Home खेती-बाड़ी Saffron farming – केसर की खेती की पूरी जानकारी (हिंदी में)

Saffron farming – केसर की खेती की पूरी जानकारी (हिंदी में)

0
428
Saffron farming
केसर की खेती (Saffron farming) की पूरी जानकारी

केसर की खेती (Saffron farming) की पूरी जानकारी

नमस्कार किसान भाईयों, केसर की खेती (Saffron farming) देश में एक विशिष्ट मसाले के रूप में की जाती है. इसकी गणना सबसे प्राचीन मसालों में होती है. यह बहुत ही महँगी मिलती है. क्योकि इसकी कटाई व संसाधन में अधिक खर्चा आता है. और इसकी उपज बहुत ही कम है. इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख के जरिये केसर की खेती (Saffron farming) की पूरी जानकारी अपने देश की भाषा हिंदी में देगा. जिससे किसान भाई इसकी खेती कर अच्छी उपज व मुनाफा कमा सके. तो आइये जानते है केसर की खेती (Saffron farming) की पूरी जानकारी-

केसर के फायदे 

केसर का उपयोग मसाले के रूप में मिठाइयों तथा दूध व दही से बनने वाले कई व्यंजनों को सुगन्धित बनाने व आकर्षित रंग प्रदान करने में किया जाता है. कुछ विशेष प्रकार की मदिरा व परिमल द्रव्यों में भी केसर का उपयोग किया जाता है. यह महँगी होने के कारण इसका उपयोग आम न होकर विशिष्ट मसाले के रूप में होता है.

आयुर्वेदिक व यूनानी आयुर्वेदिक प्रणाली के अनुसार केसर एक शक्ति वर्धक पदार्थ है. इसलिए शरीर की दुर्बलता को दूर करने वाली अनेक दवाओं में भी इसका उपयोग किया जाता है. इसके अलावा पेट, यकृत, तिल्ली व वृक्क सम्बन्धी रोगों में भी केसर उपयोगी होती है.

मसाले के रूप में केसर की उपयोगिता इसके वाष्पशील तेल के कारण है. जिसकी मात्रा 0.6 प्रतिशत होती है. भोज्य या पेय पदार्थों में इसी पदार्थ से खुशबू प्राप्त होती है. केसर में 15.6 प्रतिशत नमी, 13.35 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 5.63 प्रतिशत स्थिर तेल, 43.64 प्रतिशत नाइट्रोजन रहित निष्कर्ष, 4.48 प्रतिशत रेशे व 4.7 प्रतिशत भस्म पायी जाती है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

केसर का वानस्पतिक नाम क्रोकस सेटाइवस (Crocus sativus L.) है. जो कि इरिडेसी (Iridaceae) कुल का बहुवर्षीय छोटा शाक है. इसकी उत्पत्ति दक्षिणी यूरोप माना जाता है. भूमध्य सागर क्षेत्रीय देश स्पेन, फ़्रांस, ग्रीस, इंग्लैंड, तुर्की व जर्मनी में इसकी खेती की जाती है. भारत में इसकी खेती सिर्फ कश्मीर घाटी में राष्ट्रिय राजमार्ग के दोनों ओर पम्पोर व अवंतीपुर के कारेवास (असिंचित व गहरी मिट्टी वाली पहाड़ी) तथा जम्मू के किष्टवार तथा भादरवाह में की जाती है. इसके अलावा हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रो में भी इसकी खेती की जाती है. साथ ही उत्तर प्रदेश के कई जिलों में इसके खेती के प्रयास किये जा रहे है.

जलवायु एवं मिट्टी 

केसर की अच्छी फसल के लिए ठंडा व साफ आकाश वाला मौसम सर्वोत्तम होता है. फसल के शुरुवात में बर्फ गिरने या पुष्पन से ठीक पहले पाला गिरने से फसल को हानि पहुंचती है. जिन क्षेत्रों में गरमी की ऋतु शुष्क रहती है. तथा सर्दियों में 100 से 150 सेमी० वर्षा होती है. वह स्थान केसर की लिए उपयुक्त होते है. केसर की फसल की समुचित वृध्दि एवं पुष्पं 2000 मीटर तक की ऊंचाई तक ही होता है. इससे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पुष्पन देर से होता है. और उपज भी कम हो जाती है.

इसकी खेती कई प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है. लेकिन बलुई, दोमट, मटियार दोमट मिट्टी में सफलतापूर्वक की जा सकती है. अधिक भारी व पानी ठहराव वाली मिट्टी केसर की खेती के लिए उपयुक्त नहीं है. भूमि का पी० एच० मान 7.6 तक का उपयुक्त होता है.

यह भी पढ़े Pistachio Nut farming – पिस्ता की खेती कैसे करे ? (हिंदी में)

उन्नत किस्में (Saffron farming)

केसर की अभी तक कोई विशेष उन्नत किस्म उपब्ध नही है. लेकिन देश में दो तरह की किस्में उगाई जाती है. पहली कश्मीरी मोंगरा और दूसरी अमेरिकन केसर है. जिसमें से अमेरिकन केसर की खेती ज्यादा प्रचलन में है.

खेत की तैयारी (Saffron farming)

केसर की अच्छी उपज के लिए खेत को तीन से चार बार अच्छी तरह जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए. पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से ही करनी चाहिए. जुताई के समय उचित जल स्तर रहना चाहिए. जुताई के बाद पाटा जरुर लगाये जिससे मिट्टी समतल और मिट्टी के ढेले फूट जाए. भूमि उचित जल निकास का प्रबंध अवश्य करे.

बीज एवं बुवाई कैसे करे 

केसर की बुवाई धनकन्द को चोभकर की जाती है. केसर की फसल पर बीजू कंदों के आकार का महत्व होता है. बुवाई के लगभग 2.5 सेमी० या इससे अधिक व्यास वाले कन्द ही काम में लें. बीजू कन्द ठोस, गोलाकार व स्वस्थ होने चाहिए. बड़े व स्वस्थ कंदों की बुवाई करने से फसल में पुष्प अधिक आते है. तथा पुत्री-कन्द भी अधिक संख्या में बनते है. छोटे कंदों की बुवाई करने से पुष्प व पुत्री कंदों की संख्या घट जाती है. जिससे वर्तमान व आने वाली फसलों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. उपयुक्त आकार के कंदों को खेत की क्यारियों में 15 से 20 सेमी० दूर कतारों में 7.5 से 10 सेमी० की दूरी पर बुवाई की जाती है. बुवाई की उपयुक्त गहराई 7.5 से 10 सेमी० तक होती है. बताये गए आकार के कंदों की एक हेक्टेयर में बुवाई करने के लिए 30 से 35 कुंटल बीज की आवश्यकता पड़ता है. केसर की एक बार बुवाई करने के बाद 8 से 10 साल तक फसल भूमिगत कंदों से स्वतः ही उगती है.

सिंचाई (Saffron farming) 

कश्मीर में केसर की खेती बिना सिंचाई की जाती है. परन्तु जहाँ सिंचाई के साधन उपलब्ध हो वहां सितम्बर के महीने में 7 से 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करना लाभदायक होता है. पुष्पन के समय अगर भूमि में नमी का स्तर उपयुक्त न हो तो उपज घट जाती है. इसलिए इस समय सिंचाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए.

निराई-गुड़ाई (Saffron farming)

फसल को खरपतवार से मुक्त रखने तथा मिट्टी में उचित वायु संचरण के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई आवश्यक है. पहली गुड़ाई बुवाई के कुछ दिन बाद ही करनी चाहिए. निराई-गुड़ाई करते समय इस बात का ध्यान रखे कि कंदों को नुकसान न पहुंचे. इसके लिए गुड़ाई की गहराई 4 से 6 सेमी० से अधिक न हो. इसके बाद आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई करनी चाहिए.

कीट एवं रोग प्रबन्धन

केसर की फसल पर अभी तक किसी कीट अथवा बीमारी का आक्रमण नही पाया गया है. लेकिन कभी-कभी बुवाई के बाद कतिपय कंदों में गलन का रोग हो जाता है. इसकी रोकथाम के लिए कंदों को फोलिडाल (0.01 प्रतिशत) मरक्यूरिक क्लोराइड (1.0 प्रतिशत) तथा ओरियोफंजिन 200 से 50 पी०पी०एम० के मिश्रण में एक घंटे तक डुबोकर फिर सुखाकर बोना चाहिए.

यह भी पढ़े Walnut farming – अखरोट की खेती कैसे करे ? (हिंदी में)

फसल कटाई

कश्मीर क्षेत्र में केसर में पुष्पन मध्य अक्टूबर में शुरू होकर लगभग 15 से 20 दिन तक चलता है. हिमाचल प्रदेश में पुष्पन का समय सितम्बर के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर के अंतिम सप्ताह रहता है. वाणिज्यिक केसर के अंतर्गत सिर्फ वर्तिकाग्र व वर्तिकाग्र के नजदीक की वर्तिका का थोडा सा भाग होता है. इसलिए केसर प्राप्त करने केलिए पुष्पों को तोड़कर एकत्र कर लिया जाता है. तथा बाद में एक-एक पुष्प से वर्तिकाग्र को अलग कर लिया जाता है. पुष्पों की कटाई का उपयुक्त समय सूर्योदय के 2 घंटे बाद ओस शुरू होता है. पुष्प की कटाई उसके दलपुंज के फटकर खुलने के साथ ही होनी चाहिए. फूल खिलने के बाद अगर कटाई तुरंत न की जाय तो केसर की गुणवत्ता कम हो जाती है. कटाई शुरू करके के बाद शुरू में एकान्तराल दिन से पुष्प तोड़े जाते है. परन्तु बाद में रोज तुड़ाई करना आवश्यक होता है. तोड़े गये पुष्पों को धूप में सुखा लिया जाता है.

उपज (Saffron farming)

कश्मीर में, जहाँ केसर की सबसे अधिक खेती की जाती है. केसर की उपज 2.5 से 4.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक हो जाती है.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है, गाँव किसान (Gaon Kisan) के केसर की खेती (Saffron farming) से सम्बन्धित इस लेख से सभी जानकारियां मिल पायी होगी. गाँव किसान द्वारा केसर के फायदे से लेकर केसर की उपज तक सभी जानकारियां दी गयी है. फिर भी केसर की खेती (Saffron farming) से सम्बन्धित कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा गाँव किसान (Gaon Kisan) का यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताये. महान कृपा होगी.

आप सभी लोगो का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द. 

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here