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Mahua tree farming | महुआ की खेती कैसे करे ? | Mahua ki kheti in hindi

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महुआ की खेती कैसे करे ?

Mahua tree farming | महुआ की खेती कैसे करे ?

महुआ (Mahua) प्राचीन काल से आदिवासी इलाके में रहने वाले लोगो की आमदनी का मुख्य जरिया रहा है. आज देश के विभिन्न राज्यों में इसकी व्यावसायिक खेती की जा रही है. जिससे किसानों की आय में बढ़ोत्तरी हो रही है.

इसीलिए गाँव किसान आज अपने इस लेख में महुआ की खेती की जानकारी अपनी भाषा हिंदी में देगा. जिससे किसान भाई इसकी खेती कर अच्छी आमदनी प्राप्त कर सके.

महुआ का महत्त्व (Importance of mahua)

महुआ भारत के जनजातीय समुदाय का सबसे महत्वपूर्ण भोज्य पदार्थों में से एक है. इसके फूल और फल गर्मी के मौसम में उपजते है.

देश के जनजातीय समुदाय अन्न व अन्य भोज्य पदार्थो के अभाव के समय इसे भोजन के रूप में उपयोग करते है.

मध्य एवं पश्चिमी भारत के दूरदराज वन अंचलों में बसे ग्रामीण आदिवासी जनों के लिए रोजगार के साधन एवं खाद्य रूप में महुआ वृक्ष का महत्त्व बहुत अधिक है.

महुआ को अलग-अलग राज्यों में विभिन्न स्थानीय नामों से जाना जाता है. हिंदी में इसे मोवरा, इंग्लिश में इन्डियन बटर ट्री, संस्कृत में मधुका, गुडपुष्पा आदि नामों से जाना जाता है.

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महुआ के फायदे (Benefits of Mahua)

महुआ के फल भूरे केसरिया रंग के पके हुए गूदेदार बेरी के रूप में 1 से 4 चमकदार बीज पाए जाते है. बीज के अन्दर गिरी का वजन 70 प्रतिशत रहता है.

इसके बीजों में पाए जाने वाले तेल (mahua oil) की मात्रा 33 से 43 प्रतिशत तक होती है. इसके तेल को महुआ बटर या कोको बटर के नाम से पुकारा जाता है.

इसके तेल का उपयोग कन्फेक्सनरी, चाकलेट उद्योग, ग्रीस निर्माण, जूट एवं मोमबत्ती उद्योग में लिया जाता है.

इसके अलावा इसके तेल का उपयोग औषधीय रूप में त्वचा रोगों, गठिया, सिरदर्द कब्ज, बावसीर आदि रोगों में किया जाता है.

आदिवासी समुदाय के लोग इसको भोजन के रूप में खाने और प्रकाश जलाने के काम में लाते है.

महुआ के फूलों से विभिन्न प्रकार के व्यजन जैसे रसकुटका, महुआखोल्ली, महुआ बिस्किट, डोभरी, हलवा, लड्डू, मखानी, जैम आदि बनाए जाते है.

महुआ की पत्तियों का उपयोग बकरियों,भेड़ो एवं मवेशियों के चारे रूप में किया जाता है.

व्यावसायिक रूप से महुआ के फूलों का उपयोग देशी शराब (mahua liquor) बनाने में किया जाता है. एक टन फूलों से 340 लीटर एल्कोहल प्राप्त होता है.

महुआ फूल की पंखुड़ियों में अवांछित गंध वाला तेल प्राप्त होता है. जिसमें पेंसिसायनिन, बीटेन, मेलिक तथा सन्क्सेनिक आदि अम्ल पाए जाते है.

महुआ वृक्ष की छाल का काढ़ा अर्थराईटिस व जोड़ो के दर्द के लिए एवं मधुमेह अदि रोगों में किया जाता है.

महुआ के फलों का उपयोग सब्जी के रूप में भी किया जाता है. इसके फलों को लहसुन और प्याज के साथ पकाकर सब्जी बनाई जाती है.

महुआ के फलों में 55 से 65 प्रतिशत रेशा, 10 से 15 प्रतिशत रेशा, 1.8 से 2.4 प्रतिशत खनिज, 51 से 74 मिलीग्राम विटामिन सी एवं 586 से 890 आई० यू० विटामिन ए प्रति 100 ग्राम पाये जाते है.

महुआ की उत्पत्ति एवं क्षेत्र (Origin and area of Mahua)

महुआ पेड़ का वैज्ञानिक नाम मधुका लोंगीफोलिया (Madhuca longifolia) है. यह सेपोटेसी कुल का पौधा है. इसका अंग्रेजी नाम बटरनट ट्री (Indian Butter Tree) है. इसकी उत्पत्ति मूल रूप से भारत में हुई है. विश्व में इसके पेड़ श्रीलंका, म्यांमार व भारत में पाए जाते है.

भारत में मुख्य रूप से पूर्व उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, गुजरात, राजस्थान आदि राज्यों में बहुतायत पाया जाता है.

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महुआ के लिए जलवायु एवं भूमि (Climate and soil for Mahua)

महुआ के पेड़ के अच्छे विकास के लिए शुष्क उष्ण कटिबंधीय जलवायु की आवश्यकता होती है. इसके लिए 20 से 46 डिग्री तापमान की आवकश्यता पड़ती है. तथा 550 से 1500 मि० मी० वार्षिक वर्षा की जरुरत होती है. इसके लिए सूर्य का प्रकाश अत्यंत प्रिय होता है.

महुआ की खेती लगभग सभी मिट्टियों में की जा सकती है. लेकिन अच्छी उपज के लिए गहरी चिकनी बलुई या रेतीली दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है. इसके अलावा इसे पथरीली, मटियार, खारी व क्षारीय मिट्टी में भी आसानी से उगाया जा सकता है.

महुआ की प्रवर्धन विधि (Propagation Method of Mahua)

महुआ के पौधे का प्रवर्धन बीजों एक कलमों द्वारा किया जा सकता है. जून और अगस्त महीने में इसके बीजों का संग्रहण कर लेना चाहिए. इसके उपरांत बीजों की बुवाई कर देनी चाहिए.

बीजों की बुवाई से पहले इस बात का ध्यान रखे बीजों को गर्म पानी (80 से 100 सेंटीग्रेड) में डालकर उसे शीघ्र ठंडा कर लेना चाहिए. फिर उसे 24 घंटे तक उसी में डुबोकर रख देना चाहिए.

महुआ की नर्सरी तैयार करने की विधि (Method for preparing mahua nursery)

1. क्यारियों में नर्सरी तैयार करना 

महुआ की पौधे क्यारियों में बरसात के दिनों में तैयार की जाती है. इसके लिए उपचारित बीजो को 2 सेमी० गहराई पर लाइनों में 10 सेमी० X 10 सेमी० के अंतराल पर नाली बनाकर बोना चाहिए. बुवाई के उपरांत क्यारियों की सिंचाई करनी चाहिए. बुवाई के 10 से 15 दिन बाद अंकुरण प्रारंभ हो जाता है.

2. पोलीथिन की थैलियों में नर्सरी तैयार करना 

महुआ की पोलीथिन थैलियों में नर्सरी तैयार करने के लिए 15 सेमी० X 25 सेमी० आकार की थैलियाँ लि जाती है. इन थैलियों में मिट्टी, खाद बालू की मात्रा उपयुक्त अनुपात 3 : 1 : 1 के मिश्रण से भरकर नर्सरी बेड में जमा कर देना चाहिए. उपचारित बीजों को इन थैलियों में 2 सेमी० की गहराई पर बुवाई कर देनी चाहिये. जब अंकुरण हो जाय तो 2 से 3 दिन बाद सिंचाई कर देना चाहिए.

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महुआ के पौधों की रोपाई विधि (Mahua Plants Transplanting Method)

महुआ के पौधों की रोपाई गर्मी के मौसम के मई-जून माह में की जाती है. इसके लिए 60 सेमी० X 60 सेमी० X 60 सेमी० आकार के कतार से कतार 7 मीटर व पौधे से पौधे की 7 मीटर दूरी रखते हुए गड्ढे खोद लेना चाहिए.

इसके उपरान्त इन गड्ढों को धूप में खुला छोड़ देना चाहिए. पोलीथिन में तैयार किये गए महुआ पौधों का रोपण जुलाई से सितम्बर माह तक तैयार गड्ढों में किया जाता है.

महुआ के पौधों के लिए खाद एवं उर्वरक (Manure and Fertilizer for Mahua Plants)

महुआ के पौधों के अच्छे विकास के लिए खाद एवं उर्वरक की उपयुक्त देनी पड़ती है. इसके एक वर्ष के पौधों को 10 किलों गोबर की खाद, 200 ग्राम यूरिया, 300 ग्राम सिंगल सुपर फ़ॉस्फेट एवं 125 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश की जरुरत पड़ती है.

पौधों के रोपण के समय जुलाई माह में गोबर की खाद सिंगल सुपर फ़ॉस्फेट व पोटाश की पूरी मात्रा में मिलाकर गड्ढों में भर देनी चाहिए.

यूरिया की मात्रा दो बराबर हिस्सों में बांटकर 100 ग्राम यूरिया रोपण के एक माह बाद एवं 100 ग्राम यूरिया रोपण के दो माह बाद पौधों के पास डालना चाहिए.

बताई गयी उर्वरकों की मात्रा 10 वर्षों तक इसी प्रकार देना चाहिए.

महुआ में सिंचाई (Irrigation)

महुआ के पौधों में अगल-अलग समय पर सिंचाई की जाती है. जैसे सुषुप्ता अवस्था, यानि की पत्तियों का झाड़ना, फूल का आना शुरू होना (मार्च से अप्रैल) एएवं फल का लगना शुरू होना (मई) में की जानी चहिये.

यदि इन अवस्थाओं में सिंचाई की जाय तो उपज में भी बढ़ोत्तरी हो जाती है. फिर भी महुआ में शुरू के 2 से 3 वर्षों तक पहली 4 सिंचाई नवम्बर से मार्च तक 5 दिनों के अंतराल पर तथा मार्च के बाद 30 दिनों के अंतराल पर 3 सिचाई करने से पौधों व जड़ों की बढ़वार समुचित रूप से होती है.

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महुआ में पुष्पन व फलन (Flowering and fruiting in Mahua)

महुआ के पौधों में पुष्पन पतझड़ के बाद फरवरी से मार्च के बीच होता है. इसके एक गुच्छे में 10 से 60 फूल लगते है. कम परागण की वजह से 8 से 13 प्रतिशत ही फल बन पाते है. तथा अन्य फूल जमीन पर गिर जाते है.

इसके फल पकने का समय मई के तीसरे सप्ताह से जून के अंत तक होता है. इन फलों से एक सप्ताह के अंदर फोड़कर बीज निकाल लिए जाते है. अन्यथा बीज अन्दर ही अंकुरित हो जाते है.

इसके बीजों में से गिरी निकाल ली जाती है. और जूट के बोरो में लगभग 6 प्रतिशत नमी पर सग्रहित कर ली जाती है. बाद में इस गिरी से तेल निकाल लिया जाता है.

महुआ की उपज (Production of mahua)

महुआ के एक पेड़ से हर साल मीठे फल सूखे हुए 100 से 150 किलोग्राम प्राप्त हो जाते है. अगर तेल प्राप्त करने के लिए बीजों की बात की जाय तो एक पेड़ से हर साल लगभग 60 किग्रा बीज प्राप्त हो जाते है.

अन्य पूछे जाने वाले प्रश्न (Other FAQ)

प्रश्न : महुआ का पेड़ कितने दिन में तैयार होता है?

उत्तर : महुआ 4-5 वर्ष में ही फल-फूल देने लगते हैं।

प्रश्न : महुआ का पेड़ कैसे लगाया जाता है?

उत्तर :  महुआ के पौधों की रोपाई गर्मी के मौसम के मई-जून माह में की जाती है. इसके लिए 60 सेमी० X 60 सेमी० X 60 सेमी० आकार के कतार से कतार 7 मीटर व पौधे से पौधे की 7 मीटर दूरी रखते हुए गड्ढे खोद लेना चाहिए.

प्रश्न : छत्तीसगढ़ में महुआ का क्या रेट है?

उत्तर :  खुले बाजार में इस साल 43 रुपए किलो महुआ बिक रहा है, जबकि पिछले साल इसकी कीमत 25 रुपए थी।

प्रश्न : महुआ कितने रुपए किलो चल रहा है?

उत्तर :  यूपी में महुआ का रेट 40 से 45 रूपये प्रति किलोग्राम है वहीं छत्तीसगढ़ में 50 रूपये प्रति किलोग्राम बिकता है।

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