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आइए जानते, खेती की फसल उत्पादन में पोटाश का महत्व

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Importance of potash in agricultural
Importance of potash in agricultural

फसल उत्पादन में पोटाश का महत्व

कृषि में फसलों के अच्छी उपज के लिए उर्वरक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. ज्यादातर किसान भाई नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का उपयोग अपनी फसलों में करते हैं. जिससे उन्हें अच्छी उपज प्राप्त होती है.

नाइट्रोजन, फास्फोरस के बाद पोटाश तीसरा प्रमुख तत्व जो फसलों के लिए आवश्यक है. कृषि में इस तत्व के महत्व को लगभग 160 वर्ष पूर्व  जानकारी हुई थी. यह पशुओं और पौधों दोनों के विकास के लिए जरूरी होता है. पौधों में यह जड़ों द्वारा अवशोषित किया जाता है.

फसलों में पोटाश की आवश्यकता

उर्वरकों के उपयोग से कृषि उत्पादन में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है. इसका उत्पादन में लगभग 50% का योगदान होता है. कृषि की लगभग सभी फसलों को नाइट्रोजन के बराबर ही पोटाश की आवश्यकता होती है. यदि भूमि में पोटेशियम की कमी पाई जाती है. तो किसान भाई पोटेशियम उर्वरक जैसे पोटेशियम सल्फेट एवं पोटेशियम क्लोराइड द्वारा इसकी आपूर्ति कर सकते हैं. फसलों को जितनी अधिक उपज होगी उतनी ही अधिक उनको पोटेशियम की जरूरत पड़ती है.

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फसलों में पोटाश का मुख्य कार्य

पोटाश के बिना किसी भी फसल का जीवन चक्र पूरा नहीं हो सकता है. यह 60 से अधिक एंजाइम को सक्रिय करता है. पौधों के भीतर पोटेशियम का अधिकतर अंश स्वतंत्र धनायन के रूप में चलता रहता है. तो आइए आपको बताते हैं फसलों में पोटाश के मुख्य कार्य कौन-कौन से हैं-

  • पोटाश पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करता है इस तरह यह  पौधों में कार्बोहाइड्रेट वसा तेल एवं प्रोटीन के निर्माण में सहायता करता है.
  • यह पौधों में शर्करा के निर्माण एवं स्थानांतरण के लिए जरूरी तत्व है इसका गन्ना चुकंदर एवं शकरकंद आदि फसलों में बहुत महत्व तत्व है.
  • यह पोटेशियम को प्रकाश संश्लेषण द्वारा बीज जड़ फल कंद आदि पौधों के भंडारण अंगों तक पहुंचाने में मदद करता है.
  • पोटाश द्वारा पौधे में प्रोटीन की मात्रा बढ़ती है जिसके फलस्वरूप नाइट्रोजन की क्षमता में वृद्धि भी होती है.
  • पोटाश फसलों को पीरों मकोड़ों रोगों सूखा एवं कोहरा आज से बचाने में सहायक होती है.
  • पोटाश के उपयोग से फसलों के पौधे गिरने से बच जाते हैं.
  • पोटाश के उपयोग से फसलों के पौधों की जड़ों में जल अवशोषण बढ़ जाता है जिसके परिणाम स्वरूप सिंचाई के पानी की मात्रा में बचत होती है.
  • यहां पौधों की गुणवत्ता को अच्छा बना देता है जिस से उत्पादित फसल को काफी दिनों तक भंडारण करने पर खराब नहीं होती है.
  • रेशे वाली फसलों तंबाकू एवं फलों की फसलों के लिए पोटाश का विशेष महत्व होता है.
  • तेल वाली फसलों में पोटाश का उपयोग पौधों की अच्छी वृद्धि करता है.
  • इसके उपयोग से दलहनी फसलों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ जाती है.
  • यह नाइट्रोजन और फास्फोरस की उपयोगिता को बढ़ाता है.

पौधों में पोटाश की कमी के लक्षण

  • पोटाश की कमी से पौधों की पत्तियों का रंग गहरा हो जाता है.
  • इसके अलावा पौधों के विकास और वृद्धि में भी कमी हो जाती है.
  • तथा पुरानी पत्तियों पर सफेद पीला या नारंगी हरिमाहीन धब्बे धारियां दिखाई पड़ने लगती हैं.
  • पौधे के हरिमाहीन भागो पर ऊतक खत्म हो जाते हैं.
  • पौधे की पत्तियां सूख जाती हैं. एवं उनके भी उतक मर जाते हैं.
  • यह सब लक्षण पौधे की नई पत्तियों तक पहुंच जाते हैं. बाद में पौधा सूख जाता है. और मर जाता है.
  • पौधों में सूखा सहन करने की क्षमता खत्म हो जाती है.
  • पोटाश की कमी से पौधे की जड़ों का समुचित विकास नहीं होता है.

अगर यह सब लक्षण पौधे में दिखाई पड़े. तो समझ जाना चाहिए कि पौधे में पोटाश की कमी हो गई है. साथ ही अपनी भूमि का मृदा परीक्षण कराना सबसे उचित कार्य होगा. क्योंकि उसी के आधार पर फसल बुवाई में पोटाश का उपयोग करना लाभदायक होता है.

पोटाश एवं दूसरे पोषक तत्वों के साथ पारस्परिक क्रिया के प्रभाव

पोटाश एवं नाइट्रोजन

पोटाश एवं नाइट्रोजन को आपस में मिलाने पर इनकी पारस्परिक प्रक्रिया धनात्मक होती है. इसीलिए नाइट्रोजन के साथ पोटाश के प्रयोग करने पर नत्रजन की उपयोग क्षमता बढ़ जाती है. तथा अधिक नत्रजन के कुप्रभाव को पोटाश द्वारा कम करने की विशेष भूमिका रहती है.

पोटाश एवं जिंक

पोटाश और जिनको एक साथ उपयोग करने से इनकी भी पारस्परिक प्रक्रिया धनात्मक पाई जाती है. जिंक के साथ पोटाश का प्रयोग करने से आलू की उपज में अच्छी वृद्धि होती है.

पोटाश एवं बोरान

इनको भी आपस में मिलाने पर इनकी भी पारस्परिक क्रिया धनात्मक पाई जाती है. इसलिए दोनों को एक साथ उपयोग करने से दोनों की उपयोग क्षमता बढ़ती है. तथा उपज में अच्छी वृद्धि होती है.

पोटाश एवं मैग्निशियम

पोटाश के साथ मैग्नीशियम एक साथ उपयोग करने पर इन की प्रक्रिया आपस में ऋणात्मक होती है. जब भूमि पोटाश एवं मैग्नीशियम दोनों की मांग होती है. तो केवल भूमि में पोटाश ही डाला जाता है. तब भूमि में मैग्नीशियम की कमी पाई जाती है. गेहूं, सरसों, रोपी गई फसलों एवं सामान्यता औद्योगिक फसलों में पोटेशियम एवं मैग्नीशियम के बीच ऋणात्मक पर इस प्रक्रिया में अनुभव की गई है.

प्रमुख पोटाश वाले उर्वरक एवं उनके गुण

पोटाश वाले उर्वरक देश में आयात किए जाते हैं. क्योंकि हमारे देश में पोटेशियम वाले उर्वरको का उत्पादन नहीं किया जाता है. प्रमुख पोटाश वाले उर्वरकों में म्यूरेट आफ पोटाश है. इसमें 60% पोटाश पाया जाता है. पोटाश की कुल खपत का 99% अंश म्यूरेट आफ पोटाश द्वारा पूरा होता है. अन्य पोटाश  वाले उर्वरकों में पोटेशियम सल्फेट, पोटैशियम नाइट्रेट, पोटैशियम मैग्निशियम सल्फेट हैं.

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 पोटाश उर्वरक का उपयोग कैसे करें

  • पोटाश उर्वरक का उपयोग ऐसी जगह करना चाहिए, जहां पौधे की जड़े इसे आसानी से इसको अवशोषित कर ले.
  • जल वृद्धि एवं सिंचाई हो जाने पर सतह पर डाला गया पोटाश आसानी से पानी के साथ नीचे पौधों की जड़ों तक पहुंच जाए और पौधे उसे आसानी से उपयोग मे ले सके.
  • इसके सांद्र उर्वरक को मिट्टी के साथ मिलाकर उपयोग में लाना चाहिए.
  • पोटाश उर्वरक को ऊपर पट्टियों में बीजों के साथ कतारों में बीज के नीचे एवं बगल में प्रयोग किया जा सकता है.
  • पोटाश का उपयोग फसल उगने के कुछ सप्ताहों बाद पट्टियों में करना चाहिए तथा इसकी गुड़ाई भी कर देनी चाहिए.
  • भूमि की सतह पर शुष्क पोटाश उर्वरक को एक साथ बिखेर देना चाहिए. यह कार्य भूमि तैयारी के समय करना सबसे उपयुक्त होता है. क्योंकि पोटाश फसल की भूमि में गहराई तक पहुंच जाता है. जहां पर जड़े इसे आसानी से अवशोषित कर लेती हैं.
  • भूमि की सतह के नीचे पत्तियों में इसका उपयोग सबसे उपयुक्त होता है. क्योंकि यह जड़ों तक आसानी से पहुंच जाता है.
  • सिंचाई के साथ भी इसका उपयोग फसलों के लिए लाभदायक होता है.

किसान भाई अच्छी उपज के लिए अपनी फसलों में पोटाश का उपयोग जरूर करें. इसके लिए सबसे पहले वह अपने भूमि की मिट्टी की जांच करा लें. इससे उन्हें यह ज्ञात हो जाएगा. कि उन्हें कितनी मात्रा में कौन सी उर्वरक भूमि में देनी है. जिससे उनकी फसल की उपज अच्छी हो सके.

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