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Guava Farming – अमरूद की खेती की पूरी जानकारी (हिंदी में)

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अमरूद की खेती (Guava farming) की पूरी जानकारी 

अमरूद की खेती (Guava farming) की पूरी जानकारी 

नमस्कार किसान भाईयों, अमरुद की खेती (Guava farming) देश के सभी भागों में की जाती है. यह एक महत्वपूर्ण फल है. किसान भाई कम लागत में इसकी खेती से अच्छा मुनाफा कमा सकते है. इसलिए गाँव किसान (Gaon kisan) आज अपने इस लेख में अमरुद की खेती (Guava farming) की पूरी जानकारी अपनी भाषा हिंदी में देगा, जिससे किसान भाई अच्छी उपज प्राप्त कर सके. तो आइये जानते है अमरुद की खेती (Guava farming) की पूरी जानकारी –

अमरुद के फायदे 

अमरुद के फलों में प्रचुर मात्रा में विटामिन सी, लौह व अन्य खनिज तत्व पाए जाते है. इसी कारण इसे ग़रीबों के सेब के नाम से जाना जाता है.इसका पौधा मध्यम आकार एवं बहुत कठोर होता है. इसलिए कम देखभाल में इसकी खेती आसानी से की जा सकती है. अमरुद को ताज़ी अवस्था में ही खाया जाता है.अमरुद से अनेक प्रकार के परिरक्षित उत्पाद भी बनाए जाते है.जैसे- जैली, स्क्वैश, नेक्टर, साइडर, सीरप, कैंडी एवं टाफी आदि प्रमुख उत्पाद है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र

अमरूद (Psidium guajava) मैरिटेसी (Myrtancene) कुल का पौधा है, तथा इसकी उत्पत्ति मूलतः उत्तरी अमेरिका के मैक्सिको में हुई है. भारत में इसकी खेती सभी राज्यों में की जाती है. लेकिन प्रमुख उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, झारखण्ड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ आदि है.

मृदा एवं जलवायु (Guava farming)

अमरुद के सफल उत्पादन के लिए उचित जल निकास वाली बलुई दोमट मृदा सर्वाधिक उपयुक्त होती है तथा ऐसी मृदा का पी० एच० मान 7 से 8 के बीज उपयुक्त होता है.परन्तु यदि जिस मृदा का पी० एच० मान सामान्य से कम होता है वहां पर भी अमरुद की खेती आसानी से की जा सकती है.

अमरुद के लिए उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय फल वृक्ष है और कम नमी वाले क्षेत्रों में भी इसकी खेती आसानी से की जा सकती है. उपोषण जलवायु में फलन वर्षभर में दो से तीन बार आते है. परन्तु मृग बहार के फल जो शरद ऋतु में परिपक्व होते है. वे गुणवत्ता में बहुत अच्छे माने जाते है. आंबे बहार के फल बरसात के महीने में तैयार होते है तथा इनकी गुणवत्ता व जीवनकाल भी बहुत कम होता है.

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प्रजातियाँ (Guava farming)

भारत में अमरुद की अनेक प्रजातियाँ उगाई जाती है. परन्तु उनमें से कुछ व्यवसायिक द्रष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है. इनमें इलाहाबाद सफेदा, सरदार (लखनऊ-49), ललित, अर्कामृदुला, श्वेता, अर्का अमूल्य, अर्का रश्मी, पन्त प्रभात, हिसार सफेदा, संगम, हरीझा, चित्तीदार, बनारसी आदि प्रमुख किस्में है.

प्रवर्धन (Guava farming) 

अमरुद के पौधे बीज एवं वानस्पतिक तरीके से तैयार किये जाते है, परन्तु व्यवसायिक द्रष्टिकोण से वानस्पतिक विधि ही फायदेमंद होती है. क्योकि इस विधि से तैयार पौधों में शीघ्र फलन प्रारंभ हो जाता है और सत्य प्रजाति के फलों की प्राप्ति बनी रहती है. इसका व्यावसायिक प्रवर्धन गूटी (Air layening), शीर्ष कलम बंधन (Wedge/top grafting) तथा स्टूल दाब विधि (Stool or mould layering) द्वारा प्रमुखता से किया जाता है.

रोपण (Guava farming)

अमरुद का पौधा अपेक्षाकृत मध्यम-छोटे कद एवं कठोर प्रव्रत्तिका होता है. इसलिए रोपण 5 X 5 मीटर की दूरी पर वर्गाकार विधि (Squre system) में करते है जबकि अमरुद की सघन बागवानी 3.0 X 2.5, 3.5 X 2.5, 2.5 X 2.5, 3 X 2 या 2 X 1 मीटर की दूरी पर लगाकर की जा सकती है.परन्तु इसमें उच्च प्रबन्धन एवं कांट-छांट की नियमित आवश्यकता पड़ती है.

अमरुद लगाने के लिए सबसे अच्छा समय मानसून का (जुलाई से सितम्बर) होता है. लेकिन जहाँ सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो वहां पर बसंत के समय (फरवरी-मार्च) में भी पौधा रोपण किया जा सकता है. पौधा लगाने से एक माह पूर्व निश्चित दूरी पर रेखांकन करके 60 X 60 X 60 सेमी० आकार के गड्ढे तैयार कर लिए जाते है तथा गड्ढों को 15 दिनों तक खुला छोड़ने के पश्चात गड्ढे की उपरी सतह की भुरभुरी मृदा में 10 से 15 किग्रा० गोबर की सड़ी खाद, 1 किग्रा० करंज या नमी की खल्ली तथा 60 ग्राम नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश का मिश्रण मिलाकर गड्ढे को ढक दिया जाता है. बरसात या फिर सिंचाई करने से गड्ढे की मिट्टी दब जाती है. तब पौधों को गड्ढों के बीचों बीच लगाकर सिंचाई कर देते है.

संघाई एवं कांट-छांट (Guava Farming)

अमरूद के पौधों को आकर्षक छत्रक जैसा मजबूत ढांचा देने के लिए शुरुवात 2 से 3 वर्षों तक कटाई-छटाई करनी चाहिए. ढांचा निर्माण के समय इस बात का विशेष ध्यान देना चाहिए कि मृदा सतह से 30 से 40 सेमी० तक मुख्य शाखा को बढ़ने दिया जाय. इसके बाद अमरूद के मुख्य तने से 3 से 4 शाखाओं को चारों ओर समान रूप से बढ़ने दे. अमरुद के पुष्पन एवं फलन नए शाखाओं (30 से 45 दिन पुरानी) पर ही आता है. इसलिए नए प्ररोहों के विकास के लिए अच्छी प्रकार से कांत-छांट की आवश्यकता होती है. अमरूद में प्रति वर्ष दो या तीन बार फल प्राप्त होते है. इसलिए क्षेत्र की अनुकूलता एवं उपयुक्त मौसम की फलत लेने हेतु कांट-छांट का समय एवं गहनता का निर्धारण करके गुणवत्ता युक्त अधिक उपज हासिल किया जाता है.

खाद, उर्वरक एवं सिंचाई 

अमरूद की अच्छी फसल के लिए खाद एवं उर्वरक की उचित मात्रा सही समय पर देना आवश्यक है. इसलिए इसकी मात्रा का निर्धारण पौध की आयु एवं क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग होता है. लेकिन सामान्यतया एक वर्ष पुराने पौधे को 60:30:30 ग्राम एन० पी० के० देना चाहिए, तथा उर्वरक की यही मात्रा हर वर्ष बढ़ाई जाती है जो कि 6 वर्षों बाद उर्वरक की मात्रा बढ़कर 360:180:180 ग्राम एन० पी० के० हो जाती है तथा उसके बाद उर्वरक की यही मात्रा हर वर्ष दी जाती है.

पौधों की वार्षिक खाद जरुरत को दो भागों में अलग करके पहला भाग फरवरी-मार्च एवं दूसरा भाग अक्टूबर माह में देना चाहिये. फरवरी-मार्च में गोबर की सड़ी खाद (20 से 25 किग्रा०) एवं उपरोक्त एन० पी० के० में से फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा नाइट्रोजन की आधी मात्रा मुख्य तने से 1 मी० दूरी पर पौधे के छत्रक के नीचे चारो ओर 15 सेमी० गहरी पट्टी में देकर मृदा से ढक दे तथा शेष नत्रजन की मात्रा अक्टूबर में देने के बाद सिंचाई अवश्य कर देना चाहिए.

अमरुद के छोटे एवं नए पौधों को गर्मियों में 10 से 15 दिन एवं सर्दियों में 20 से 25 दिन के अंतराल पर परिवर्तित थाला विधि से नियमित सिंचाई करने से पौधों का विकास अच्छा होता है. पुआल या घास का पलवार बिछाने से पानी का अधिक उपयोग, खरपतवारों पर नियंत्रण, उपज एवं गुणवत्ता वृध्दि होती है.

परिपक्वत्ता एवं फल तोड़ाई 

अमरुद एक नॉन क्लाइमेक्टेरिक (Non-climatcteric) फल होने कारण से पेड़ पर ही अच्छी तरह पकता है. इसलिए पूर्णतः परिपक्व फलों की तुड़ाई करनी चाहिए.फल लगने के 60 से 120 दिनों के भीतर फल तुड़ाई योग्य हो जाते है. अमरुद में सभी फल एक साथ नही पकते इसलिए 2 से 3 दिन के अंतराल पर 6 से 7 तुड़ाई करके पौधे से अच्छी उपज प्राप्त होती है. जब फलों का रंग गहरे हरे रंग से हल्के पीले रंग में बदल जाय तब फल तुड़ाई के योग्य होते है.

उपज

अमरुद के एक विकसित पौधे से लगभग 40 से 42 किग्रा० फल प्रति वर्ष प्राप्त किये जा सकते है. सघन बागवानी वाले बागानों से प्रति पौधा उपज कम हो जाती है. परन्तु प्रति इकाई क्षेत्रफल से अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. सामान्यतया 5 X 5 मीटर दूरी पर लगाए बागों से 15 से 17 मैट्रिक टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.

तोड़ाई उपरांत प्रबन्धन 

अमरुद के फल अधपके अवस्था में ज्यादा खाए जाते है. इसी लिए फलों के रंग एवं गूदे की कठोरता के अनुसार ही तुड़ाई करना चाहिए. अमरुद की तुड़ाई दो पत्ती सहित 2 से 3 दिन के अन्तराल पर करने से बाजार में अधिक मूल्य प्राप्त होता है. तोड़ाई के बाद फलों का श्रेणीकरण, फलों की परिपक्वता एवं उसके अनुसार करके बांस या अरहर की टोकरियाँ में अखबार के परत पर रखकर बाजार में भेजा जा सकता है.

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कीट एवं रोग प्रबन्धन 

अमरुद के पौधों तथा फलों पर विभिन्न प्रकार के कीटों एवं ब्याधियों से अत्यधिक नुकसान होता है. कुछ कीटों एवं रोग निम्न प्रकार है-

फल मक्खी 

इसकी मादा मक्खी परिपक्व फलों के अन्दर 3 से 4 मिमी० गहराई अंडे देती है. बरसात के मौसम में इसका प्रकोप सर्वाधिक होता है.

रोकथाम 

इसके नियंत्रण के लिए साइपर मेथ्रिन 2.0 मिली० प्रति लीटर या मोनोकोटोफ़ॉस 1.5 मिली० प्रति लीटर की दर से पानी में घोल बनाकर फल परिपक्वता के पहले 10 दिन के अंतराल पर 2 से 3 छिड़काव करे. प्रभावित फलों को तोड़कर बाग़ से दूर गड्ढों में दबा देना चाहिए तथा 10 से 12 फेरोमोन ट्रेप प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए.जो कि फल मक्खी के नर वयस्क को आर्कषित करके मार देता है.

तना बेधक

यह कीट अमरुद के बागों को अत्यधिक नुकसान पहुंचाने वाला कीट है. इसका प्रकोप कम देखभाल वाले बागानों में अधिक होता है. इस कीट की सूंडी मुलायम कल्लों को उपरी भाग को खोखला कर नुकसान पहुंचती है और काले रंग के कीट अवशेषों से भर जाती है.

रोकथाम 

इस कीट की रोकथाम के लिए तने के छिद्रों को साफकर नुवान (2 मिली० प्रति लीटर पानी) के घोल में रुई भिगोकर गीली मिट्टी से ढककर बंद कर देना चाहिए.

उकठा रोग 

इस रोग में रोगग्रस्त पौधे 2 से 4 सप्ताह में मुरझाकर सूख जाते है. जबकि कभी-कभी कुछ डाल ही सूखती है और कुछ हरी-भरी ही रहती है. परन्तु इस प्रकार के पौधे भी जल्द ही पूर्ण रूप से सूख जाते है.

रोकथाम 

इस रोग की रोकथाम के लिए एस्पर्जीलस नाइजर नामक जैविक कीटनाशी का पौध रोपण के समय उपयोग द्वारा कुछ हद तक सफलता प्राप्त हुई है.इसके रोग के बचाव के लिए उकठा रोधी किस्म लखनऊ-49 का चयन कर लगाना लाभदायक होता है.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है गाँव किसान (Gaon kisan) का अमरुद की खेती (Guava farming) सम्बन्धित लेख से आप को पूरी जानकारी मिल पायी होगी. गाँव किसान (Gaon kisan) द्वारा अमरुद के फायदे से लेकर अमरुद की कीट एवं रोग प्रबन्धन तक की सभी जानकरियां दी गयी है. फिर भी अमरुद की खेती (Guava farming) से सम्बंधित आपका कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताएं. महान कृपा होगी.

आप सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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