Fennel cultivation in hindi – सौंफ की खेती कैसे करे ? (हिंदी में)

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Fennel cultivation in hindi
सौंफ की खेती (Fennel cultivation in hindi) कैसे करे ?

सौंफ की खेती (Fennel cultivation in hindi) कैसे करे ?

नमस्कार किसान भाईयों, सौंफ की खेती (Fennel cultivation in hindi) रबी की फसल के रूप में ली जाती है. यह बहुवर्षीय रूप में उगाया जाने वाला पौधा है. लेकिन एक वर्षीय फसल के रूप में इसकी उपज कम होती है. इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख में सौंफ की खेती (Fennel cultivation in hindi) की पूरी जानकारी देगा वह भी अपने देश की भाषा हिंदी में. जिससे किसान भाई इसकी अच्छी उपज प्राप्त कर सके. तो आइये जानते है सौंफ की खेती (Fennel cultivation in hindi) की पूरी जानकारी –

सौंफ के फायदे (Benefits of fennel)

सौंफ का हर भाग खुशबूदार होता है. तथा किसी न किसी काम में आता ही है. सौंफ की उपयोगिता इसमें पाए जाने वाले तेल के कारण होती है. तेल की मधुर खुशबू एनीथोल व फ्रेंकोन की इसमें उपस्थिति होने के करण होती है. अच्छी किस्म के वाष्पशील तेल में एथिनील की मात्रा 50 से 70 प्रतिशत तक होती है.

वाष्पशील तेल के अलावा सौंफ में प्रोटीन 9.50 प्रतिशत, नमी 6.30 प्रतिशत, चिकनई 10 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 42.30, रेशे 18.5 प्रतिशत व खनिज पदार्थ 13.40 प्रतिशत पाए जाए है. खनिज पदार्थों में मुख्य रूप से कैल्सियम 1.30 प्रतिशत, फ़ॉस्फोरस 0.48 प्रतिशत, लोहा 0.01 प्रतिशत, सोडियम 0.09 प्रतिशत एवं पोटेशियम 1.70 प्रतिशत पाए जाते है. इसके बीजों में विटामिन बी-1, बी-2, नियासिन, सी या ए भी काफी मात्रा में पाए जाते है.

अच्छी खुशबू एवं स्वाद के कारण सौंफ के दाने, साबुत या पीसकर, सूप, आचार, मांस, सॉस, चाकलेट आदि कई भोज्य पदार्थों में डाला जाता है. खुशबू एवं स्वाद के अलावा सौंफ में पाचक एवं वायुनाशक गुण पाया जाता है. शायद इसीलिए भारत तथा कुछ पड़ोसी देशों में भिजन के बाद शौंफ के दाने चबाने का प्रचालन है. अपने पाचक, अग्निदीपक व वायुनाशक गुणों के कारण हैजा, वायुगोला, हिचकी, डकार, कब्ज, पेचिश, दस्त आदि को ठीक करने वाली दवाओं में सौंफ का बहुत प्रयोग होता है. इसके अलावा सीने, फेफड़े, पित्ताशय व वृक्क के रोगों में सौंफ किसी न किसी रूप में दी जाती है.

सौंफ की उत्पत्ति एवं क्षेत्र (Origin and area of fennel)  

सौंफ का वानस्पतिक नाम फौनीकुल्लम वल्गेयर (Foeniculum vulgare) है. यह एपीएसए (Apiaceae) कुल का पौधा है. इसकी उत्पत्ति दक्षिणी यूरोप और भूमध्य सागरीय क्षेत्रो में हुई है. विश्व में इसकी खेती रूमानिया, रूस, जर्मनी, फ़्रांस, इटली, भारत, जापान, अर्जेंटीना तथा संयुक्त राज्य अमेरिका आदि देशों में की जाती है. भारत में इसकी खेती गुजरात, राजस्थान में मुख्य रूप से की जाती है. इसके अलावा थोड़ी बहुत मात्रा में कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, बिहार व जम्मू-कश्मीर में की जाती है. 

सौंफ की लिए जलवायु एवं भूमि (Climate and land for fennel)

सौंफ की अच्छी उपज के लिए सामान्य किस्म की ठंडी जलवायु सर्वोत्तम होती है. शुष्क और ठंडा मौसम इसके लिए उपयुक्त होता है. इसी कारण दक्षिण भारत में पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़कर सौंफ की खेती नही की जा सकती है.उत्तरी भारत में कई प्रदेशों में रबी की ऋतु में इस तरह का मौसम होता है जिसमें सौंफ उगाई जा सकती है. पाले से इसकी फसल को नुकसान पहुँचता है. जिन क्षेत्रों में जनवरी से मार्च तक पाले की संभावना रहती है वह क्षेत्र सौंफ की खेती के लिए सुरक्षित नही होते है. सौंफ की सफल खेती के लिए जनवरी से मार्च तक का मौसम शुष्क और ठंडा होना चाहिए.

इसकी खेती रेतीली भूमि को छोड़कर सभी तरह की मिट्टी में की जा सकती है. इसकी अच्छी उपज के लिए दोमट या काली बलुई मिट्टी, जिसमें जीवांश की भरपूर मात्रा हो सर्वोत्तम होती है. इस बात का ध्यान रखे खेत से जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए.

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सौंफ की उन्नत किस्में (Advanced varieties of fennel)

सौंफ की उन्नत किस्में निम्नवत इस प्रकार है-

एस०7-9 – इस किस्म को 1956 में जुगदान (जी०ए०यू०) गुजरात द्वारा विकसित किया गया है यह किस्म की अधिक शाखाएं, पुष्प छत्र बड़े, बड़े दाने व पौधा बौना होता है. इस किस्म की पैदावार लगभग 1200 टन प्रति हेक्टेयर है.

पी० ऍफ़०-35 –  इस किस्म को भी 1973 में जुगदान (जी०ए०यू०) गुजरात द्वारा विकसित किया गया है. इस किस्म के फैले हुए पौधे, बड़ा पुष्प छत्र, हल्का हरा तथा गहरी धारीयुक्त मध्यम आकार का बीज होता है. इसकी फसल लगभग 216 दिन में तैयार हो जाती है. इसकी पैदावार लगभग 1650 टन प्रति हेक्टेयर है.

गुजरात सौंफ-1 – इस किस्म को भी 1985 में जुगदान (जी०ए०यू०) गुजरात द्वारा विकसित किया गया है. इस किस्म का पौधा लंबा फैला हुआ झाड़ीनुमा, खरीफ, रबी व शुष्क परिस्थित हेतु उपयुक्त, बड़े आकार के पुष्प छत्र, गहरे हरे रंग के बड़े लम्बे दाने जो झड़ते नहीं है. इसकी फसल लगभग 200 से 230 दिन में तैयार हो जाती है. इसकी पैदावार लगभग 1695 टन प्रति हेक्टेयर है.

को-1 – इस किस्म को 1985 में कोयम्बटूर (टी०एन०ए०यू०) आंध्र प्रदेश द्वारा विकसित किया गया है. इस किस्म के पौधे की लम्बाई मध्यम, घनी शाखाएं, मिश्रित खेती हेतु उपयुक्त, लवणीय मृदा के लिए उपयुक्त होता है. इस किस्म की फसल 210 से 220 दिन में तैयार हो जाती है. इस किस्म की पैदावार लगभग 567 टन प्रति हेक्टेयर है.

सौंफ की बुवाई का समय (Fennel sowing time)

सौंफ एक लम्बी अवधि में पकने वाली फसल है. इसलिए रबी की शुरुवात में ही बुवाई करना अधिक उपज के लिए लाभदायक होता है. इसकी अच्छी उपज के लिए बुवाई 10 नवम्बर से पहले कर लेनी चाहिए. मिर्च या अन्य सब्जियों के साथ मिश्रित खेती के लिए सौंफ की बुवाई अगस्त-सितम्बर में भी कई इलाकों में की जाती है.

सौंफ का बीज एवं बुवाई (Fennel seeds and sowing)

सौंफ की बुवाई बीजों को सीधा बोकर या पौधा रोपाई करके की जाती है. सीधी बुवाई के लिए एक हेक्टेयर में 9 से 12 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है. पौध लगाकर फसल उगाने के लिए 100 वर्ग मीटर क्षेत्रफल की नर्सरी में 3 से 4 किलोग्राम बीज से उत्पन्न पौध एक हेक्टेयर के लिए पर्याप्त होता है. 30 से 45 दिन की पौध रोपाई के लिए उपयुक्त पाई गई है. सितम्बर के आखिरी सप्ताह या अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में बोई पौध की रोपाई नवम्बर के द्वितीय सप्ताह तक सफलतापूर्वक की जा सकती है.

सीधी बुवाई के लिए खेत को तैयार करके पहले क्यारियां बना लेते है. क्यारियों में बीजों को छिटक कर या 40 से 60 सेमी० दूर कतारों में बुवाई की जाती है. छित्कावन विधि से बीजों को छिटकने के बाद लोहे की दंताली चलाकर 1.0 से 2.0 सेमी० गहराई तक मिट्टी से ढक देते है. बीज की गहरे 2.0 सेमी० से ज्यादा नही होनी चाहिए.

सौंफ के लिए खेत की तैयारी (Preparation of field for fennel)

सौंफ की अच्छी उपज के लिए खेत की 3 से 4 बार गहरी जुताई करके 15 से 20 सेमी० गहराई तक मिट्टी को भुरभुरी कर लेना चाहिए. अगर खेत में नमी की कमी हो तो खेत का पलेवा जरुर करे. जुताई के बाद पाटा जरुर लगाये. जिससे मिट्टी भुरभुरी और समतल हो जाए.

सौंफ के लिए खाद एवं उर्वरक (Manure and fertilizer for fennel)

सौंफ की अच्छी उपज के लिए जैविक एवं उर्वरक खाद खेत में डालना आवश्यक है. खेत की तैयारी करते समय 15 से 20 टन गोबर की सड़ी हुई खाद या कम्पोस्ट खाद खेत में डालना चाहिए. इसके अलावा 45 किलोग्राम नाइट्रोजन व 15 किलोग्राम फ़ॉस्फोरस प्रति हेक्टेयर उर्वरक के रूप में देना ज़रूरी है. नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फ़ॉस्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई से पहले खेत में डालना चाहिए. शेष बची हुई नाइट्रोजन की मात्रा को दो भागों में बांटकर एक भाग बुवाई के एक महीने बाद तथा दूसरा पुष्पन के समय सिंचाई के साथ फसल में डाले.

सौंफ की सिंचाई (Fennel irrigation)

सौंफ की अच्छी फसल के लिए अधिक सिंचाइयों की आवश्यकता होती है. भूमि की जल धारण क्षमता, फसक की अवस्था व मौसम के अनुसार हर 10 से 15 दिन पर सिंचाई करनी चाहिए. दाने बनना शुरू होने के बाद भूमि में पानी की कमी उपज पर भारी विपरीत प्रभाव डालती है. अतः इस समय सिंचाई का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए.

सौंफ की निराई-गुड़ाई (Weeding of fennel)

बुवाई के करीब 30 से 40 दिन बाद जब पौधे लगभग 50 सेमी० की ऊंचाई के हो जाए तो पहली निराई-गुड़ाई कर लेनी चाहिए. इस समय आवश्यकता से अधिक पौधों को भी निकल देना चाहिए. अगर बुवाई कतारों में की गयी है तो पौधे से पौधे की दूरी 20 सेमी० कर देनी चाहिए. इसके बाद आवश्यकता अनुसार खरपतवार दिखाई पड़ने पर निराई-गुड़ाई करनी चाहिए. निराई-गुड़ाई करते समय पौधे की जड़ों पर मिट्टी चढना लाभदायक होता है.

सौंफ की उपज एवं भंडारण (Fennel yield and storage)

उन्नत कृषि प्रक्रियाओं को अपनाकर की गयी सौंफ की खेती से लगभग 15 से 19 कुंटल प्रति हेक्टेयर तक पूर्ण विकसित, हरे दाने वाली व 5 से 7.5 कुंटल प्रति हेक्टेयर तक बारीक किस्म वाली सौंफ की उपज प्राप्त की जा सकती है.

पूर्णतया सुखाई हुई जिसमें नमी की मात्रा 8 से 9 प्रतिशत बची हो, सौंफ को साफ़ बोरियों में भरकर नमी रहित गोदामों में रखना चाहिए. ताकि उनके दानों का रंग एवं चमक बनी रहे.

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सौंफ के कीट एवं रोग प्रबन्धन (Fennel pest and disease management)

प्रमुख कीट एवं प्रबधन 

माहू – माहू या चैंपा का आक्रमण फसल पर फूल आना शुरू होने के बाद होता है.

रोकथाम – इस कीट की रोकथाम के लिए फास्फोमिडान या मोनोक्रोटोफास के 0.03 प्रतिशत या एंडोसल्फान के 0.05 प्रतिशत को 500 से 600 लीटर पानी प्रति हेक्टेयर में घोलकर 10 से 15 दिन के अंतर पर दो बार छिड़काव करा चाहिए.

प्रमुख रोग एवं प्रबन्धन 

आल्टरनरिया ब्लाईट – इस रोग का आक्रमण मुख्यतया पुष्पक्रमों पर होता है. शुवात में इसका प्रभाव पुष्प कलिकाओं पर पड़ता है जो पीली और भूरी होकर सूख जाती है. जल्दी ही बीमारी फैलकर पूरे पुष्पक्रमों को उसके वृंत तक के साथ सुखा देती है. जिससे उपज को भरी हानि पहुंचती है.

रोकथाम – इस रोग से बचाव के लिए डाइथेन एम-45 या डाइथेन जेड-78 को 400 से 500 लीटर पानी में घोलकर पार्टी हेक्टेयर का छिड़काव 10 से 15 दिन के अंतर पर दो बार करना चाहिए.

रामूलेरिया ब्लाईट – या रोग फसल की बुवाई के 60 से 80 दिन बाद नीचे की पत्तियां पर कोणीय धब्बों के रूप में उभरती है. यह धब्बे धीरे-धीरे विकसित होकर बड़े हो जाते है. तथा राख के रंग की फफून्दीय वृध्दि ढक जाते है.

रोकथाम – इस रोग की रोकथाम के लिए किसी ताम्रयुक्त फफूंदीनाशी जैसे ब्लाइटोक्स, फाइटोलान या ब्ल्यू कॉपर के 0.2 से 0.3 प्रतिशत घोल के छिड़काव से उपचार कर सकते है.

निष्कर्ष (The conclusion)

किसान भाईयों उम्मीद है, गाँव किसान (Gaon Kisan) के सौंफ की खेती (Fennel cultivation in hindi) से सम्बन्धित इस लेख से सभी जानकारियाँ मिल पायी होगी. गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा सौंफ के फायदे से लेकर सौंफ के कीट एवं रोग प्रबन्धन तक की सभी जानकारियां दी गयी है. फिर भी सौंफ की खेती (Fennel cultivation in hindi) से सम्बंधित आपका कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा गाँव किसान (Gaon Kisan) का यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताये. महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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