गाय और भैंस की गर्भावस्था के दौरान उचित देखभाल कैसे करें ? 

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care of cow and buffalo during pregnancy
गाय और भैंस की गर्भावस्था के दौरान उचित देखभाल

गाय और भैंस की गर्भावस्था के दौरान उचित देखभाल

देश में कृषि के बाद पशुपालन व्यवसाय किसानों एवं युवाओं का एक मुख्य आय का जरिया है जिससे हर साल वह अच्छा खासा मुनाफा कमाते हैं.पशुपालन व्यवसाय में भैंस और गायों का नियमित अंतराल पर ब्याना काफी आवश्यक होता है क्योंकि इनके दूध उत्पादन पर ही यह व्यवसाय टिका होता है.

इसीलिए पशुओं के स्वास्थ्य तथा संतुलित आहार का जन्म से ही समुचित ध्यान रखने से वह कम उम्र में ही गर्भधारण करवाने पर जल्दी बच्चा देने योग्य हो जाते हैं इसीलिए भैंस वादा 1er व्यवस्था पर रख रखा उत्तम होना चाहिए जिससे पशु अपने सूखे समय के दौरान दुग्ध उत्पादन के पोषक तत्व और गर्भ में पलने वाले बच्चे के पोषण की जरूरत पूरी कर सके-

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गर्भावस्था के दौरान गाय एवं भैंस की निम्न देखभाल रखें

पशु के ब्याने से पहले अतिरिक्त पोषक तत्व उसके शरीर में जमा हो जाते हैं जिसका उपयोग में आने के पश्चात दूध उत्पादन में होता है पशु की गर्भावस्था के दौरान गर्भ में पल रहे बच्चे का विकास 6 से 7 माह के दौरान बहुत तेजी से होता है जिससे  गर्भ में बच्चे और पशु  केस शरीर में विशेष परिवर्तन दिखाई पड़ने लगते हैं इस दौरान  मद चक्र रुक जाना पेट का आकार बढ़ना शरीर का भार बढ़ना यह सभी लक्षण गर्भावस्था की निशानी होते हैं तो आइए जानते हैं पशु की गर्भावस्था के दौरान किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए-

  • जब पशु गाभिन हो जाए और छह-सात माह का गर्भ काल हो जाए तो उसे चढ़ने के लिए ज्यादा दूर तक नहीं ले जाना चाहिए.
  • गर्भकाल के दौरान पशु को दौड़ाना नहीं चाहिए. साथ ही इस बात का ध्यान रखें उसे उबड़ खाबड़ रास्तों पर भी नहीं घुमाना चाहिए .
  • गाभिन पशु को फिसलने वाली जगह पर नहीं बनना चाहिए.यदि पशु को फर्श पर बांध रहे तो उस फर्श पर घास फूस आदि बिछावन जरूर डालनी चाहिए.
  • गाभिन पशु को अन्य पशुओं से लड़ने से बचाना चाहिए. क्योंकि लड़ाई के दौरान गर्भ नष्ट होने का डर रहता है.
  • गाभिन पशु को नियमित रूप से व्यायाम जरूर करवाना चाहिए.
  • जब पशु गाभिन हो जाए तो उसे अन्य पशुओं से अलग बांधना चाहिए जिससे  उसकी देखरेख भली प्रकार हो सके.
  • गाभिन पशु को संक्रामक रोगों से बचाने के लिए अन्य पशुओं या बीमार पशुओं से अलग ही बांधना चाहिए.
  • पशुओं की गर्भावस्था के दौरान उसके बाड़े की अच्छे से साफ सफाई करनी चाहिए तथा गोबर मूत्र आज की अच्छे से सफाई करके बाड़े से दूर डालना चाहिए.
  • गाभिन पशु को जहां पर बांधा जाए, वहां पर उसके बैठने के लिए पर्याप्त स्थान होना चाहिए.
  • पशु जिस स्थान पर बांधा जाए उस स्थान पर पीछे का हिस्सा आगे के हिस्से से थोड़ा ऊंचा होना चाहिए.
  • गाभिन पशु के लिए हर समय स्वच्छ एवं ताजा पानी उपलब्ध होना चाहिए.
  • गर्भकाल के अंतिम 3 महीने में पशु को अतिरिक्त पोषक तत्वों की जरूरत होती है इसलिए उसे उचित पोषक  तत्व से भरपूर  चारा खिलाना चाहिए.
  • गाभिन पशु को आहार में लगभग 1 किलोग्राम दाने के साथ 1% अतिरिक्त नमक व खनिज मिश्रण देना जरूरी होता है
  • गोविंद पशु को पोषक आहार की जरूरत होती है जिससे ब्याने के समय दुग्ध-ज्वर और कीटॉसिस जैसे रोग ना हो और दूध उत्पादन पर भी इसका प्रभाव ना पड़े.
  • यदि गर्मी का मौसम हो तो पशु को तेज धूप से बचाना चाहिए और ऐसी जगह बांधे जहां पेड़ों की छाँव हो तो सबसे अच्छा रहता है.
  • दूध देने वाले पशुओं को ब्याने के 2 महीने पहले दूध निकालना बंद कर देना चाहिए अन्यथा की स्थिति में बच्चा कमजोर होगा और अगले ब्यात में पशु दूध भी कम देगा.
  • दूध निकालने की स्थिति में पशु की प्रजनन क्षमता पर भी प्रभाव पड़ता है.
  • गाभिन पशु का उचित चारा होना चाहिए चारे में हरे चारे की मात्रा प्रचुर होनी चाहिए.

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  • गाभिन पशु का चारा व्यवस्था उचित होनी चाहिए. जिससे उससे कब्ज या पाचन संबंधित रोग ना होने पाए. अगर पाचन संबंधित दिक्कत हो, तो अलसी का तेल आप पशु को दे सकते हैं.
  • पशु के ब्याने के चार-पांच दिन पूर्व गाभिन पशु को अन्य पशुओं से अलग बांधना चाहिए.
  •  इसके अलावा इस बात का ध्यान रखें बांधने वाला स्थान स्वच्छ हवादार और रोशनी से भरपूर होना चाहिए.
  • ब्याने से चार-पांच दिन पूर्व से ही पशु की खास निगरानी रखनी चाहिए.
  • गाभिन पशु में अगर किसी खास प्रकार के लक्षण दिखाई दें. तो तुरंत ही अपने नजदीकी पशु चिकित्सालय या पशु चिकित्सक से जरूर संपर्क करें और पशु की पूरी जानकारी दें.

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