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Dragon Fruit Farming – ड्रेगन फ्रूट की खेती कैसे करे ? (हिंदी में)

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Dragon Fruit Farming
ड्रेगन फ्रूट की खेती (Dragon Fruit Farming) कैसे करे ?

ड्रेगन फ्रूट की खेती (Dragon Fruit Farming) कैसे करे ?

नमस्कार किसान भाईयों, ड्रेगन फ्रूट की खेती (Dragon Fruit Farming) विश्व कई देशों में की जाती है. इसकी लोकप्रियता को देखते हुए भारत में भी इसकी खेती धीरे-धीरे बढ़ रही है. बाजार में इसकी कीमत अच्छी होने के कारण किसान भाई इसकी खेती कर अच्छा मुनाफा कमा सकते है. इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख से ड्रेगन फ्रूट की खेती (Dragon Fruit Farming) की पूरी जानकारी हिंदी में देगा. जिससे किसान भाई इसकी अच्छी उपज प्राप्त कर सके. तो आइये जानते है ड्रेगन फ्रूट की खेती (Dragon Fruit Farming) की पूरी जानकारी-

ड्रेगन फ्रूट के फायदे 

ड्रेगन फ्रूट का उपयोग मुख्यतः फल के लिए किया जाता है. इसके अलावा इसे सौन्दर्य के लिए उपयोग किया जाता है. इसके फल के गूदे को खाने और सलाद के रूप में प्रयोग किया जाता है. इससे जेम, जैली, आईसक्रीम एवं वाइन आदि खाद्य एवं पेय पदार्थ बनाने में किया जाता है. इसके फूलों का उपयोग सूप, मिक्स सलाद, सब्जी एवं चाय बनाने में किया जाता है. इसका फल लाल एवं पीले रंग का होता है. इसमें लाल रंग के फल का गूदा लाल होता है तथा पीले व पीले रंग के फल का सफ़ेद होता है. सामान्यतयः लाल गूदे वाले फल को अधिक पसंद किया जाता है.

मानव जीवन के लिए ड्रेगन फ्रूट बहुत ही उपयोगी होता है. इसके सेवन से डाईबिटिज, कोलस्ट्रोल, आर्थराइटिस, मोटापा, अस्थमा एवं एजींग में फायदा मिलता है. इसमें वसा और प्रोटीन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. इसके अलावा विटामिन्स एवं मिनरल्स भी इसके फल में अत्यधिक मात्रा में पाए जाते है.

यह एक औषधीय फल है. इसमें एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. यह आंतो के कैंसर और मधुमेह को रोकता है. यह शरीर के विषैले तत्वों को निष्प्रभावी करता है. यह रक्त स्राव को रोकता है. एवं दातों की वृध्दि में सहायक होता है. इसमें विटामिन सी, फ़ॉस्फोरस व कैल्शियम भरपूर मात्रा में पाया जाता है. यह गठिया और अस्थमा में भी लाभदायक होता है.

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उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

ड्रेगन फ्रूट का वानस्पतिक नाम हाइलोकेरस अन्डेटस (Hylocereus undatus) है. जो कि केक्टस कुल का पौधा है. इसे नोबल वूमन, क्वीन ऑफ़ नाईट, पिथाया के नामों से भी जाना जाता है. इसकी उत्पत्ति मैक्सिको, मध्य एवं दक्षिणी अमेरिका के उष्ण व उपोष्णनीय वनीय प्रदेशों में मानी जाती है. यही से यह अमेरिका, एशिया, आस्ट्रेलिया व मध्य पूर्व में फैल गया. यह मध्य अमेरिका का मूल फल है.

वर्तमान समय में ड्रेगन फ्रूट की खेती विश्व के 22 देशों में की जा रही है. इसकी खेती थाईलैंड, वियतनाम, इजराइल एवं श्री लंका में की जा रही है. पिछले कुछ वर्षों में इसकी खेती भारत शुरू की गयी है. भारत में इसकी खेती महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश की जा रही है.

जलवायु एवं भूमि 

ड्रेगन फ्रूट की खेती के लिए वार्षिक वर्षा लगभग 500 मिमी० होनी आवश्यक है. पौधों की बढवार हेतु 20 से 30 डिग्री तापमान सर्वोत्तम होता है. अत्यधिक धूप इसके पौधों के लिए हानिकारक होती है. ऐसी स्थिति में पौधों के चारों ओर लम्बे पेड़ों की बाड़ का लगाया जाना उपयुक्त होता है.

इसकी खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है. लेकिन बलुई दोमट एवं चिकनी दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम होती है. भूमि जीवांश की उपयुक्त मात्रा होनी चाहिए. भूमि का पी० एच० मान लगभग 7 का होना चाहिए. भूमि से जल निकास का उचित प्रबन्ध होना चाहिए.

प्रमुख किस्में (Dragon Fruit Farming)

ड्रेगन फ्रूट की प्रमुख तीन प्रकार की किस्में होती है जो निम्नवत है-

  1. सफ़ेद पिथाया (White Dragon Fruit)
  2. लाल पिथाया (Red Dragon Fruit)
  3. पीला पिथाया (Yellow Dragon Fruit)

इनमे वालदीव रोजा, असुनता, कोनी मायर, डिलाईट, अमेरिकन ब्यूटी, पर्पल हेज़, ISIS गोल्डन यैलो, S8 शूगर, आउसी गोल्डन यैलो, वीयतनाम वाईट, रॉयल रैड, सिंपल रैड आदि प्रमुख किस्में है.

प्रसारण विधि 

ड्रेगन फ्रूट के पौधे बीज व कलम द्वारा तैयार किये जाते है. लेकिन व्यापारिक द्रष्टि से कलम द्वारा तैयार पौधे ही लगाना सर्वोत्तम होता है. इसके लिए 20 सेंटीमीटर लम्बी कलमे उपयुक्त होती है. इन कलमों को दो तीन दिन के लिए जमीन में दबाना चाहिए. इनको गोबर की खाद, उपरी मृदा व रेत के 1:1:2 के मिश्रण से भरे गमलों में लगाना चाहिए. इससे नर्सरी तैयार होने में तीन महीने का समय लग जाता है.

एक हेक्टेयर ड्रेगन फ्रूट लगाने के लिए 10 मीटर x 10 मीटर आकार की नर्सरी में लगभग 1100 कलमों की रोपाई पर्याप्त होती है. कटिंग में जड़ विकसित होने पर इन्हें खेत में रोपण किया जाना चाहिए.

पौध रोपड़ (Dragon Fruit Farming)

ड्रेगन फ्रूट की पौध रोपण के लिए वर्षा काल सबसे उपयुक्त समय होता है. इसलिए वर्षाकाल के पहले खेत की अच्छी तरह जुताई करके तैयार कर लिया जाता है. साथ खरपतवार भी नष्ट कर दिया जाता है. इसके बाद 2 x 2 फीट आकार का गड्ढा खोदकर उसमें कार्बनिक खाद व 100 ग्राम सुपर फ़ॉस्फेट मिलाकर गड्ढा भर देना चाहिए.

इसके बाद पौधों का रोपण किया जाता है. पौधों को नियमित रूप से सिंचाई की आवश्यकता होती है. इसकी सिंचाई के लिए ड्रिप सिस्टम लगाना उपयुक्त होता है.

पौधों का सपोर्ट सिस्टम 

ड्रेगन फ्रूट के पौधों को सपोर्ट की आवश्यकता होती है. इसके लिए सीमेंट कंक्रीट के 7.5 फीट लम्बे और 6 इंच के चौकोर आकार के खम्भे बना लेना चाहिए. इन पिलर को 3 x 3 मीटर की दूरी पर खेत में लगाना चाहिए. इसके बाद इन खम्भों के ऊपर 2 फुट व्यास की एक रिंग लगाईं जाती है. खम्भे लगाए जाने बाद प्रत्येक खम्भों के चारों तरफ एक-एक पौधे का रोपण किया जाता है. इस तरह एक हेक्टेयर में 1111 खम्भों का उपयोग किया जा सकता है. इन खम्भों के सहारे 4500 पौधे लगाए जा सकते है. पौधे रोपण के बाद इन पौधों को खम्भे से बाँध देना चाहिए. जिससे यह खम्भे के सहारे अच्छी प्रकार बढ़ सके.

सिंचाई प्रबन्धन (Dragon Fruit Farming)

ड्रेगन फ्रूट का पौधा उष्णीय जलवायु का है. इसलिए इसकी जड़े जमीन में 15 से 30 सेमी० गहराई तक होती है. वर्षा के मौसम में इसकी सिंचाई की आवश्यकता नही होती है. लेकिन अन्य मौसम में इसको नियमित सिंचाई की आवश्यकता होती है.

इसकी अच्छी पैदावार के लिये फूल आने से पूर्व सिंचाई नही करनी चाहिए. फूल व बनने के समय मृदा में पर्याप्त नमी होनी चाहिए. सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली इसकी अच्छी बढवार के लिए उपयुक्त होती है.

खाद एवं उर्वरक 

ड्रेगन फ्रूट के पौधे के लिए 10 से 15 किलोग्राम जैविक खाद प्रति वर्ष डालनी चाहिए. इसको प्रति वर्ष दो किलोग्राम की दर से बढ़ाते जाना चाहिए. ड्रेगन फ्रूट की अच्छी बढवार के लिए म्यूरेट ऑफ़ पोटाश, सुपर फ़ॉस्फेट व यूरिया क्रमशः 40:90:70 ग्राम मात्रा प्रति पौधा देना चाहिए. ड्रेगन फ्रूट के फूल आने वाली अवस्था से तुड़ाई तक 50 ग्राम यूरिया, 50 ग्राम सुपेर फ़ॉस्फेट व 100 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति पौधा तीन बार में यानी फूल आने से पूर्व (अप्रैल में), फल बढ़वार अवस्था (जुलाई-अगस्त) व फलों की तुड़ाई के बाद यानि दिसम्बर माह में प्रयोग करना चाहिए.

कटाई-छंटाई (Dragon Fruit Farming)

एक अच्छी बढ़वार वाले पौधे की 30 पार्श्विक शाखाओं से चतुर्थ वर्ष तक 130 पार्श्विक शाखाएं हो जानी चाहिए. मृत व आड़ी-तिरछी एवं कमजोर शाखाओं को हटा देना चाहिए.

फलदार अवस्था में 50 मुख्य शाखाओं जो कि एक या दो सेकेंडरी शाखाएं रहती है. तो उन्हें रखना चाहिए बाकि शाखों को हटा देना चाहिए.

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कीट एवं व्याधि प्रबन्धन 

ड्रेगन फ्रूट की खेती में रोग एवं कीटों का प्रकोप कम होता है. इसलिए इसकी खेती में ज्यादा कीट एवं रोगों का प्रबन्धन की आवश्यकता नही पड़ती है.

तुड़ाई (Dragon Fruit Farming)

ड्रेगन फ्रूट के पौधे एक वर्ष में फल देना शुरू कर देते है. यह पौधे मई जून के महीने में फूल उत्पादित करना शुरू कर देते है. एवं परागन के बाद अगस्त से दिसम्बर के महीने में फलों की तुड़ाई की जा सकती है. ड्रेगन फ्रूट में एक ऋतु में छः बार फलों की तुड़ाई करनी पड़ती है. फलों की तुड़ाई तब करे जब ड्रेगन फ्रूट के फलों का रंग चमकीले हरे रंग से लाल रंग में बदल जाए. इस अवस्था में फल पक जाता है.

उपज एवं भण्डारण  

ड्रेगन फ्रूट की फसल से 10 से 15 टन प्रति हेक्टेयर पैदावर मिलती है. ड्रेगन फ्रूट के एक फल का वजन लगभग 350 ग्राम से 850 ग्राम होता है.

ड्रेगन फ्रूट के भण्डारण के लिए छिद्रित हवादार बैग में 8 डिग्री सेल्सियस पर 25 से 30 दिन तक किया जा सकता है. इसके अलावा ड्रेगन फ्रूट को 7 से 10 डिग्री सेल्सियस तापमान एवं 85 से 90 प्रतिशत आपेक्षित आर्द्रता पर 45 दिन के लिए भंडारित किया जा सकता है.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है गाँव किसान (Gaon Kisan) के ड्रेगन फ्रूट की खेती (Dragon Fruit Farming) के इस लेख से सभी जानकारियां मिल पायी होगी. गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा ड्रेगन फ्रूट के फायदे से लेकर ड्रेगन फ्रूट की उपजा एवं भंडारण तक की सभी जानकारियां दी गयी है. फिर भी ड्रेगन फ्रूट की खेती (Dragon Fruit Farming) से सम्बन्धित कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा गाँव किसान (Gaon Kisan) का यह लेख आपको कैसा लगा कम्नेट कर जरुर बताएं. महान कृपा होगी.

आप सभी लोगो का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द. 

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