Jujube Farming-बेर की खेती कैसे करे ? जानिए, देश की भाषा हिंदी में

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Jujube Farming
Jujube Farming-बेर की खेती कैसे करे ?

Jujube Farming-बेर की खेती कैसे करे ?

 नमस्कार किसान भाईयों, बेर एक महत्त्वपूर्ण फल है. इसे अनुपयोगी भूमि पर उगाया जा सकता है.किसान भाई बेर की खेती (Jujube Farming) कर अच्छा मुनाफा कमा सकते है.इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आप सभी के लिए बेर की खेती (Jujube Farming) कैसे करे ? इस विषय पर आज अपने लेख के द्वारा पूरी जानकारी देगा, वह भी अपने देश की भाषा हिंदी में.जिससे किसान भाई इसकी अच्छी उपज ले सके.तो आइये जानते है बेर की खेती (Jujube Farming) की पूरी जानकारी-

बेर के फायदे 

बेर को गरीबों का मेवा कहा जाता है. क्योकि बेर में विटामिन ए, बी तथा सी आदि का एक अच्छा एवं सस्ता स्रोत है. जहाँ पर कोई अन्य फसल नही ली जा सकती है इसे वहां भी उगाया जा सकता है. इसकी पत्तियां को भी पशुओ के लिएअच्छा चारा माना जाता है.बेर के फलों को सामान्यतः ताजा ही खाया जाता है. परन्तु इससे विभिन्न प्रकार के उत्पाद भी बनाए जाते है जैसे जैम, मुरब्बा, जैली, कैंडी आदि. इसे सुखाकर भी खाया जाता है.

बेर की उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

बेर (Zizyphus mauritiana Lam) रैम्नेसी कुल (Rhamnaceae) का महत्वपूर्ण पौधा है. जिसकी उत्पत्ति भारत में हुई. भारत में बेर उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्य पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, असम, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु व पश्चिम बंगाल है.

बेर के लिए जलवायु 

बेर की खेती (Jujube Farming) के लिए मुख्य रूप से शुष्क एवं गर्म जलवायु चाहिए.बेर प्रतिकूल जलवायु सहन करने में सक्षम फल है. बेर के अच्छे फलन के लिए फसल आने के समय मौसम शुष्क होना आवश्यक है.यह फल सूखा की स्थित को आसानी से सहन कर सकता है. क्योकि इसकी जड़े काफी गहराई में चली जाती है.अधिक पाले की स्थित बेर की खेती के लिए अच्छी नहीं होती है.

उपयुक्त मिट्टी 

बेर को विभिन्न प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है.परन्तु गहरी बलुई दोमट मिट्टी जो हल्की क्षारीय हो इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम होती है.ऐसी भूमि जहा का पी० एच० मान 8.5 से अधिक हो वहां भी बेर को आसानी से उगाया जा सकता है.

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बेर की प्रजातियाँ 

भारत में लगभग बेर की 300 किस्में पायी जाती है.जिनमें से प्रमुख निम्नवत है-

अगेती किस्में (Early varieties) मध्य किस्में (Mid varieties) पछेती किस्में (Late varieties)
गोला, बनारसी गोला, काला गोरा, सफेदा, सेव बनारसी कड़ाका, कैथली, मुंडिया मुरहरा, मेहरून उमरान, इलायची, पठानी, कथा, महारवाली, जोगिया, अजमेरी

प्रवर्धन 

बेर का प्रवर्धन बीज के साथ साथ विभिन्न वानस्पतिक विधियों द्वारा भी किया जा सकता है. बीज द्वारा तैयार किये गए पौधे अपनी प्रजाति के लक्षणों को बनाये रखने में सक्षम नही होते है.जबकि वानस्पतिक विधियों द्वारा तैयार किये गए पौधे गुणों में अपनी प्रजाति के पौधों के समान हो होते है.छल्ला कलिकायन (Ring budding) व टी या शील्ड कलिकायन (T or Shield budding) प्रमुख बेर के प्रवर्धन की की प्रमुख विधियाँ है. रिंग बडिंग जून में तथा टी या शील्ड बडिंग जुलाई अगस्त में की जा सकती है.

रोपण 

बेर के पौधों की रोपाई मानसून के प्रारंभ की जाती है.सिंचित क्षेत्रों (Irrigated regions) में इसकी रोपाई फरवरी-मार्च में भी की जा सकती है. वर्षा आधरित खेती (Rainfed farming) के अंतर्गत पौधों की रोपाई वर्गाकार विधि में 6 X 6 मीटर की दूरी पर जबकि सिंचित क्षेत्रों (Irrigated regions)  में 8 x 8 मीटर की दूरी पर करते है. पौधा लगाने से एक महीना पहले 1 x 1 x 1 मीटर माप का गड्ढा खोद लेते है एवं गड्ढों से निकली मिट्टी में 25 किग्रा० गोबर की खाद, 1 किग्रा० नीम की खली एवं 1 किग्रा० बोन मील मिलाकर गड्ढों को भर देते है तथा सिंचाई कर देते है. जब गड्ढों को की मिट्टी बैठ जाय तो पौधे लगाकर सिंचाई कर लेते है.

खाद एवं उर्वरक 

बेर की अच्छी उपज के लिए एक पूर्ण विकसित 5 वर्ष की आयु के पौधे में प्रतिवर्ष लगभग 40 से 50 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद के अलावा 700 से 750 ग्राम नाइट्रोजन एवं 300 ग्राम फास्फोरस तथा 200 ग्राम पोटाश देना चाहिए.कम्पोस्ट या गोबर की सदी हुई खाद की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की आधी मात्रा जून जुलाई तथा शेष मात्रा को फलन के बाद नवम्बर दिसम्बर में देना चाहिए.

सिंचाई 

बेर के छोटे पौधों को आवश्यकतानुसार 10 से 15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए. फलदार वृक्षों में नवम्बर से फरवरी के बीच 3 से 4 सप्ताह के अंतराल  पर सिंचाई करनी चाहिए. परन्तु अक्टूबर के महीने में सिंचाई करनी चाहिए. क्योकि इससे फूल गिरने लगते है.

फलों की तुड़ाई एवं उपज 

बेर में पुष्पन (Flowering) से लेकर फलों की तुड़ाई के बीच 150 से 175 दिन का समय लगता है. बेर के फलों की तुड़ाई फरवरी माह से प्रारम्भ होती है. फल जो पूरा आकार प्राप्त कर चुके हो एवं जिन पर हल्की पीले रंग की आभा दिखने लगे उन्हें तुड़ाई योग्य समझाना चाहिए. सिंचित क्षेत्रों में एक पेड़ से औसतन 1 से 2 कुंटल एवं वर्षा आधारित खेती के अंतर्गत 50 से 80 किग्रा० प्रति पेड़ तक की उपज प्राप्त होती है.

तुड़ाई के उपरान्त बेर के फलों को कमरे के सामान्य तापमान पर केवल 3 से 4 दिनों तक ही रखा जा सकता है. परन्तु यदि फलों को छिद्रयुक्त पॉलीथीन में रखा जाय तो यह अवधि 10 दिनों तक बढाई जा सकती है. तुड़ाई के बाद फलों की प्रीकूलिंग के लिए रखना चाहिए.

प्रीकूलिंग तुड़ाई के उपरांत फलों के तापमान को कम करने की प्रक्रिया है.जिसके अंतर्गत फलों को तुड़ाई के बाद छाये में या किसी हवादार कमरे में रखा जाता है. जिससे फलों का तापमान सामान्य हो सके. यह प्रीकूलिंग की सबसे सरल विधि है.

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कीट एवं ब्याधि प्रबन्धन  

छाल खाने वाले सूंडी 

छाल काटने वाले कीट के सूंडी पेड़ की छाल को खाते है जिससे पेड़ की डालियाँ कमजोर हो जाती है और टूट जाती है.जिसका उपज पर सीधा असर पड़ता है.

रोकथाम 

इसकी रोकथाम के लिए खेत की सफाई करनी चाहिए.ग्रीष्म कालीन मौसम में बाग़ की गहरी जुताई करनी चाहिए.अधिक प्रकोप होने पर जुलाई या अगस्त के महीने में डाईक्लोरवास 25 ई० सी० 1 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर पेड़ों पर दो से तीन बार छिड़काव करे.

बेर बीटल 

बेर बीटल कीट का प्रकोप जून से जुलाई के महीने में ज्यादा होता है.यह कीट पेड़ की पत्तियों और शाखाओं को अधिक नुकसान पहुंचता है.जिससे पेड़ की पत्तियों में छेंद हो जाते है.

रोकथाम 

बेर बीटल कीट की रोकथाम के लिए पहली बरसात के बाद क्यूनालफास 25 ई० सी० 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में डालकर घोल बना ले और पेड़ों पर छिड़काव करे.

फल मक्खी 

जिन पौधे के फल देर से पकते है उन्ही पर इस कीट का ज्यादा आक्रमण होता है.फल मक्खी काफी छोटी एवं भूरे रंग की होती है.तथा इसके गर्दन पर पीले तथा काले रंग के धब्बे होते है.इस कीट से संक्रमित फल खाने योग्य नही होते है.

रोकथाम 

गर्मी में बगीचे की जुताई कर देने से मिट्टी के अंदर छिपे फल मक्खी के अंडे बच्चे मर जाते है.मई माह में किसी कीटनाशक दवा का एक छिड़काव कर देने से यह कीट लगभग समाप्त हो जाता है.

चूर्णिल असिता

चूर्णिल असिता रोग बर्ष के मौसम के बाद पेड़ों पर अक्टूबर या नवम्बर में दिखाई देता है. इसका प्रकोप पेड़ की पत्तियों, टहनियों पर और फूलों पर अधिक होता है. इससे पेड़ के सभी भागो पर सफेद पाउडर सा दिखाई पड़ता है.जिससे पेड़ का विकास रुक जाता है और पेड़ की उपज को नुकसान पहुंचता है.

रोकथाम 

ई सरोग की रोकथाम के लिए पेड़ पर केराथिन एल० सी० 1 मिली लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करे. पूरी सुरक्षा के लिए 15 दिन बाद दोबारा छिड़काव करे.

पत्तियों का काला धब्बा 

पत्ती का काला धब्बा रोग की शुरुवात नवम्बर महीने में बेर में दिखाई पड़ती है. आल्टरनेरिया नामक फफूंद के कारण यह पेड़ों पर फैलता है.इससे पेड़ की पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बे बन जाते है. जो बाद में बड़े हो जाते है और पत्तियां सूख जाती है.

रोकथाम 

इस रोग की रोकथाम के लिए मेन्कोजेब 3 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोल कर 2 से 3 बार 15 दिन के अंतर पर पेड़ों पर छिड़काव करे.

निष्कर्ष 

किसान दोस्तों, उम्मीद है गाँव किसान (Gaon Kisan) का बेर की खेती (Jujube Farming) सम्बन्धी लेख से बेर की खेती (Jujube Farming) की पूरी जानकरी मिल पायी होगी. गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा बेर के फायदे से लेकर कीट एवं ब्याधि प्रबंधन तक की सभी जानकारियां दी गयी है. अगर फिर भी बेर की खेती (Jujube Farming) सम्बन्धी कोई प्रश्न या सुझाव हो तो कमेन्ट बाक्स में आकर कमेन्ट करे. साथ ही यह लेख आप सभी को कैसा लगा कमेन्ट करके जरुर बताए. महान कृपा होगी.

आप सभी लोगो का बहुत-बहुत धन्यवाद. जय हिन्द.

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