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Brinjal farming – बैगन की खेती कैसे करे ? (हिंदी में)

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Brinjal farming
बैगन की खेती (Brinjal farming) कैसे करे ?

बैगन की खेती (Brinjal farming) कैसे करे ?

नमस्कार किसान भाईयों, बैगन की खेती (Brinjal farming) वर्ष में तीन बार वर्षा, शरद और ग्रीष्म ऋतु में की जाती है. इसे भारत में बैगन या भाटा कहा जाता है. इसकी सब्जी सर्वाधिक लोकप्रिय है. किसान भाई बैगन की खेती (Brinjal farming) कर अच्छी मुनाफा कमा सकते है. इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख में बैगन की खेती (Brinjal farming) कैसे करे ? पूरी जानकारी देगा वह भी अपनी भाषा हिंदी में. जिससे किसान भाई इसकी अच्छी उपज व आमदनी पा सके. तो आइये जानते है बैगन की खेती (Brinjal farming) की पूरी जानकारी-

बैगन के फायदे 

बैगन की सब्जी बहुत ही पौष्टिक सब्जी होती है. पौष्टिकता के मामले में यह टमाटर के समकक्ष समझा जाता है. बैगन का प्रयोग दवा के रूप में भी किया जाता है. सफ़ेद बैगन मधुमेह पीड़ित व्यक्ति के लिए लाभप्रद है. तिल तेल में तला हुआ बैगन दांत के दर्द में लाभकारी होता है. बैगन की हरी पत्तियों में विटामिन सी पाया जाता है. एवं यकृत के रोगियों के लिए लाभकारी होता है. इसके बीज क्षुधावर्धक होते है. तथा पत्तियों यद्यपि नशीली होती है. पर मन्दाग्नि एवं कब्ज में फायदा पहुंचता है. बैगन में प्रोटीन, वसा, रेशा, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस, सोडियम, पोटेशियम तथा विटामिन ए,, विटामिन बी-1, विटामिन सी आदि तत्व पाए जाते है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

बैगन का वानस्पतिक नाम सोलनम मेलोनजेना (Solanum melongena) है. तथा यह सोलेनेसी (Solannceae) कुल का पौधा है. इसकी उत्पत्ति भारत में ही हुई है. लेकिन भारत सर्वाधिक बैगन उगाने वाले देशों में दूसरे स्थान पर है. पहले स्थान पर चीन है. देश में पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा आदि राज्यों में इसकी खेती मुख्य रूप से की जाती है.

जलवायु एवं भूमि 

बैगन की अच्छी उपज के लिए गर्म जलवायु उचित होती है. बैगन के बीजों के अंकुरण के लिए 25 डिग्री० सेंटीग्रेड तापमान सर्वोत्तम होता है. लेकिन पाले पड़ने वाली जगह पर इसकी वृध्दि पर विपरीत असर पड़ता है.

इसकी खेती सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है. परन्तु अच्छी उपज के लिए बलुई दोमट मिट्टी से भारी मिट्टी जिसमें कार्बनिक पदार्थ की पर्याप्त मात्रा हो उपयुक्त होती है. बहुमी का पी०एच० 5.5 से 6.0 के मध्य का होना चाहिए.

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उन्नत किस्में (Brinjal farming) 

बैगन की किस्में आकार के आधार पर दो प्रकार की होती है, जो निम्नवत है-

प्रकार  किस्में 
गोल आकार   पूसा हाइब्रिड-6, पूसा हाइब्रिड-9, पूसा बिन्दु, पूसा उत्तम, स्वर्ण मणि, काशी सन्देश, पन्त ऋतुराज
लम्बा आकार  राजेंद्र बैगन-2, राजेंद्र अन्नपूर्णा, पूसा हाइब्रिड-5, अर्का शिरीष, अर्का कुसुमाकर, अर्का नीलकंठ

पन्त ऋतुराज – इस किस्म के फल गोल बैगनी होते है. इसकी औसत पैदावार 70 कुटल प्रति बीघा तक ली जा सकती है.

अर्का शिरीष – इस किस्म के बैगन के फल आकार में काफी लम्बे, मुलायम, छोटे व हरे रंग के होते है. प्रत्येक पौधे पर 25 से 30 फल लगते है.

खेत की तैयारी (Brinjal farming)

बैगन की अच्छी उपज के लिए खेत को अच्छी तरह तैयार कर लेना चाहिए. इसके लिए दो से तीन बार डिस्क हैरो या कल्टीवेटर से खेत की जुताई कर अच्छी तरह से पाटा लगा देना चाहिए. जिससे मिट्टी भुरभुरी एवं समतल हो जाय. इस बात का ध्यान रखे भूमि से जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए.

बीज की मात्रा (Brinjal farming)

एक हेक्टेयर खेत में बैगन लगाने के लिए सामान्य किस्मों का 400 से 500 ग्राम बीज एवं संकर किस्मों के लिए 150 से 200 ग्राम बीज की आवश्यकता है.

बीज बुवाई एवं पौध रोपण का समय

फसल  बुवाई का समय  पौध रोपण का समय 
शरद कालीन फसल  मई-जून जून के अंत-जुलाई मध्य
बसंत-ग्रीष्म कालीन फसल  नवम्बर मध्य जनवरी अंत
वर्षा ऋतु फसल  फरवरी-मार्च मार्च-अप्रैल

पौध शाला में बीज बुवाई 

पौधशाला की तैयारी के लिए 5 मीटर लम्बी 1 मीटर चौड़ी तथा 15 सेंटी मीटर ऊँची क्यारियां बना लेनी चाहिए. एक हेक्टेयर क्षेत्र में रोपाई के लिए 25 से 30 क्यारियों की आवश्यकता होती है. इसके बाद 3 से 4 टोकरियाँ गोबर की सड़ी हुई खाद प्रत्येक क्यारी की मिट्टी में अच्छी तरह मिला देनी चाहिए. इसके अलावा 15:15:15 का नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाशयुक्त मिश्रण 500 ग्राम प्रत्येक क्यारी में बुवाई से एक दिन पूर्व मिला देना चाहिए. पौधों को सूत्र-कृमि एवं कीड़ों से बचाने के लिए 15-20 ग्राम फ्यूराडान दाना प्रति क्यारी की दर से अच्छी तरह मिला देना चाहिए. दूसरे दिन 5 सेमी० की दूरी पर एक सेमी० गहरी लाइन बनाये और बीज की बुवाई कर दे. बुवाई के बाद गोबर की खाद और मिट्टी के मिश्रण से बीज को ढक दे. क्यारियों की हल्की फुहारे से सिंचाई करनी चाहिए. 3 से 4 सप्ताह बाद पौधे (5 से 6 पत्तियां आने पर) रोपाई योग हो जाते है.

पौध रोपण (Brinjal farming)

पौध तैयार होने के बाद भारी आकार वाली किस्मों के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 70 सेमी० तथा पौधे से पौधे की दूरी 60 सेमी० रखी जाती है. छोटे आकार वाली किस्मों के लिए पंक्ति से पंक्ति एवं पौधे से पौधे की दूरी का फासला 60 x 60 या 60 x 45 सेमी० रख सकते है.

खाद एवं उर्वरक (Brinjal farming)

खेत की तैयारी करते समय 25 से 30 टन गोबर की सड़ी खाद मिट्टी में अच्छी तरह मिला देनी चाहिए. इसके अलावा 100 से 120 किग्रा० नाइट्रोजन, 60 किग्रा० स्फूर एवं 60 किग्रा० पोटाश खेत की तैयारी करते समय डालनी चाहिए. नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा और पोटाश एवं स्फूर की पूरी मात्रा खेत में आखिरी बार जुताई करते समय इस्तेमाल की जानी चाहिए. बाकी बची हुई शेष नाइट्रोजन की मात्रा को तीन बराबर खुराकों में देना चाहिए. यह पौधे के रोपाई के 30 दिन, 45 दिन और 60 दिन बाद देनी चाहिए.

सिंचाई (Brinjal farming)

बैगन में पहली सिंचाई रोपाई के तुरंत बाद करनी चाहिए. शरद कालीन फसल में आवश्यकतानुसार 7 से 12 दिन के अंतराल पर एवं ग्रीष्म कालीन फसल में 3 से 4 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए. नाइट्रोजन देने के बाद सिंचाई अवश्य करे.

खरपतवार नियंत्रण 

रोपाई के 40 से 50 दिन बाद तक फसल को निराई-गुड़ाई कर खरपतवार मुक्त रखे. खरपतवार का अधिक प्रकोप होने पर 1 किग्रा० प्रति हेक्टेयर पेंडीमेथेलीन का पौध रोपण के एक दिन पहले छिड़काव करे.

तुड़ाई एवं उपज 

जब फल मुलायम हो और उसमें ज्यादा बीज न बने हो तभी फल तोड़ लेना चाहिए. फल का फीकापन, कड़ा हो जाना तथा पीला रंग उसके पकने की तरफ इशारा करता है. इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि फल को इसके पहले ही तोड़ लिया जाना चाहिए. चाकू या कोई तेज यंत्र की सहायता से फल को डंठल के साथ काटा जाता है.

बैंगन की उपज भूमि की उर्वरा शक्ति, किस्म और उसकी देखभाल पर निर्भर करती है. आमतौर पर 250 से 300 कुंटल उपज मिल जाती है. संकर किस्मों से 600 कुंटल तक की उपज मिल जाती है.

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बैगन के कीट एवं रोग नियंत्रण 

प्रमुख रोग एवं नियंत्रण 

आर्द्र गलन रोग – यह पौधशाला में लगाने वाला प्रमुख रोग है. इस रोग में सतह, जमीन के पास तना गलने लगता है. तथा पौध मर जाती है.

रोकथाम – इस रोग की रोकथाम के लिए बुवाई से पहले बीज उपचार फफूंदनाशक दवा कैप्टान 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करना चाहिए.

फोमोप्सिस झुलसा – इस रोग के मुख्य लक्षण पत्ती, फल, तने पर दिखाई देते है. पट्टी पर गोल धब्बे, तने का सूखना व फल का सड़ना इसके लक्षण है.संक्रमित क्षेत्र में छोटे-छोटे काले बिंदु के समान उभरा लक्षण दिखाई देता है.

रोकथाम – इस रोग से बचाव के लिए रोग रहित किस्मों का चुनाव करना चाहिए. इसके अलावा बीजों को बाविस्टीन 2 ग्राम प्रति किग्रा० बीज की दर से उपचारित करना चाहिए. खेत में फल आने के समय से ही मेन्कोजेब 0.25 प्रतिशत या कार्बेन्डाजिम 0.1 प्रतिशत डाले. छिड़काव 8 से 10 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए.

प्रमुख कीट एवं रोकथाम 

तना एवं फल छेदक कीट – इस कीट की इल्ली शुरू में अंडे निकलने के बाद फल व कोमल पत्ती खाती है. कीटग्रस्त तना मुरझाकर लटक जाते है. और बाद में सूख जाते है.

रोकथाम – नर्सरी की क्यारी में फ्यूराडान 5-6 ग्राम प्रति वर्ग मीटर की दर से डाले. इसके अलावा मार्सल (कार्बोसल्फान 20 ई०सी०) 2 मिली० प्रति लीटर पानी में घोलकर 15 दिन के अंतर पर डालनी चाहिये.

जैसिड कीट – ये कीट पत्ती का रस चूसते है. जिससे पत्तियां ऊपर की तरफ मुड़ जाती है.

रोकथाम – इस कीट के बचाव के लिए मैलाथियान के 50 ई०सी० का 2 मिली० प्रति लीटर का छिड़काव करे.

निष्कर्ष 

किसान भाई उम्मीद है, गाँव किसान (Gaon Kisan) के बैगन की खेती (Brinjal farming) सम्बंधित इस लेख से सभी जानकारियां मिल पायी होगी. गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा बैगन के फायदे से लेकर बैगन के कीट एवं रोग प्रबंधन तक की सभी जानकारियां दी गयी है. फिर भी बैगन की खेती (Brinjal farming) से सम्बंधित आपका कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा गाँव किसान (Gaon Kisan) का यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताये. महान कृपा होगी.

आप सभी लोगो का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द. 

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