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ज्वार का चारा | Sorghum feed | पशुओं के लिए पर्याप्त पौष्टिक चारा

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पशुओं के लिए पर्याप्त पौष्टिक चारा

Sorghum feed | पशुओं के लिए पर्याप्त पौष्टिक चारा

संसार की घास कुल वाली फसलों में ज्वार का चौथा स्थान है. अगर महत्त्व की द्रष्टि से देखा जाय तो गेहूं के बाद इसका नंबर आता है.

यह फसल उष्ण कटिबंधीय (Tropics) और समशीतोष्ण कटिबंधीय (sub-tropics) क्षेत्रों में उगाई जाती है. पश्चिमी अफ्रीका में इसे गिनी मक्का (Guinea Corn), दक्षिण अफ्रीका में काफ़िर मक्का (Kafir Corn), सूडान में दर्रा (Durra), तथा पूर्वी अफ्रीका में मतामा (Matama) कहा जाता है.

भारत में इसे चोलम (Cholam) या ज्वार कहते है. अमेरिका में इसे माइलो (Milo) या माइलो-मक्का या मीठा ज्वार सरगो (Sargo) कहते है. चीन के लोग ज्वार को काओलियांग (Kaoliang) कहते है. भारत में इस फसल को चारे और अनाज दोनों के लिए उगाया जाता है.

चारे में पाए जाने वाले पौष्टिक तत्व 

पशुओं के लिए ज्वार का चारा पर्याप्त पौध्तिक होता है. दो माह में काटे गए चारे में प्रोटीन 6.64 प्रतिशत, कैल्सियम 0.53 प्रतिशत, फ़ॉस्फोरस 0.24 प्रतिशत, रेशा 31.31 प्रतिशत, नाइट्रोजन रहित निष्कर्ष भाग 49.18 प्रतिशत और ईथर निष्कर्षणीय भाग 2.23 प्रतिशत होता है.

इसके अलावा यदि चारे को तीन माह में काटा जाय तो उसमें प्रोटीन का प्रतिशत 4.62 प्रतिशत, कैल्सियम का प्रतिशत 0.32 प्रतिशत, फ़ॉस्फोरस का प्रतिशत 0.22 और ईथर के निष्कर्षणीय भाग का प्रतिशत 1.81 रह जाता है. तथा नाइट्रोजन रहित निष्कर्षणीय भाग का प्रतिशत 56.10 और रेशे का प्रतिशत 31.15 हो जाता है.

इस पता चलता है कि ज्वार का हरा चारा पर्याप्त पौष्टिक और शक्तिवर्धक चारा है.

उत्पति, इतिहास एवं वितरण

सामान्य रूप से ज्वार की उत्पत्ति का स्थान पश्चिमी अफ्रीका को माना जाता है. लेकिन वैविलोव (1935) के अनुसार इसका उत्पत्ति केंद्र इथियोपिया माना जाता है. इस पौधे के लिए इथियोपिया का भाग बहुत ही अच्छा समझा जाता है.

ज्वार की विभिन्न जातियां समुद्र की सतह के स्तर वाले स्थानों से लेकर 2700 मीटर तक उंचाई वाले स्थानों में उगाई जाती है. इसकी विभिन्न जातियां अलग-अलग ऊँचाइयों पर उगाई जाती है. संभवतः आगऊ (Agau) लोग जो मध्य तथा उत्तरी इथियोपियन पठार पर रहने वाले कुशाइट्स (Cushites) थे. वे इस फसल के विकास में सहायक हुए.

जी० वाट (1893) के अनुसार ज्वार को कोई विशिष्ट संस्कृत नाम भी नही दिया गया है. इसे प्रायः यवन (Yavana) कहते है. जिसका अर्थ अपरिचित (Stranger) होता है. अतः यह कहा जा सकता है. कि ज्वार की खेती भारत में लगभग 1500 ई० पू० के बाद प्रारंभ हुई थी.

इसकी फसल विश्व के उन सभी भागों में उगाई जाती है. जहाँ उष्ण कटिबंधीय तथा उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु पायी जाती है.

भारत में इसकी अधिकतर फसल महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात एवं उत्तर प्रदेश के कई भागों में उगाई जाती है. इन स्थानों के अतरिक्त इस फसल को हरियाणा, पंजाब तथा तमिलनाडु के कई भागों में उगाया जाता है.

चारे के लिए ज्वार की फसल भारत के पहाड़ी, प्रायः 1500 से 1600 मीटर की उंचाई वाले भागों में अच्छी प्रकार से उगाई जा सकती है. भारत के कुछ भाग जैसे आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु में इसे रबी के मौसम में भी उगाया जाता है.

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वानस्पतिक विवरण 

ज्वार घास-परिवार का एक तने वाला एकवर्षीय पौधा है. इसका वानस्पतिक नाम सोर्घम बाइकलर (Sorghum bicolor) है. इसमें दौजियों के विकास में काफी भिन्नता पाई जाती है.

कुछ दौजियों की संख्या प्रायः जाती और प्रति इकाई क्षेत्र में पौधों की संख्या पर निर्भर होती है. कुछ जातियों में बोआई के थोड़े ही दिनों बाद दौजियाँ निकलती है, परन्तु दूसरी जातियों में दौजियाँ पुष्पावस्था के बाद निकलती है. कभी-कभी दौजियाँ पौधों के शिखर (Top) के नष्ट होने पर निकलती है. इस फसल की कई जातियों में पौधे के निचली गाठों से कलिकाओं द्वारा कई बार पेड़ी की फसल का वर्धन होता है.

ज्वार के पौधे की उंचाई 45 सेंटीमीटर से 400 सेंटीमीटर तक पाई जाती है. तने की मोटाई 5 से 30 मिली मीटर तक होती है. तने की बढ़वार सीधी होती है. ज्वार का तना ठोस या स्पंजी होता है. यह शुष्क या रसीला होता है. तने का स्वाद हल्का मीठा होता है.

इसके पर्णाच्छद (Leaf sheath) के जोड़ के ठीक ऊपर तने की प्रत्येक गाँठ पर जड़ का एक घेरा होता है, जिसमें आद्यक (primordail) भी पाए जाते है. आद्यकों से गाँठ पर तने के चारों तरफ एक संकेंद्री (concentric) घेरा बनता है. निचली गाठों से जड़े निकलती है. तथा लम्बे पौधे वाली जातियों में भूमि की सतह के ऊपर गांठों से प्रायः जड़े निकलती है.

पौधों की गिरने की अवस्था में जमीन पर पड़ी गांठों से जड़े निकलती है. जिससे यह कहा जा सकता है. कि ज्वार को तनों के टुकड़ों से भी उगाया जा सकता है.

प्रत्येक गांठ पर जड़-घेरे के ठीक ऊपर वृध्दि-छल्ले (groth ring) पाए जाते है. प्रत्येक गाँठ पर एक कलिका (bud) पाई जाती है. परन्तु नीचे की कलिकाओं के अतरिक्त कोई कलिका बढ़ नही बन पाती.

कभी-कभी तना बेधक (stem borex) कीट के आक्रमण से शाखाएं निकलती है. तने की सबसे उपरी पोरी (internode) से पुष्पक्रम (inflorescence) निकलता है.

ज्वार की जातियों के अनुसार इसकी पत्तियों की संख्या 7 से 24 तक पाई जाती है. नई पत्तियां पहले सीधी, परन्तु बाद में वक्र हो जाती है. पुरानी पत्तियां 30 से 135 सेंटी मीटर लम्बी तथा 1.5 से 1.3 सेंटीमीटर तक चौड़ी होती है. पत्तियों का किनारा समतल या लहरदार होता है. यह लहरदार दशा तब आती है. जब मध्य शिरा (midrib) किनारे से बड़ी होती है.

शुष्क एवं पीठ वाली जातियों में मध्यशिरा सफ़ेद या पीली होती है, एवं रसीली जातियों में यह प्रायः पारदर्शक हरी होती है. और उस पर एक पतली सफ़ेद धारी पाई जाती है. मध्य शिरा की निचली सतह हरी होती है. इसकी जड़ मोमी (waxy) और रोयेदार होती है.

पत्तियों के दोनों छोरो पर रंध्र (stomata) पाए जाते है. प्रायः पत्तियां एकांतर (alternate) होती है. और तने के चारों तरफ से घेरे होती है. इसकी लम्बाई 15 से 35 सेंटीमीटर तक पाई जाती है.

पौधे के निचली गाठों से जड़ें निकलती है, जो रेशेदार (fibrous) होती है. अधिकतर जड़ें मिट्टी के भीतर एक मीटर की गहराई में पाई जाती है. कभी-कभी जड़ें 2-3 मीटर या इससे नीचे तक की गहराई में भी जाती है. जड़ों की अन्तस्त्वचा (endodermis) में सिलिका पाया जाता है, जिसकी मात्रा जातियों के ऊपर निर्भर करती है.

इसी कारण पौधों में सूखे सहने की क्षमता पाई जाती है. ज्वार के पुष्पगुच्छ (panicle) को पुष्पक्रम (inflorescence) कहते है. एक तुष (glume) में दो पुष्पक (florates) पाए जाते है. उपरी पुष्पक जननक्षम और नीचे वाला (sterile) बंध्य होता है. जनन क्षम पुष्पक लेमा (lemma) द्वारा घिरा होता है. पेलिया (palea) छोटा और पतला होता है. पौधे में कभी-कभी छोटा मुड़ा हुआ शुक (awn) भी पाया जाता है.

पुष्पगुच्छ के ऊपरी भाग से फूल खिलने आरम्भ हो जाते है और यह नियमित रूप से नीचे बढ़ते है. भुट्टे के आकार के अनुसार फूल खिलने का समय 6 से 15 दिन तक रहता है. अधिकतम फूल 8 दिन के अन्दर आते है. वैसे तो फूल आने का समय 10 बजे रात से 8.30 बजे प्रायः तक होता है, परन्तु यह समय प्रकाशहीनता और तापमान के ऊपर निर्भर करता है. भारत में पुष्प निकलने का समय मध्य रात से प्रातः 8 बजे तक होता है. अधिकतम मात्रा में फूल 4.00 बजे प्रातः खिलते है.

ज्वार में 5 प्रतिशत तक पर-परागण भी पाया जाता है, जिसकी मात्रा भुट्टे के ऊपर निर्भर करती है. यह क्रिया खुले (open) भुट्टे में अधिक पाई जाती है. परागकण 3 से 6 घंटे तक जीवनक्षम रहते है. तथा वर्तिकाग्र (stigma) एक सप्ताह तक अभिग्राही (receptive) दशा में रहता है. परागण (pollination) फूल निकलने के 72 घंटे तक होता है.

ज्वार के दाने पौधे में फूल खिलने से 25 से 55 दिन के अन्दर पाक जाते है.

जंगली ज्वार कृष्य ज्वार के साथ खरपतवार के रूप में पाया जाता है. जंगली ज्वार तथा कृष्य ज्वार के संकरण से प्राप्त प्रथम पीढ़ी माध्यमिक गुणों वाली होती है. और दूसरी पीढ़ी में इन गुणों का प्रथक्करण होता है. यदि पृथक्कृत पौधे (segregated) जंगली अवस्था में उगाई ज्वार के ही समान हो, तो इससे प्राकृतिक वरण (natural selection) हो सकता है और फिर इसे कृष्य भूमि में उगाने पर इनमे वरन किया जाता है. प्राकृतिक चयन में माध्यमिक गुणों वाली ज्वार (जो जंगली ज्वार से भिन्न होती है) अलग हो सकती है.

ज्वार को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. हेलपैन्सिया (Helpansia) – ये जातियां जंगली और बहुवर्षीय होती है, जिसमें लम्बे प्रकन्द (rhizome) पाए जाते है. और गुणसूत्रों की संख्या 2n = 4x =40 होती है. हेलपैन्सिया में निम्न जातियां सम्मिलित है –
  • सोर्घम हेलपैन्स जाति हैलपैन्स 
  • सोर्घम हेलपैन्स जाति मोलिएसियम
  • सोर्घम हेलपैन्स जाति सैंटोवर्सम 
  • सोर्घम अलमम 
  • सोर्घम प्रोपिनकम 

2. अरुंडीनेसिया (Arnudinesia) – ये जातियां एकवर्षी या टिफ्ट वाली बहुवर्षी बिना प्रकांड वाली होती है. इसमें गुणसूत्र (chromosome) संख्या 2n = 20 होती है. इनमें जंगली ज्वार तथा कृष्य ज्वार सम्मिलित है.

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जलवायु एवं भूमि

ज्वार की बहुत-सी जातियां प्रायः ज्यादा तापमान में अच्छी प्रकार बढती है. यह फसल दूसरी फसलों की अपेक्षा सूखे की स्थिति को सहन करने की अच्छी क्षमता रखती है.

ज्वार के लिए दिन में 10 घंटे का दीप्तिकाल होना आवश्यक है. लाल प्रकाश (Red light) से पुष्परम्भ स्थगित हो जाता है. परन्तु सुदूर लाल (far red) प्रकाश की उपस्थिति में पुष्पन होता है. पत्तियों की संख्या तथा पौधे की उंचाई भी दीप्ति-कालिता पर निर्भर करती है, क्योकि पत्तियां तब तक निकलती रहती है. जब तक कि पौधों में फूल न निकल आयें.

ज्वार में तापमान की आवश्यकता अलग-अलग जातियों की जीनी संरचना (genotype) के ऊपर निर्भर करती है. पौधों के वृध्दि के लिए 33-34 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान उचित माना जाता है. इससे कम या 24-25 डिग्री सेंटीग्रेड पर पैदावार कम हो जाती है.

भूमि का तापमान 18-21 डिग्री सेंटीग्रेड होने पर बीज का अंकुरण 55-60 प्रतिशत होता है. इस कम तापमान (9-13 डिग्री सेंटीग्रेड) पर अंकुरण केवल 22-30 प्रतिशत ही होता है.

अतः बीज के अच्छे अंकुरण एवं फसल की उपज के लिए बुवाई के समय भूमि का तापमान 18 सेंटीग्रेड या इससे अधिक होना चाहिए. वृध्दि का समय निर्धारित करने के लिए ठण्ड का प्रभाव सबसे महत्वपूर्ण है. हिमांक (freezing point) से नीचे का तापमान ज्वार की किसी भी वृध्दि अवस्था में हानि पहुंचता है. कभी-कभी छोटे पौधे दो या तीन सप्ताह की अवस्था तक हलके ओले के प्रभाव को सहन कर सकते है.

ज्वार को सगभग सभी प्रकार की भूमियों में उगाया जा सकता है. इसके लिए दोमट, बलुई दोमट तथा हल्की और औसत काली मिट्टी, जिसका जल निकास अच्छा हो, सबसे उपयुक्त मानी जाती है. अधिक पैदावार के लिए भूमि की उर्वराशक्ति पर्याप्त होनी चाहिए.

भूमि का पी० एच० मान 6.5 से 7.0 तक सबसे अच्छा ज्वार की कुछ जातियां क्षारीय भूमि से भी उगने की क्षमता रखती है. परन्तु उनकी वृध्दि तथा उपज कम हो जाती है.

ज्वार का जलाभाव के समय प्रसुप्ति (dormaney) में रहने की क्षमता है. यह फसल निर्जलीकरण के प्रति दूसरी फसल की अपेक्षा काफी सहनशील होती है. इसे ऐसे स्थानों पर बोया जाता है. जहाँ पानी कम और अनियमित रूप से बरसता है.

सामान्यतया ऐसी स्थिति में मक्का की खेती संभव नही है. मक्का की जल-आवश्यकता (water requirement) ज्वार की अपेक्षा अधिक है. जलाभाव में 14 दिन तक मुरझाया हुआ ज्वार भी साधारण वृध्दि करता है. इससे पूर्व रंघ्रों (stomata) पर जलाभाव या मुरझाने का अधिक प्रभाव नही पड़ता है.

ज्वार सूखा सहिष्णु फसल तो है ही, साथ ही इसे अधिक नम (wet) स्थानों पर भी उगाया जा सकता है. इस दशा में कुछ समय के लिए जड़ें अपना कार्य बंद कर देती है. ज्वार 38 से 75 सेमी० वर्षा वाली जगहों पर अधिक उपज देता है.

मक्का और ज्वार की प्रारम्भिक (primary) जड़ें  एक समान होती है. परन्तु ज्वार की जड़ प्रायः 1 से 1.25 मीटर गहरी जाती है. जड़ों की अन्तस्त्वचा में सिलिका का एक घेरा बन जाता है, जिसके कारण जड़ों को एक यांत्रिक शक्ति मिलती है, जो जलाभाव के विरुध्द पौधों को बचाने में सहायक होती है. ऐसा बचाव मक्का में बहुत कम पाया जाता है.

फसल-चक्र 

चारे के लिए ज्वार प्रायः बरसीम, रिजका, गेहूं, चना, मटर, जौ, जई या लाही के बाद बोई जाती है. इसके लिए उपयुक्त फसल-चक्र निम्न है-

  • ज्वार (चारा) बरसीम – मक्का + लोबिया (एक वर्ष)
  • ज्वार + लोबिया – जई-मक्का + लोबिया (एक वर्ष)
  • मक्का (दाना) – गेहूं-मक्का + लोबिया-ज्वार (चारा) – आलू-सूडान घास (दो वर्ष)
  • ज्वार (चारा) – मटर (दाना) – गन्ना (दो वर्ष)

ज्वार को मिश्रित या शुध्द दोनों विधियों से बोया जाता है. मिश्रित रूप से इसे लोबिया, ग्वार, मूंग, उर्द या मोठ के साथ मिलाकर बोते है. कड़बी के लिए ज्वार को अरहर के साथ मिलकर बोया जाता है. ज्वार के साथ फलीदार फसलों को मिलाकर बोने से चारे की पौष्टिकता बढ़ जाती है. जिससे दुधारू पशुओं को रातिब की मात्रा कम देनी पड़ती है. मिलवां फसल में चारे की उपज शुध्द ज्वार की उपज से कम हो जाती है.

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उन्नत किस्में  

चारे की कटाई के आधार पर ज्वार की किस्मों को दो निम्न लिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है –

एक कटाई वाली किस्में 

टाइप 8 बी, टा० 3 और टाइप 4 ज्वार की ये किस्में पतले तने वाली और लम्बी होती है. इनकी फसल गिरने (lodging) का कोई दर नही रहता है.

इसके अलाव अन्य प्रचलित उन्नत किस्मों में विदिशा 60-1 उल्लेखनीय है. यह मध्य प्रदेश में विकसित की गयी ज्वार की बहुत अच्छी किस्म है. इसके दाने और चारे, दोनों की उपज अच्छी पाई जाती है. चारे के लिए उगाई गई विदिशा 60-1 से औसतन 600-700 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक हरा चारा मिल जाता है. इसमें लगभग 30 प्रतिशत शुष्क पदार्थ पाया जाता है. इस किस्म की सबसे बड़ी कमी यह होती है कि पत्तियां बढ़ोत्तरी के साथ-साथ निचे से सूखती जाती है. पुष्पावस्था के समय केवल पौधे के उपरी भाग की 1/3 या इससे कम पत्तियां हरी रह पाती है. इसलिए इस किस्म के चारे की पौष्टिकता कम हो जाती है. दूसरी किस्मों की अपेक्षा इसकी फसल अधिक समय लेती है. इसकी फसल में 102-110 दिन लगते है. यह किसम मध्य प्रदेश में अधिक उत्पादनशील सिध्द हुई है.

रियों मीठे ज्वार की एक किस्म है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के मिसीसिपी राज्य में 1963 में विकसित की गई थी. इसे अन्य किस्मों के साथ पंतनगर में 1968 के पश्चात उगाया गया और अन्य किस्मों से इसकी उपज तथा गुण अच्छे पाए गए. इसके पुष्प 75 से 80 दिन में आ जाते है. इसका तना पतला, मुलायम, रसीला तथा मीठा होता है. इस जाती का सबसे महत्वपूर्ण गुण यह है कि इसकी पत्तियां अंकुरण से कटाई तक पूरे पौधों में हरी रहती है. और इसमें सामान्यतया कोई बीमारी नही लगती है. इसकी कुछ पत्तियां पीले रंग की होती है, जो कि जाती विशेष का गुण माना जाता है. इसमें तनावेधक (shoot borer) कीड़ा लगता है. यह कीड़ा पुष्पावस्था के आस-पास लगता आरम्भ हो जाता है. लेकिन इससे कोई विशेष हानि नही होती है. इससे लगभग 500 कुंतल हरा चारा, जिसमें 25-28 प्रतिशत शुष्क पदार्थ पाया जाता है, प्राप्त होता है. इसके तने पुष्पावस्था में गन्ने के समान चूसे जा सकते है. जिसमें लगभग 5 से 6 प्रतिशत सुक्रोस पाया जाता है. इसके चारे की पौष्टिकता अधिक होती है. इसमें प्रोटीन लगभग 7 से 9 प्रतिशत तक पाया जाता है. इसे प्रायः उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और अधिक वर्षा वाले अन्य स्थानों के लिए काफी अनुकूल पाया गया है.

आई० एम० 6090 या पूसा चरी-1, एस० एल० 44 तथा जे० एस० 73/53 या हरियाणा चरी ज्वार की किस्मों को 1974 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने जारी किया था. इन सभी किस्मों की उपज और वृध्दि अच्छी होती है. पूसा चरी-1 के पौधे गहरे हरे रंग के पत्ती-बहुल और पौष्टिक होते है. एस० एल० 44 के पौधे पतले और पत्ती युक्त होते है. इन दोनों किस्मों में रोग बहुत कम लगते है. हरियाणा चरी सामान्य रूप से एक उन्नत किस्म है. इसके पौधे सीधे, पत्तियां 45 अंश के कोण पर लगी होती है. परन्तु इसमें पट्टी का चिट्टी रोग बहुत अधिक लगता है. इसलिए यह विशेष रूप से तराई या अधिक वर्षा वाले स्थानों के अनुकूल नही होती है.

जे० एस० 20 नामक किस्म ज्वार की बहुत पुरानी किस्म है. इसके तने पतले होते है. इसकी उपज लगभग 350 कुंतल प्रति हेक्टेयर होती है. इसकी चारे की पौष्टिकता औसत दर्जे की होती है. यह जाती अधिक पानी या जलाभाव, दोनों स्थितियों को अन्य जातियों की अपेक्षा अधिक सहन कर सकती है. इसको पंजाब, हरियाणा, दिल्ली तथा उत्तर प्रदेश में उगाया जा सकता है.

कंपोजिट-1 ज्वार की एक ऐसी किस्म है जिसके तने बहुत पतले, बढ़वार तेज, पत्तियां रोग रहित होती है. यह रियों की तरह होती है. पर इसमें रियों की तरह मिठास नही पायी जाती है.

आई० एस० 607 नामक किस्म मीठे, पतले तथा मुलायम तने वाली किस्म है. इसकी उपज 500 कुंतल हरा चारा प्रति हेक्टेयर है. इसके चारे की पौष्टिकता बहुत अच्छी होती है. पंतनगर में किये गए परीक्षणों से पता चला है कि इस जाती की पहली चारा कटाई बोआई के 60 दिन बाद कर सकते है. इस समय इसके लगभग 50 प्रतिशत से अधिक पौधे पुष्पावस्था में होते है.

इन किस्मों के अतरिक्त अन्य किस्मों में पूसा चरी 6, हरियाणा चरी 136, आई० एस० 4776, पी० सी० 9, राजस्थान चरी, हरियाणा चरी 171 और हरियाणा चरी 260 है.

बहु कटाई वाली किस्में 

ज्वार की ऊपर बताई गई कई किस्में जैसे पूसा चरी-1, एस० एल० 44, कंपोजिट-1 और जे० एस० 20 बहु कटाई के लिए भी उपयोग में लाइ जा सकती है. इसमें पुनर्वृध्दि की अच्छी क्षमता पाई जाती है.

इनके अतरिक्त एम्० पी० चरी (M० P० chari) जे० 69 बहुकटाई के लिए सबसे अच्छी किस्में मानी गई है. इस किस्म के चारे में ध्यूरिन (dhurrin) नामक ग्लूकोसाइड को मात्रा बहुत कम पाई जाती है. इसमें पुनर्वृध्दि की शक्ति बहुत अधिक पाई जाती है. इससे 2 से 3 कटाई तक चारा लिया जा सकता है. यह किस्म मार्च से अक्टूबर तक हरा चारा दे सकती है. भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान, झाँसी में किये गए परीक्षणों के अनुसार इससे 210 दिन में औसतन 850 कुंतल प्रति हेक्टेयर हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है. गर्मी में इसकी उपज अधिक होती है. और बरसात में यह आधी रह जाती है. इसके तने पतले होते है. तथा बीज की पैदावार काफी कम होती है. बहु कटाई वाली नई किस्मों में पूसा चरी-23 और राजस्थान चरी उत्तम प्रतीत होती है.

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खेत की तैयारी 

खेत की तैयारी मिट्टी, पानी और दूसरी दशाओं पर निर्भर करती है. जहाँ पानी की कमी पाई जाय, उन जगहों पानी संरक्षण की विधियाँ अपनानी चाहिए. इसके लिए पिछली फसल के अवशेष छोड़ना लाभदायक होता है.

प्रायः खेत की एक जुताई करके 2 से 3 बार हैरों चलाना आवशयक होता है. खेत की मिट्टी को भुरभुरी बनाने के लिए हैरों के बाद पाटा चलाना चाहिए.

कभी-कभी बरसीम या रिजका या चना और मटर के बाद ज्वार बोने के लिए 2 से 3 हैरो चलाना पर्याप्त होता है. खेत की तैयारी बुवाई के विधि पर निर्भर करती है.

खेत में धेले रहने पर बीज का अंकुरण काफी कम हो जाता है. जिससे उपज पर बुरा प्रभाव पड़ता है. ऐसी दशा में बीज की दर बढाने से पौधों की औसत संख्या पर्याप्त हो सकती है.

बुवाई 

उष्ण कटिबंधीय और शीतोष्ण कटिबंधीय जलवायु में वर्षा के आरम्भ होते ही ज्वार बोने से उपज अच्छी होती है. इसके कई कारण है.

कुछ वैज्ञानिको का कहना है कि शुष्क मौसम में नाइट्रोजन एकत्रित रहती है. जो पहली वर्षा के बाद पौधों को नाइट्रेट के रूप में प्राप्त होती है. वर्षा के दो या तीन सप्ताह बाद बुवाई करने पर उपज काफी कम हो जाती है. जहाँ सिंचाई के साधन उपलब्ध हो, उन स्थानों पर ज्वार की बुवाई जून के प्रथम या द्वितीय सप्ताह तक अवश्य कर देनी चाहिए. इस प्रकार बुवाई करने के लिए खेत में पहले पलेवा (pre-sowing irrigation) देकर खेत तैयार करना अच्छा रहता है.

ज्वार की बुवाई बसंत ऋतू (spring) में भी की जा सकती है, परन्तु इस समय बोई गई ज्वार को अधिक पानी की आवश्यकता पड़ती है. इसके अलावा कीड़ों तथा बिमारियों के प्रकोप का अधिक खतरा रहता है. बसंत ऋतु में बोई गई चारे की ज्वार में ध्यूरिन (Dhurrin) नामक ग्लूकोसाइड की मात्रा अधिक पाई जाती है. जिसको खिलाने से पशुओं की म्रत्यु हो जाती है. इसके आलावा इस मौसम में उपज भी कम होती है. और उपज व्यय बढ़ जाता है.

शीतोष्ण जलवायु में ज्वार की बुवाई मिट्टी के तापमान और भूमि की नमी की मात्रा के ऊपर निर्भर करती है. उत्तर प्रदेश के तराई वाले भाग में ज्वार की बुवाई जून के प्रथम सप्ताह में करते है. ईसी प्रकार हरियाणा, पंजाब और दिल्ली में ज्वार की बुवाई जून के अंतिम सप्ताह या वर्षा के आरम्भ में जुलाई के प्रथम सप्ताह में करते है. मध्य प्रदेश में ज्वार की बुवाई वर्षा के आरम्भ में करते है. दक्षिण भारत में ज्वार की फसल कई मौसम में बोई जा सकती है. यहाँ पर रबी में भी ज्वार उगाई जा सकती है.

गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रोद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर में किये गए परीक्षणों के अनुसार अलग-अलग किस्मों की बीज-दर को निर्धारित करने में सहायक होती है. इसके अलावा भूमि में नमी की मात्रा तथा भूमि में नाइट्रोजन की मात्रा भी बीज दर को निर्धारित करने में सहायक होती है.

छोटे बीजों वाली किस्में, विशेषकर रियों की बीज दर 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त है. दूसरी किस्में जैसे विदिशा 60-1, पूसा चरी-1 इत्यादि की बीज दर कम से कम 40-50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होनी चाहिए. बड़े बीज वाली किस्मों में बीज का अंकुरण समय बीतने के साथ बहुत तेजी से कम होता जाता है.

अतः ऐसी किस्मों का बीज अच्छी प्रकार भंडारित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है. यदि किसी किस्म का अंकुरण 80 से 85 प्रतिशत से कम हो, तो उसकी बीज दर उसी हिसाब से बढ़ाकर बुवाई करनी चाहिए.

यदि खेत अच्छी प्रकार तैयार हो, तो सीडड्रिल से 25 से 30 सेमी० दूरी पर बनी पंक्तियों में बुवाई करते है. यदि सीडड्रिल न मिल पाए, तो इसकी बुवाई छिटकवां विधि से की जा सकती है. पहले बीज को छिटक कर बराबर बो देते है. और इसके पश्चात हैरों से मिट्टी में मिला देते है.

छिटकवां बुवाई करने से बहुत से बीज जमीन की सतह के ऊपर रह जाते है. जिसका अंकुरण नही हो पाता है. इसलिए इस विधि में बीज की मात्रा कम से कम संस्तुत दर से 15 से 20 प्रतिशत अधिक रखनी चाहिए. बुवाई के बाद पाटा चलाकर मिट्टी को बराबर करना आवश्यक है. छोटे किसान प्रायः देशी हल से जुताई करते है. और जुताई से बने कुंड में बुवाई करते है. यह विधि भी ठीक है. इसमें बोने की गहराई 1-1/2 -2 सेमी० लगभग होनी चाहिए.

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खाद एवं उर्वरक  

नाइट्रोजन का उपयोग भूमि में नमी की मात्रा के ऊपर निर्भर करता है. बहुत कम वर्षा वाले स्थानों पर नाइट्रोजन युक्त खाद देने का कोई लाभ नही होता है. इसके विपरीत सिंचित या अधिक वर्षा वाले स्थानों पर नाइट्रोजन की बहुत अधिक आवश्यकता पड़ती है.

नाइट्रोजन की मात्रा फसल-चक्र की अन्य फसलों के ऊपर निर्भर करती है. सिंचित स्थानों पर 75-100 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर देना चाहिए. यदि ज्वार, बरसीम या रिजिका के बाद उगाई जाय, तो 60 किलोग्राम नाइट्रोजन पर्याप्त होगी. नाइट्रोजन खेत में कई बार देना चहिये.

आमतौर से नाइट्रोजन की कुल मात्रा का दो-तिहाई भाग हैरों के साथ बुवाई से पहले मिट्टी में मिला देना चाहिए. शेष एक-तिहाई भाग बुवाई के 30-35 दिन बाद खेत में डालना चाहिए, जब पौधे 50 से 60 सेमी० उंचाई के हो जाए.

मिट्टी के जांच के बाद आवशयक हो तो फ़ॉस्फोरस या पोटाश, नाइट्रोजन की पहली मात्रा के साथ खेत में डालना चाहिए. आरम्भ से अधिक नाइट्रोजन देने से पौधों की प्रारंभिक बढ़वार बहुत अच्छी होती है.

बलुई या हलकी मिट्टी में नाइट्रोजन 3 से 4 बार में देना चाहिए, ताकि सींचने से वह बह कर बेकार न हो जाय.

बहु चारा कटाई वाली जातियों में नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुवाई के समय या आखिरी हैरों के साथ खेत में डालकर मिट्टी में मिला देनी चाहिए. शेष आधी नाइट्रोजन को अंतिम कटाई के अतरिक्त हर कटाई के बाद खेत में डालनी चहिये. इससे पौधों की पुनर्व्रध्दी-दर बहुत तेज होती है. और कुल उपज पर अच्छा प्रभाव पड़ता है.

सिंचाई एवं जल निकास 

वर्षा ऋतू में बोई गयी फसल में सिंचाई की कोई आवश्यकता नही पड़ती है. कभी-कभी यदि काफी समय तक वर्षा न हो, तो सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है.

जून में वर्षा के पहले बोई गई फसल में पलेवा देकर बुवाई करते है. और यदि आवश्यकता पड़े, तो एक-दो सिंचाई भी कर लेते है. यदि ज्वार फरवरी में बोई जाय, तो हर 10 से 15 दिन के बाद सिंचाई करनी चाहिये. यदि फसल देर से बोई गई हो, तो सितम्बर के अंतिम सप्ताह या अक्टूबर में एक या दो सिंचाई करनी पड़ती है. अधिक वर्षा से खेत काफी समय तक भरा रहने से नुकसान हो जाता है. इसलिए उपयुक्त जल निकास की व्यवस्था होनी चाहिए.

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फसल-सुरक्षा 

ज्वार की फसल एक बार अच्छी प्रकार उग जाने के बाद घास इत्यादि को अच्छी प्रकार दबा सकती है. परन्तु आरम्भ में खेत में खरपतवार नही उगने देना चाहिए. आरम्भ में खरपतवार रहित रखने के लिए खेत को अच्छी प्रकार तैयार करना चाहिए.

इसके साथ ही अंकुरण के बाद तुरंत निराई-गुड़ाई कर देनी चाहिए. इसके अलावा आजकल कई खरपतवार नियंत्रक रसायन भी मिलते है. ज्वार में 20 से 25 दिन बाद खरपतवार नियंत्रण के लिए 1.5 किलोग्राम अट्राजीन (Atrazine) सक्रिय अवयव प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए. इसको बुवाई के तुरंत बाद 800 से 1000 लीटर पानी में घोल कर खेत में समान रूप से छिडक देना चाहिए. छिडकाव के समय भूमि की सतह पर नमी का होना आवश्यक है.

पछेती या अगेती बोई गई ज्वार में कीड़े तथा बीमारियों का सामान्य प्रकोप होता है. छोटे तथा मुलायम पौधा का सबसे बड़ा शत्रु, ज्वार का तना मक्खी (shoot fly) है. उष्ण कटी बंधीय क्षेत्रों के लिए तना-मक्खी की विशेष जाती एथेरिगोना वैरिया सोकेटा (Atherigona varia soccata) सबसे हानिकारक कीट है. यह मक्खी छोटे पौधों की पत्तियों की निचली साथ पर 1-3 सफ़ेद, लगभग 0.8 मिमी० लम्बे तथा 0.2 मिमी० चौड़े अंडे देती है. इस समय पौधे 7-8 दिन पुराने होते है. 3 से 7 दिनों में अण्डों से लार्वा मिकल आता है. जो पत्तियों में जाकर तने को छेद देता है. इस प्रकार जिस तने पर या पट्टी पर आक्रमण होता है, उसकी वृध्दि रुक जाती है.

समय पर फसल बोने और उन्नत तथा रोधी किस्मों के प्रयोग से काफी हद तक रोग या कीटों की रोकथाम की जा सकती है. ज्वार में दो प्रकार की सहन क्षमता पायी जाती है. छोटे पौधे आक्रमण के पश्चात फिर स्वस्थ हो जाते है. नाइट्रोजनी खाद देने से पौधे जल्दी बढ़ जाते है. और उन पर तना-मक्खियों का आक्रमण नही हो पाता है. 15 किलोग्राम थीमिट (फोरेट) का 10 प्रतिशत सक्रिय अवयव प्रति हेक्टेयर बीज के साथ मिलाकर कूंडों में बुवाई करने से तना-मक्खी का प्रकोप कम हो जाता है. इसके अतरिक्त बीज की बुवाई से पहले कार्बोफ्यूरान से उपचारित करने से इन मक्खियों का 80 प्रतिशत नियंत्रण हो जाता है. इसके अतरिक्त आर्मीवर्म, कट-वर्म तथा टिड्डे भी छोटे पौधों काफी क्षति पहुंचाते है, जिन्हें 10-15 किलोग्राम 10 प्रतिशत डी० डी० टी० प्रति हेक्टेयर के प्रयोग से नियंत्रित किया जा सकता है.

ज्वार की कुछ किस्मों में तना वेधक कीड़ा भी आक्रमण करता है, जिससे मुख्य तने की बढ़ोत्तरी तक रुक जाती है. इसके नियंत्रण के लिए पत्तियों में थायोडान के दाने दाल देना चाहिए.

चारे हेतु उपयोग में लाइ जाने वाली ज्वार में मुख्य रूप से पत्तियों की बीमारी लगती है. जिससे चारे की पौष्टिकता कम हो जाती है. यह अधिकतर जीवाणु या फफूंदी द्वारा फैलती है. इनकी रोकथाम डाईथेन जेड-78 के छिडकाव द्वारा की जा सकती है. इस लिए इस दवा की 2.2 किग्रा० मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करना चाहिए. यह छिडकाव रोग का प्रभाव देखकर एक-एक सप्ताह के अंतर पर दो बार अवश्य करना चाहिए. छिडकाव किये हुए चारे को कम से कम 35 से 40 दिन तक पशुओं को नही खिलाना चाहिए. इस दवा से रोग आगे फैलने से रुक जायेगा और चारे की पौष्टिकता मान में सुधार हो जाता है.

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कटाई एवं उपज 

ज्वार की प्रारम्भिक अवस्था में चारे में ध्यूरिन (dhurrin) नामक ग्लूकोसाइड पाया जाता है. अतः इसकी कटाई उस समय की जानी चाहिए, जब पौधे में फूल आने लगे. इस समय पत्तियों की मात्रा कम हो जाती है. और अपेक्षाकृत ताने का भाग बढ़ जाता है. ‘हे’ (सूखा चारा) बनाने के लिए ज्वार के पौधों को बूट अवस्था (बालियां आने के 5 से 6 दिन पहले) में काटते है. इस समय पत्तियां अधिकतर हरी होती है. और उनका पौष्टिकता स्तर ऊँचा होता है, काटने के बाद ज्वार के चारे को छोटी-छोटी ढेरियों में सुखा लेते है, ताकि पत्तियों का रंग काला न पड़े और हरा बना रहे.

बहु कटाई वाली जातियों का चारा कब काटना प्रारंभ किया जाय, इस पर पंतनगर में किये गए परीक्षणों से पता चला है. कि प्रायः इन किस्मों में चारे की पहली कटाई बुवाई के 55-60 दिन बाद करनी चाहिए. इसके बाद दूसरी और तीसरी कटाई 30-35 दिन के अंतर पर करनी चाहिए. यह अंतर भूमि की उर्वरकता तथा नमी की मात्रा पर निर्भर करता है. इसके साथ ही मौसम का भी इस पर बहुत प्रभाव पड़ता है.

चारे की उपज किस्म के गुणों तथा चारे की कटाई की अवस्था के ऊपर निर्भर करती है. औसतन हरे चारे की पैदावार 250-700 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक पाई जाती है. बहु कटाई वाली किस्मों से चारा काई बार में प्राप्त होता है. जिससे जानवरों को लगातार अधिक दिन तक चारा प्राप्त हो सकता है.

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