती (String beans farming) की पूरी जानकारी-

लोबिया के फायदे 

लोबिया एक पौष्टिक सब्जी है, जिसे हरी फलियों के लिए लगाया जाता है. इसके सूखे दानों को दाल एवं अन्य व्यंजनों के लिए भी प्रयोग में लाते है. लोबिया के 170 ग्राम पके दानों में 13 ग्राम प्रोटीन, फैट 0.9 ग्राम, फाइबर 11 ग्राम, मैग्नीशियम 21 प्रतिशत, विटामिन बी 10 प्रतिशत, पोटेशियम 10 प्रतिशत, जिंक 20 प्रतिशत, आयरन 23 प्रतिशत, थियामिन 28 प्रतिशत, कॉपर 50 प्रतिशत आदि पाए जाते है. लोबिया खाने से वजन कम, पाचन स्वस्थ, त्वचा निरोगी, नींद की समस्या, दिल भी स्वस्थ रहता है. लोबिया का उपयोग पशु चारे के लिए भी किया जाता है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

लोबिया का वानस्पतिक नाम विगना साइनेन्सिस (Vigna sinenesis L) है. यह लेगुमिनोसी (Leguminosae) कुल का पौधा है. इसकी उत्पत्ति स्थान मध्य दक्षिण अफ्रीका है. भारत में इसकी खेती उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, कर्णाटक, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र आदि राज्यों की जाती है.

जलवायु एवं भूमि (String beans farming)

लोबिया गरम मौसम की फसल है. ठंडा मौसम इसके अनुकूल नही होता है. तथा इसका पौधा पाले को सहन कर सकते है. इसकी वृध्दि के लिए अत्यधिक वर्षा हानिकारक होती है. लोबिया की अनेक किस्मों पर तापक्रम तथा प्रकाश काल का काफी प्रभाव पड़ता है. भारत में इसे गर्मी व बरसात दोनों मौसम में उगाया जाता है.

लोबिया की अच्छी उपज के दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. मिट्टी जीवांश युक्त होनी चाहिए. इसके अलावा खेत की भूमि से जल निकास की उचित प्रबंध होना चाहिए.

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उन्नतशील किस्में (String beans farming)

लोबिया की अधिकांश प्रजितायाँ झाड़ीनुमा होती है परन्तु कुछ किस्में लता वाली होती है. लता वाली किस्मों में फलियाँ 35 से 90 सेमी० लम्बी होती है. जबकि झाड़ीनुमा किस्मों में फलियों की लम्बाई 30 सेमी० से कम होती है. लोबिया की कुछ सब्जी वाली किस्में निम्नवत है-

पूसा बरसाती – यह झाड़ीनुमा बौनी किस्म है. जो रबी और खरीफ दोनों ऋतुओं की बुवाई के लिए उपयुक्त होती है. बुवाई के 60 दिन बाद फलियों की तुड़ाई शुरू हो जाती है. इसकी औसत उपज 90 कुंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

पूसा दो फसली – यह झाड़ीनुमा किस्म है. जो गर्मी और बरसात दोनों मौसम के लिए उपयुक्त है. फलियों की पहली तुड़ाई 45 से 50 दिन होने लगती है और दो माह में लगभग 15 बार तुड़ाई की जाती है. औसत उपज लगभग 100 कुंटल प्रति हेक्टेयर है.

पूसा फाल्गुनी – पौधे बौने तथा झाड़ीनुमा किस्म है. फल अवधि 60 से 70 दिन, फरवरी-मार्च में बुवाई के लिए उपयुक्त है. दाने सफ़ेद रंग के, छोटे तथा बेलनाकार, उपज 100 से 120 कुंटल प्रति हेक्टेयर है.

पूसा ऋतुराज – यह किस्म ग्रीष्म तथा वर्षा दोनों मौसम के लिए उपयुक्त है. फसल की बुवाई के 40 से 45 दिन फसल आ जाती है तथा इसकी उपज 100 से 120 कुंटल प्रति हेक्टेयर है.

पूसा कोमल – यह लोबिया की नई प्रजाति है. यह किस्म नई दिल्ली से विकसित की गयी है यह सब्जी तथा दानों के लिए उपयुक्त होती है.

स्वर्ण हरिता – यह एक लता वाली किस्म है जिसकी फली 60 से 70 सेमी० लम्बी, हरे रंग की, कोमल तथा खाने में स्वादिष्ट होती है. अच्छी उपज के लिए इनकी लताओं को किसी सहारे पर चढाना जरुरी होता है. औसत उपज 135 से 140 कुंटल प्रति हेक्टेयर है.

स्वर्ण स्वेता – यह एक लतादार किस्म है. जिसकी फली 50 से 60 सेमी० लम्बी हरे रंग की, कोमल तथा खाने में स्वादिष्ट होती है. औसत उपज 125 से 130 कुंटल प्रति हेक्टेयर तक है.

अर्का गरिमा – इसकी फली 20 से 25 सेमी० लम्बी तथा कम दिनों में ही फलने लगती है. औसत उपज 90 से 100 कुंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है.

काशी कंचन – इसके पौधे झाड़ीदार, फलियाँ हरे रंग की कोमल तथा स्वादिष्ट होती है. इसकी औसत उपज 120 से 125 कुंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

इसके अलावा अन्य उन्नत किस्मों में काशी गौरी, अर्का मंगला, पूसा ऋतुराज, नरेन्द्र लोंबिया आदि है.

बुवाई का समय और कैसे करे

बरसात की फसल के लिए जून-जुलाई तथा गर्मी की फसल के लिए फरवरी-मार्च में बुवाई का समय सर्वोत्तम होता है.

बुवाई प्रायः पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 से 60 सेमी० तथा बीज से बीज की दूरी 15 से 30 सेमी० रखते है. बुवाई के 7 से 8 दिन बाद बीज अंकुरित हो जाते है. लोबिया में औसतन बीज दर गर्मियों में 20 से 25 किलोग्राम तथा बरसात में 12 से 15 किग्रा० प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है.

खाद एवं उर्वरक (String beans farming)

खेत की मिट्टी की उर्वरा शक्ति एवं फसल की आवश्यकता को को देखते हुए खाद एवं उर्वरक की मात्रा को खेत में डालनी चाहिए. वैसे गोबर की खाद 15 से 20 टन, नत्रजन 30 से 40 किग्रा०, स्फूर 60 किग्रा० तथा पोटाश 60 किग्रा० की दर से देते है. गोबर की सड़ी खाद की पूरी मात्रा खेत की तैयारी करते समय तथा नत्रजन की आधी मात्रा तथा स्फूर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोते समय मिट्टी में मिला देते है. नाइट्रोजन की बाकी मात्रा को बीच बोने के तीन सप्ताह बाद मिट्टी चढाते समय देना चाहिए.

सिंचाई (String beans farming)

बरसाती फसल में सिंचाई की ज्यादा आवश्यकता नही पड़ती है. परन्तु ग्रीष्मकालीन फसलों में 7 से 10 दिन के अंतर पर सिंचाई करते है.

निराई-गुड़ाई 

सिंचाई के बाद प्रारंभ में ही निराई-गुड़ाई करनी चाहिए जिससे खेत में ज्यादा खरपतवार न रहे. और खेत में खरपतवारों पर नियंत्रण रहे.

तुड़ाई (String beans farming)

सब्जी के लिए फलियों को मुलायम अवस्था में, जब रेशा कम होता है तब फलियों की तुडाई 2 से 3 दिनों के अन्तराल पर करते है. साधारण रूप से अगेती किस्मों में बुवाई के 45 दिन बाद तथा पछेती किस्मों में बुवाई के 60 दिन बाद फलियों की तुड़ाई शुरू की जा सकती है. फसल तैयार हो जाने पर फल 2 से 3 दिन के अंतर पर 2 माह की अवधि तक तोड़े जा सकते है.

उपज 

लोबिया की खेती से आमतौर पर 75 से 100 कुंटल हरी फलियाँ तथा 12 से 15 कुंटल दाने प्रति हेक्टेयर की उपज मिल जाती है.

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कीट एवं रोग नियंत्रण 

बीन का चैंपा (Bean Aphid)

बीन का चैंपा एक छोटा कीट होता है, जो पत्तियों और पौधों को के अन्य भागों को रस चूस लेता है. फूल और फलियों को काफी हानि पहुंचाता है.

रोकथाम 

इस कीट के बचाव के लिए मेटासिस्टोक्स या इमिडाक्लोप्रिड के घोल का छिड़काव किया जाता है.

बीन का बीटल 

बीन का बीटल पौधे के कोमल भागों को खाती है. जिससे पौधे सूख जाते है. उपज को भारी हानि पहुंचती है.

रोकथाम 

इस कीट की रोकथाम के लिए इमिडाक्लोरप्रिड के घोल का इसमें भी छिड़काव किया जाता है.

चूर्णी फफूंदी एवं मृदुरोमिल फफूंदी 

इन फफूंदियों के कारण पौधे पर पाउडर जैसा पदार्थ जमा हो जाता है. तथा धब्बे पड़ जाते है. इसके कारण कलियाँ या तो बनती नहीं है या बहुत छोटी बनती है. इसके कारण भी उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

रोकथाम 

इन रोगों की रोकथाम के लिए डाइथेन एम-45 का छिड़काव करना चाहिए.

निष्कर्ष

किसान भाईयों उम्मीद है, गाँव किसान (Gaon Kisan) के लोबिया की खेती (String beans farming) से सम्बन्धित इस लेख से आप को सभी जानकारियां मिल पायी होगी. गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा लोबिया के फायदे से लेकर लोबिया के कीट एवं रोग प्रबन्धन तक की सभी जानकारियां दी गयी है. फिर भी लोबिया की खेती (String beans farming) से सम्बन्धित कोई अन्य प्रश्न या सुझाव हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ या बता सकते है. इसके अलावा यह लेख आप को कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताये. महान कृपा होगी.

आप सभी लोगो का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.  

 

 

 

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