मुर्गी पालन करने वाले किसान मुर्गियों की इस बीमारी से रहे सचेत, वर्ना उठाना पडेगा भारी घाटा

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murgiyon ki ranikhet bimari se kaise bache
रानीखेत के लक्षण एवं बचाव

मुर्गियों की सबसे घटक बीमारी रानीखेत के लक्षण एवं बचाव

देश के ज्यादातर किसान भाई खेती के साथ-साथ पशुपालन, मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन एवं लघु उद्योगों का कार्य करते है. जिसमें आजकल ज्यादातर किसान एवं युवा मुर्गी पालन को काफी पसंद कर रहे है. क्योकि मुर्गी पालन एक ऐसा व्यवसाय उभर का समाने आया जिसमें कम समय और कम लागत में अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है.

लेकिन कभी-कभी मुर्गी पालन में किसानों को घाटा भी उठाना पड़ता है. इसकी सबसे बड़ी वजह है मुर्गियों में होनी वाली बीमारियाँ है. इन्ही बीमारियों में सबसे घातक बीमारी रानीखेत है. मुर्गियों में यह बीमारी फैलने से किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है. इसलिए आज के इस लेख के जरिये हम मुर्गियों की इस बीमारी रानीखेत के लक्षणों एवं बचाव के बारे में पूरी जानकरी पर नजर डालने की कोशिश करेगें –

मुर्गियों की रानीखेत बीमारी है क्या ?

मुर्गीपालन में रानीखेत एक भयंकर बीमारी है. इसको अंग्रेजी में न्यूकैसल डिजीज (newcastle disease) के नाम से जाना जाता है. कहीं-कही इसे आर०डी० और कई इलाकों में झुकुली भी कहा जाता है. यह एक संक्रामक बीमारी है. जो लगभग सभी उम्र की मुर्गियों में देखने को मिलती है. लेकिन एक सप्ताह से तीन सप्ताह के उम्र के बीच की मुर्गियों में रोग के लक्षण अधिक दिखाई देते है. यह तेजी से फैलने वाली बीमारी है. जो पक्षी से दूसरे पक्षी में फैलाने वाली एक छूतदार भयंकर बीमारी है. मुर्गियों यह संक्रामक रोग होने से साँस लेने में परेशानी होती है,और उसकी मृत्यु हो जाती है.

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मुर्गियों में रानीखेत बीमारी के लक्षण

रानीखेत बीमारी से प्रवाभित मुर्गियों में कई प्रकार के लक्षण नजर आते है. यहाँ आपको इसके चार रूपों की जानकारी देते है. जो मुर्गियों में संक्रमण के साथ नजर आते है. –

(1) बीमारी का उग्र रूप या विरूलेंट फार्म (एशियन टाइप)

  • मुर्गियों में इस रूप में बीमारी होने से 100 प्रतिशत म्रत्यु हो सकती है.
  • उग्र रूप में बीमारी 3 से 4 दिन रहती है. लेकिन कभी-कभी इस रोग से ग्रसित सभी मुर्गियां एक ही दिन में मर जाती है.
  • बीमारी के इस उग्र रूप में मुर्गियों को तेज बुखार आ जाता है.
  • बीमारी का मुख्य लक्षण मुर्गियों को साँस लेने काफी कष्ट होता है. ग्रसित मुर्गियां मुँह खोलकर साँस लेती है. साथ ही साँस के साथ विशेष आवाज आती है.
  • मुर्गियों के अंडे का आकार असामान्य एवं अंडे के उत्पादन में भी कमी आती है.

(2) बीमारी कम हानिकारक रूप या मिसोजेनिक फार्म (अमेरिकन टाइप)

  • इस अवस्था में मुर्गियों की मृत्यु दर में 5 से 20 प्रतिशत तक कम होती है.
  • कम हानिकारक रूप में मुर्गियों को सॉस लेने में तकलीफ होती है.
  • मुर्गियों को हरे रंग के दस्त आने लगते है.
  • मुर्गियों में अंडा उत्पादन में कमी आ जाती है.
  • मुर्गियों के पैरों व पंखों में लकवा हो सकता है.

(3) बीमारी का कम प्रभावी रूप या लेंटोजनिक फार्म 

  • बीमारी की इस अवस्था में मुर्गियों की मृत्यु दर काफी कम होती है.
  • मुर्गियों में हल्का स्वास रोग के लक्षण दिखलाई पड़ते है.
  • मुर्गियों में अंडा देने की क्षमता में कमी आती है.

(4) अलक्षणिक फ़ार्म या एसिम्प्टोमेटिक 

  • बीमारी की इस अवस्था में कम आयु के चूजे प्रभावित होते है.
  • मुर्गियों में बीमारी के लक्षण स्पष्ट नही दिखाई पड़ते है.
  • केवल खांसी, उल्टा चलना, सिर लटकाकर दोनो टांगों के बीच में रखना ये सब लक्षण दिखाई पड़ते है.

मुर्गियों का रानीखेत रोग से बचाव कैसे करे 

रानीखेत रोग का अभी तक कोई उपचार नही खोजा जा सका है. केवल टीकाकरण के द्वारा ही मुर्गियों को इस रोग से बचाया जा सकता है.

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कैसे कराये रानीखेत बीमारी का टीकाकरण 

मुर्गियों में रानीखेत बीमारी की रोकथाम के लिए ऍफ़-1, टाइप, लसोटा, आर2बी और एन०डी० किल्ड आदि टीकों का उपयोग किया जाता है.

वही लेयर एवं ब्रीडिंग स्टॉल की मुर्गियों में अंडे शुरू होने के समय एन०डी० किल्ड टीके का उपयोग बीमारी को रोकने के लिए किया जाता है. इसके साथ ही 7 दिन, 28 दिन व 10 सप्ताह की उम्र में भी टीकाकरण किया जाय.

जो भी मुर्गी पालक किसान ब्रायलर का पालन करते है वह 7 दिन की उम्र में रानीखेत बीमारी का टीकाकरण किया जाना चाहिए.

पोल्ट्री फार्मर रखे कुछ बातों का ध्यान

  • रानीखेत बीमारी के लक्षण दिखाई पड़ते ही प्रभवित मुर्गियों को अलग कर देना चाहिए.
  • मुर्गी पालक किसान को मास्क और दस्ताने का उपयोग करना चाहिए.
  • रानीखेत रोग से बचाव मुर्गियों के आवास और आहार का ध्यान रखना चाहिए.
  • मुर्गियों रानीखेत की आशंका होते ही अपनी नजदीकी पशुचिकित्सक से मिलकर अपनी मुर्गियों की जांच कर टीकाकरण जरुर कराये.
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