लैंटाना खरपतवार से पशुओं में बढ़ती विषाक्तता को कैसे रोके, आइये जाने विस्तार से

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लैंटाना से पशुओं में बढ़ती विषाक्तता

लैंटाना से पशुओं में बढ़ती विषाक्तता

लैंटाना एक विषैला खरपतवार है. जिसमें लेंटेडेन नामक जहर पाया जाता है. यह विश्व के लगभग 60 देशों के उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है. वही इसका मूल स्थान मध्य और दक्षिणी अमेरिका है.

अगर भारत की बात की जाय तो लैंटाना कैमारा को लगभग 200 साल पहले यहं अग्रेजों द्वारा लाया गया था. जो बहुत तेजी से पूरे देश में फैल गया. इसका सेवन पशुओं के लिए काफी हानिकारक होता है. जो भी किसान अपने पशुओं को चराने के लिए ले जाते है. वही पशु अधिकतर इसकी चपेट में आकर बीमार पड़ जाते है. तो आइये जानते है लैंटाना से पशुपालक किसान भाई अपने पशुओं को कैसे बचा सकते है.

लैंटाना कैमारा क्या है ?

आम लैंटाना उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पायी जाने एक सदाहर झाड़ीनुमा पौधा होता है. इसकी उंचाई लगभग 6 फुट और यह लगभग 8 फुट चौड़ाई तक फैल जाती है. वही इस झाड़ीनुमा पौधे की पत्तियों की लम्बाई 2 से 5 इंच और चौड़ाई 1 से 2 इंच तक पायी जाती है. इस पौधे के तने और पत्तियां पर खुरदरे बाल पाए जाते है. इसके अलावा यदि इसके पौधे को कुचला जाय, तो उसमें से एक बदबू दार सुगंध निकलती है.

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लैंटाना के पौधे में छोटे गुच्छों में फूल आता है. जिनकी लम्बाई 1 से 2 इंच तक पायी जाती है. इसके फूलों का रंग कई प्रकार का होता है. यह पीले, नारंगी, गुलाबी आदि रंग के पाए जाते है. इसके अलावा इसके फूल का रंग इसके उम्र के अनुसार बदलता भी रहता है. इसके फूल जो दूर से नारंगी दिखाई पड़ते है. वही नज्दीन जाने पर सफेद, पीला और लाल दिखाई पड़ता है.

इसके पौधे में बेरी के जैसे ही फल आते है. जिनका रंग हरा पाया जाता है. जो पकने पर गहरे बैंगनी या काले रंग के हो जाते है.

सभी तरह के लैंटाना में विषाक्तता पायी जाती है. लेकिन जिसके फूलों का रंग लाल होता है. वह सबसे विषैले किस्म के लैंटाना होते है. इनके जहर से सबसे अधिक पशु, मवेशी, भेड़-बकरी, सूअर, खरगोश और चरने वाले सभी पशु प्रभावित होते है.

आखिर लैंटाना क्यों है विषैला ?

लैंटाना की विषाक्तता अधिकतर चरने वाले पशुओं में पायी जाती है. इसका सबसे मुख्य कारक है इसमें पाया जाने वाला सक्रिय पदार्थ पेंटासाइक्लिक ट्राइटरपीनोइड्स से होता है. जिसके कारण पशुओं के लीवर को क्षति और प्रकाश संवेदनशीलता का भी कारण बनता है.

पशुओं में लैंटाना के विषाक्तता के लक्षण

पशुओं में लैंटाना की विषाक्तता के कई लक्षण दिखयी पड़ते है, आइये आपको प्रमुख लक्षणों की जानकारी देते है.

  • पशुओं की त्वचा धुप के प्रति अधिक संवेदन शील होती है.
  • हेपेटॉक्सिसिटी होने के कारण पशुओं का लीवर ख़राब हो जाता है.
  • पशुओं में पीलिया होने के कारण दिखाई देने वाले श्लेष्म का रंग पीला हो जाता है.
  • पशुओं की गैर रंजित त्वचा भाग में लाली और सूजन दिखाई पड़ती है.
  • इसके अलावा आँखों में डिस्चार्ज के साथ ही कान और पलकों में सूजन आ जाती है.
  • पशुओं अल्सर भी हो जाता है, वही बैक्टीरिया के अधिक प्रकोप के कारण त्वचा भी खराब हो जाती है.
  • पशु को धूप बर्दाश्त नही होती है. साथ ही वह भोजन करना बंद कर देता है. इसके अलावा सुस्त और निर्जलित दिखाई पड़ता है.
  • पशुओ को दस्त और काले रंग के मॉल के साथ तेज बदबू वाली गंध भी आती है.
  • गंभीर रूप से प्रभावित जानवर 2 दिनों में ही म्रत्यु हो सकती है. वही कम गंभीर रूप से प्रभावित जानवर 1 से 3 सप्ताह में म्रत्यु हो जाती है.

लैंटाना प्रभावित पशुओं का बचाव

लैंटाना कैमारा से प्रभवित पशु को पशुपालक निम्नांकित तरीके से बचा सकते है –

  • इससे प्रभावित पशु को छायादार स्थान पर बांधना चाहिए.
  • वही पशु को अन्तःशिरा द्रव (DNS/RL) देना लाभकारी होता है.
  • ग्रसित पशु की त्वचा का इलाज एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग करना चाहिए. इसके साथ ही एपिक्यूटेनियस इमल्शन का उपयोग करे.
  • गंभीर रूप से प्रभावित पशुओं को 20 लीटर इलेक्ट्रोलाइट घोल में 3 किलों सक्रिय चारकोल के साथ मिलाकर पिला देना चाहिए. जिसमें सक्रिय चारकोल एक प्रभावी एंटीडोज का कार्य करता है. यदि पशुओ के स्वास्थ्य में सुधार नही हो तो पहली खुराक के ठीक 24 घंटे बाद दूसरी खुराक भी दी जा सकती है.

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लैंटाना की विषाक्तता से बचाव के लिए क्या करे पशुपालक

किसान पशुपालक लैंटाना कैमारा से अपने पशुओं को बचाने के लिए चारगाह, बगीचे और खेतों को इस झाड़ीनुमा खरपतवार से मुक्त रखे. इसके साथ यह भी याद रखे कि सभी तरह के लैंटाना जहरीले होते है. इसलिए चरने वाले मवेशियों खाकर छोटे बछड़े-बछडियों को लैंटाना के पौधे वाले क्षत्रों में ले जाने से बचाना चाहिए. इसके अलावा पशुपालक किसान भाई इस बात का ध्यान रखे कि यदि किसी जानवर ने लैंटाना का सेवन कर लिया है और लक्षण नजर आये तो अपने नजदीकी पशुचिकित्सालय में जाकर पशु चिकित्सक से सलाह जरुर ले.

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