Neemtree Farming – नीम की खेती की पूरी जानकारी (हिंदी में)

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Neemtree Farming
नीम की खेती (Neemtree farming) की पूरी जानकारी

नीम की खेती (Neemtree farming) की पूरी जानकारी

 नमस्कार किसान भाईयों, नीम का पूरा पेड़ औषधियों से भरा होता है. नीम की खेती (Neemtree Farming) कर काफी लाभ कमाया जा सकता है. इसे अनुपयोगी भूमि पर भी उगाया जा सकता है. आज गाँव किसान (Gaon Kisan) अपने इस लेख में नीम की खेती (Neemtree Farming) की पूरी जानकारी अपने देश की भाषा हिंदी में देगा. जिससे किसान भी इसकी खेती अच्छी तरह कर सके. तो आइये जानते है नीम की खेती (Neemtree Farming) की पूरी जानकारी-

नीम के फायदे

गुणकारी लकड़ी 

नीम के पेड़ की लकड़ी काफी कठोर, भारी, मजबूत एवं चिरस्थाई होती है. इसकी लकड़ी में एक गंध होती है.तथा यह महोगनी की लकड़ी की तरह होती है. नीम की लकड़ी का ऊपरी आवरण का रंग धूसर भरे रंग की होती है और अन्दर की लकड़ी लाल रंग की होती है.

निर्माण कार्यों में उपयोगी  

अच्छी गुणवत्ता वाली नीम की लकड़ी का उपयोग समुद्री जहाज बनाने में उपयोग किया जाता है. इसके अलावा इसकी लकड़ी से ठेला गाड़ी एवं कृषि कार्यों में उपयोग होने वाले औजार एवं हल बनाये जाते है. साथ ही इसका उपयोग फर्नीचर, दरवाजा, अलमारी, मेज आदि सामान बनाने में किया जाता है.

ईधन के रूप में 

देश में नीम का इधन के रूप में प्रयोग बहुत समय पूर्व से होता आ रहा है. इसलिए लोग खाली पड़ी भूमि में इसकी रोपाई कर देते है. जिससे उनको ईधन प्राप्त हो सकते है.

उर्वरक के रूप में 

नीम के बीजों से तेल निकालने के बाद जो नीम केक बचता है, यह उर्वरक के लिए अत्यंत उपयोगी होता है. इससे उर्वरक के रोप में उपयोग की जाती है. ये नीम केक उर्वरक के रूप में खेत को अधिक मात्रा में नाइट्रोजन सुलभ कराने के साथ-साथ कीटनाशक गुण संपन्न होता है.

चारे के रूप में 

नीम की पत्तियों को चारे के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है. इसकी पत्तियां बकरी एवं ऊंट का रुचिकर चारा है. जहाँ पर चारे कमी होती है वहां अन्य जानवरों को भी खिलाया जाता है.

कीटनाशक के रूप में 

हमारे गाँव में आज भी अनाजों के भण्डारण के पश्चात ड्रम में या भण्डारण वाले स्थान पर नीम की पत्तियां रख अदि जाती है. नीम के पत्तियों एवं बीजों से प्राप्त अरेडिरिकटिन (Aradirachtin) से शक्तिशाली कीटनाशक तैयार किया जाता है.

औषधि के रूप में 

नीम से कई प्रकार की औषधियां का निर्माण किया जाता है. नीम के वृक्ष के सभी भागों में कडवाहट होता है. जो कि औषधि की द्रष्टि से लाभकारी होती है. यह काफी रोगों में लाभकारी होती है.

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उत्पत्ति एवं वितरण (Neemtree Farming)

नीम का वानस्पतिक नाम अजेडिरेक्टा इंडिका (Azadirachta indica) है. यह मिलियेसी (meliaceac) कुल का पेड़ है. इसकी उत्पत्ति दक्षिण एशिया स्थिति भारत, पाकिस्तान, मलाया, बर्मा एवं थाईलैंड के शुष्क वनों में प्राकृतिक रूप से हुई है. भारत में नीम के वृक्ष बहुत बड़े भाग पर पाए जाते है. भारत में बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, कर्णाटक एवं तमिलनाडु आदि राज्यों में इसके वृक्ष पाए जाते है.

वृक्षरोपण एवं प्रबंध (Neemtree Farming)

नीम का पेड़ बिषम परिस्थितियों में भी अच्छी प्रकार उग जाता है. अनुकूल परिस्थियों में यह झाड़ियों के बीच में अच्छी प्रकार उग आता है. अत्यधिक छाया में इसकी वृध्दि अच्छी नही होती है, और पौधे मर जाते है. इसी तरह नीम के बड़े पेड़ भी पर्याप्त मात्रा में प्रकश मिलने पर अच्छी वृध्दि करते है. नीम को विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में उगाया जा सकता है. यह दोमट मिट्टी के साथ-साथ बलुई दोमट, पथरीली, ऊसर आदि भूमियों में अच्छी वृध्दि करता है. यह अधिक पाला पड़ने इसकी वृध्दि प्रभावित होती है. कम पाला में यह वृध्दि कर लेता है.

जहाँ भी नीम का पेड़ लगाया जाय वहां जल निकास का प्रबंध अच्छा होना चाहिए. नहीं तो मानसून के मौसम में जलभराव की स्थिति में इसकी वृध्दि रूक जाती है. अत्यधिक जलभराव की स्थिति में पौधे की जड़ गल जाती है. प्रकृति में नीम का पुनरुत्पादन बीजों द्वारा संभव है. यह सबसे आसान एवं सरल विधि है. इसके ठूंठ द्वारा भी प्रवर्धन किया जा सकता है.

बीज (Neemtree Farming)

नीम के पके हुए फलों को बीनकर एकत्रित कर ले. एक किलोग्राम वजन बीजों में 2200 से 2600 बीज आ जाते है. फलों को आपस में रगड़कर गूदे को निकाल कर पानी से धुलकर स्सफ कर दे. और छाया में रखकर इन बीजों को सुखा ले. बीज अच्छी तरह जमाव ले सके इसके लिए बीज का गूदा एकदम साफ़ होना चाहिए. नीम के फलों में बीज एवं गूदे का अनुपात अनुमानतः 1:2 का रहता है. एक किलोग्राम वजन में लगभग 4,500 बीज आ जाते है. अच्छी तरह सूखे हुए बीजों को अच्छी तरह भण्डारण करना चाहिए. सुकह्ये गए बीजों को 5 से 6 दिन के अन्दर ही बोने से अंकुरण 70 प्रतिशत तक प्राप्त होता है. इन बीजों की जीवन क्षमता मात्र 10 से 12 दिन ही रहती है.

बुवाई (Neemtree Farming)

नीम के पेड़ से फलों को एकत्रित करने से लेकर बुवाई तक काम एक महीने में पूरा कर लेना चाहिए. पौधशाला में नीम के बीज को रोपित करने से पहले बीज का अच्छी प्रकार परिक्षण कर लेना चाहिए. बीज की अनुप्रस्थ काट में दिखने वाले बीजपत्र या हरे रंग का दिखाई दे उसी बीज की बुवाई करे.

पौधशाला की क्यारियों की अच्छी प्रकार निराई-गुड़ाई कर मिट्टी को भुरभुरी बना ले . बाद में इस भुरभुरी मिट्टी में गोबर की सड़ी खाद अच्छी प्रकार मिला लेते है. क्यरियो का आकार 2 x 10 मीटर रखते है. हर दो क्यारियों बाद सिंचाई के लिए नाली बना लेनी चाहिए. बीजों की बुवाई इन क्यारियों में 1.0 से 1.5 सेमी० की गहराई में लगभग 20-20 सेमी० की दूरी पर लाइन में करते है. एक लाइन में बीज से बीज के मध्य की दूरी 5 सेमी० से अधिक नही रखनी चाहिए.

एक सप्ताह बाद इन बीजों में अंकुरण शुरू हो जाता है. जो लगभग 18 से 20 दिन में पूरा हो जाता है. इन क्यारियों में अलग-अलग समय पर सिंचाई के साथ-साथ निराई-गुड़ाई भी करनी आवश्यक है. सिंचाई करते समय यह जरुर ध्यान रखने पानी अधिक मात्रा में न हो क्योकि क्यारी में जमा पानी पौधों को नुकसान पहुंचा सकता है. एक क्यारी से 1700 से 1800 पेड़ प्राप्त किये जा सकते है. दूसरी जगह पौधे ले जाने की द्रष्टि से आप पौधों को पोलीथिन की थैलियों भी रोपड़ कर सकते है. एक या दो वर्षों में पौधा रोपड़ योग्य हो जाता है.

रोपाई के लिए गड्ढे मानसून के पहले अप्रैल या मई महीने में खुदाई कर लेते है. जुलाई या अगस्त में आप इन गड्ढों में पौधों की रोपाई कर देनी चाहिए. प्रारंभ के दो या तीन वर्षों तक निराई-गुड़ाई की एवं पशुओं से सुरक्षा की आवश्यकता पड़ती है.

उपज (Neemtree Farming)

नीम का एक पेड़ 5 से 6 साल में फल देना आरम्भ कर देता है. तथा औसतन 30 से 50 किग्रा० निबौला (नीम का फल) प्रति वर्ष प्रत्येक पेड़ से प्राप्त कर सकते है. इसके अलावा 350 किग्रा० पत्तियां प्रति पेड़ पेड़ प्राप्त होती है. एक पेड़ लगभग 100 वर्षों तक फल देता है. 30 किग्रा० फल से औसतन 6 किलो० नीम का तेल और 24 किलों नीम की खली प्राप्त की जा सकती है.

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रोग एवं कीट प्रबन्धन (Neemtree Farming)

नीम का पेड़ सम्पूर्ण भाग औषधि के लिए महत्वपूर्ण होता है फिर भी कुछ कवकों के आक्रमण के साथ-साथ कुछ कीटों का प्रकोप होता है.

स्यूडोमोनास अजेडिरेक्टि नामक कवक के आक्रमण से प्रारम्भ में पत्तियों धब्बे दिखाई देते है. बाद में गंभीर अंगमारी हो जाता है. यह रोग कोर्टीसियम सालमोनिकलर नामक कवक के आक्रमण से भी शाखाओं में पाया जाता है.

नीम की जड़ों में गनोडर्मा ल्युसिड्स नामक कवक के आक्रमण से जड़ विगलन का प्रकोप हो जाता है.

इन रोगों की रोकथाम के लिए रोगग्रस्त अंश को काटकर नष्ट कर देते है. और नियंत्रण के लिए असर्वांगी कवकनाशी रसायन का छिड़काव 4 से 4 बार कर देना चाहिए. जड़ विगलन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए कॉपर अथवा मरकरी युक्त कवकनाशी रसायन को मिट्टी के साथ मिलाकर पौधे अथवा पेड़ की जड़ के मिट्टी में मिलाकर पानी देना चाहिए.

इनरमोनिया नामक कीट के लार्वा नए कोमल तने को खाकर भेद देते है. इसके अलावा अन्य कीट जो पत्तियों को भी खाकर नष्ट कर देते है. जिनसे सुरक्षा हेतु तुरंत प्रबन्ध करना चहिये. पेड़ के नीचे गिरे फलों को तुरंत एकत्रित कर लेना चाहिए क्योकि नीचे गिरे हुए फलों को कुतरने वाले कीट खाकर नष्ट कर देते है.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है, गाँव किसान (Gaon Kisan) का नीम की खेती (Neemtree Farming) से सम्बन्धित इस लेख से पूरी जानकारी मिल पायी होगी. गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा नीम के फायदे से लेकर कीट एवं रोग प्रबन्धन तक सभी जानकारी दी गयी है, फिर भी नीम की खेती (Neemtree Farming) से सम्बन्धित आपका कोई प्रश्न हो तो आप कम्नेट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा यह लेख आप को कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताये. महान कृपा होगी.

आप सभी लोगो का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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