Barley Farming – जौ की खेती की पूरी जानकारी अपनी भाषा हिंदी में

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Barley farming
जौ की खेती (Barley farming) की पूरी जानकारी

जौ की खेती (Barley farming) की पूरी जानकारी

 नमस्कार किसान भाईयों, जौ की खेती (Barley farming) पृथ्वी पर सबसे प्राचीन काल से की जा रही है. यह रबी के मौसम में उगाई जाने वाली महत्वपूर्ण फसल है. किसान भाई इसकी खेती कर अच्छा लाभ कमा सकते है. इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने लेख में जौ की खेती (Barley farming) की पूरी जानकारी देगा वह देश की भाषा हिंदी में. जिससे किसान भाई इसकी अधिक उपज ले सके. आइये जानते है जौ की खेती (Barley farming) की पूरी जानकारी-

जौ के फायदे 

जौ का उपयोग प्राचीन काल से धार्मिक संस्कारों में होता आया है. यह एक औषधीय फसल है. इसका उपयोग दाने, पशु आहार, चारा और अनेक औद्योगिग उपयोग जैसे शराब, बेकरी, पेपर, फाइबर बोर्ड आदि के लिए किया जाता है. इसके दाने में 10.6 प्रतिशत प्रोटीन, 64 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट तथा 2.1 प्रतिशत वसा होता है. जौ के 100 ग्राम दानों में 50 मिलीग्राम कैल्सियम, 6 मिलीग्राम आयरन, 31 मिलीग्राम विटामिन बी 1, 0.10 मिलीग्राम बी 2 व नियासीन पाया जाता है. इसके सेवन से सूजन, कंठमाला, मधुमेह, जलन, मूत्रावरोध, गले की सूजन, ज्वर, मष्तिष्क का प्रहार, पथरी, अतिसार, मोटापा आदि रोगों में काफी फायदा होता है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

जौ की दो मुख्य जातियां है. पहली होरडियम डिस्टिन (Hordeum distiehon) जिसकी उत्पत्ति मध्य अफ्रीका और दूसरी होरडियम वलगेयर (Hordeum vulgare) जिसकी उत्पत्ति यूरोप में हुई. इसमें से दूसरी वाली ज्यादा प्रसिध्द है.  जौ की खेती मुख्य रूप से रूस, यूक्रेन, अमेरिका, जर्मनी, कनाडा और भारत में की जाती है. भारत में इसकी खेती उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, गुजरात एवं जम्मू कश्मीर आदि राज्यों में की जाती है.

जलवायु एवं भूमि 

जौ की खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु होनी चाहिए. यह समुद्रतल से 14,000 फुट की उचाई पर भी उगाया जा सकता है. इसका पौधा गेहूं के पौधा के मुकाबले अधिक सहनशील होता है.

जौ की खेती विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में जैसे बलुई दोमट, बलुई आदि में की जा सकती है. लेकिन इसकी अच्छी उपज के लिए दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है. क्षारीय या लवणीय भूमियों में सहनशील किस्मों को उगाना चाहिए. इस बात कध्याँ जरुर रखे कि भूमि में उचित जल निकास की व्यवस्था होनी चाहिए.

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खेत की तैयारी (Barley Farming)

जौ के अच्छे उत्पादन के लिए खेत की तैयारी अच्छी प्रकार करनी चाहिए. खेत को देशी हल या रोटावेटर से 2 से 3 बार जुताई करके खेत की मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए. हर जाती के बाद पाटा जरुर लगाये जिससे भूमि समतल तथा ढेला रहित हो जाय.

बोने का समय 

असिंचित क्षेत्र – असिंचित क्षेत्रों में 20 अक्टूबर से 10 नवम्बर तक कर लेनी चाहिये.

सिंचित क्षेत्र – सिंचित क्षेत्रों में 25 नवम्बर तक बुवाई कर लेना चाहिए.

विलम्ब से – अगर आप विलम्ब से बुवाई कर रहे है तो दिसम्बर के दूसरे पखवारे तक बुवाई कर दे.

उन्नत किस्में (Barley Farming)

छिलाकयुक्त छः धारीय प्रजातियाँ 

इन किस्मों में मैदानी क्षेत्रों की बुवाई के लिए ज्योति (क० 572/10), आजाद (के०-125), के०-144, प्रीती (के०-409), नरेन्द्र जौ-192, नरेन्द्र जौ-3, नरेन्द्र जौ-2, एन० डी० बी०-1173, बी० एच०-946, महामना-113 आदि प्रमुख किस्में है.

छिलका रहित प्रजातियाँ 

इन किस्मों में मैदानी क्षेत्रों की बुवाई के लिए गीतांजलि (के-1149), नरेन्द्र जौ-5 (उपासना), डी० डब्ल्यू० आर० यू० बी० -64, डी० डब्ल्यू० आर० बी०-73 आदि प्रमुख किस्में है

माल्ट हेतु प्रजातियाँ 

इन किस्मों में प्रगति के 508-छः धारीय, ऋतम्भरा के० 551-छः धारीय, डी० डब्ल्यू० आर०-28-दो धारीय, रेखा (बी० सी० यू० 73)-दो धारीय आदि प्रमुख किस्में है.

ऊसरीली भूमि के लिए 

इन किस्मों में नरेन्द्र जौ 1445 (एन० बी० डी०-1445) प्रमुख किस्म है.

बीज की मात्रा (Barley Farming)

असिंचित – जौ की अन्सिंचित क्षेत्र की बुवाई के लिए 100 किग्रा० प्रति हेक्टेयर बीज की जरुरत होती है.

सिंचित – जौ की सिंचित क्षेत्र की बुवाई के लिए 100 किग्रा० प्रति हेक्टेयर बीज की जरुरत होती है.

पछेती – जौ की पछेती बुवाई के लिए 125 किग्रा० प्रति हेक्टेयर बीज की जरुरत होती है.

बुवाई विधि (Barley Farming)

जौ की बुवाई के लिए पंक्ति विधि अपनानी चाहिए. जिसमें कूडों में हल के पीछे 23 सेमी० की दूरी पर 5 से 6 सेमी० गहराई पर बोना चाहिए. असिंचित क्षेत्र में बुवाई 5 से 8 सेमी० गहराई में करनी चाहिये, जिससे बीज को पर्याप्त मात्रा में नमी मिल सके.

उर्वरक (Barley Farming)

खेत में उर्वरक का उपयोग मृदा परिक्षण के आधार पर करना चाहिए.

असिंचित क्षेत्रों में 

असिंचित क्षेत्रों में 40 किलोग्राम नत्रजन, 20 किलोग्राम फास्फेट तथा 20 किलोग्राम पोटाश को बुवाई के समय कूडों में बीज के नीचे डालना चाहिए.

सिंचित क्षेत्रो में 

सिंचित क्षेत्रो में 30 किलोग्राम नत्रजन, 30 किलोग्राम फास्फेट व 20 किग्रा० पोटाश प्रति हेक्टेयर बुवाई के समय खेत में बीज के साथ डालना चाहिए तथा बाद में 30 किलोग्राम नत्रजन पहली सिंचाई पर टापड्रेसिंग करनी चहिये. हल्की भूमि में 20 से 30 किग्रा० प्रति हेक्टेयर की दर से गंधक का प्रयोग करना चाहिए. अच्छी उपज के लिए 40 कुंटल प्रति हेक्टेयर की दर से सड़ी हुई खाद का प्रयोग करना चाहिए.मालत प्रजातियों के लिए 25 प्रतिशत अतरिक्त नत्रजन की जरुरत होती है.

ऊसर तथा विलम्ब बुवाई 

ऊसर तथा विलम्ब बुवाई के लिए 30 किलोग्राम नत्रजन, 20 किग्रा० फास्फेट बुवाई के समय खेत में डालनी चाहिए. इसके अलावा बाद में 30 किलोग्राम नत्रजन टापड्रेसिंग के रूप में पहली सिंचाई के बाद प्रयोग करना चाहिए. ऊसर भूमि के लिए 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर जिंक सल्फेट का प्रयोग करना चाहिए.

सिंचाई (Barley Farming)

जौ की खेती को दो सिंचाईयों की जरुरत होती है. पहली कल्ले फूटते समय बुवाई के 30 से 35 दिन बाद करनी चाहिए. दूसरी सिंचाई दुग्धावस्था में करनी चाहिए. यदि सिंचाई व्यवस्था उपलब्ध हो तो कल्ले फूटते समय करनी चाहिए. माल्ट प्रजातियों हेतु जौ की खेती में एक अतरिक्त सिचाई की जरुरत होती है. ऊसर भूमि में तीन सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है पहले कल्ले निकालते समय, दूसरी गाँठ बनते समय तथा तीसरी दाना पड़ते समय करनी चाहिए.

फसल सुरक्षा (Barley Farming)

प्रमुख कीट 

दीमक – यह एक सामजिक कीट है एवं कालोनिया बनाकर रहता है. एक कालोनी में 90 प्रतिशत श्रमिक, 2 से 3 प्रतिशत सैनिक, एक रानी व एक राजा होते है. श्रमिक पीलापन लिए हुए सफ़ेद रंग के पंखहीन होते है. जो फसलों को हानि पहुंचाते है.

गुजिया वीविल – यह कीट भूरे मटमैले रंग का होता है. जो सूखी जमीन में धेले एवं दरारों के बीच रहते है. यह कीट नए उग रहे पौधों को काट कर हनी पहुंचता है.

माहूँ – यह कीट हरे रंग के शिशु एवं प्रोढ़ माहूँ पत्तियों एवं हरी बालियों से रस चूसकर हनी पहुंचाते है. माहूँ कीट मधुस्राव करते है. जिस पर काली फफूंद उग आती है. जिससे परकाश संश्लेक्षण में बांधा उत्पन्न होती है.

रोकथाम कैसे करे 

  • जौ की बुवाई से पहले दीमक के नियंत्रण हेतु क्लोरपाईरीफ़ॉस 20 प्रतिशत ई० सी० की 3 मिली० अथवा थायोमेथाक्साम 30 प्रतिशत ऍफ़० एस० 3 मिली० प्रति लीटर किग्रा० बीज की दर से बीज को शोधित करना चाहिए.
  • ब्यूवेरिया बैसियाना 1.15 बायोपेस्टीसाइड (जैव कीटनाशी) की 2.5 किग्रा० प्रति हेक्टेयर 60 से 75 किग्रा० गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छीटा देकर 8 से 10 दिन छाया में रखकर बुवाई से पूर्व आखिरी जुताई के समय भूमि में मिलाने से दीमक सहित भूमि जनित कीटों का नियंत्रण हो जाता है.
  • कड़ी फसल में दीमक या गुजिया के नियंत्रण हेतु क्लोरिपाईरीफ़ॉस 20 प्रतिशत ई० सी० 2.5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचाई के पानी के साथ प्रयोग करना चाहिए.
  • माहूँ कीट के नियंत्रण के लिए डाईमेथोएट 30 प्रतिशत ई० सी० अथवा आक्सीडेमेटान-मिथाइल 25 प्रतिशत ई० सी० के 1.0 लीटर प्रति हेक्टेयर अथवा थायोमेथाक्सान 25 प्रतिशत डब्ल्यू० जी० 500 ग्राम लगभग 750 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए.

 प्रमुख रोग 

आवृत कंडुआ – जौ के इस रोग में बालियो के दानों के स्थान पर काला चूर्ण बन जाता है. जो मजबूत झिल्ली द्वारा ढका होता है. मड़ाई के समय फूटकर स्वस्थ बीजों से चिपक जाता है.

पत्ती का धारीदार रोग – इस रोग में पत्ती की नसों में पीली धारियां बन जाती है. जो बाद में गहरे भूरे रंग में बदल जाती है. जिस पर फफूंदी के असंख्य बीजाणु बन जाते है.

पत्ती का धब्बेदार रोग – इस रोग में पत्तियों पर अंडाकार भूरे रंग के धब्बे बनते है. जो बाद में पूरी पत्तियों पर फैल जाते है.

अनावृत कंडुआ – इस रोग में बालियों के स्थान पर काला चूर्ण बन जाता है. जो सफ़ेद झिल्ली द्वारा ढका रहता है. बाद में झिल्ली फट जाती है, और फफूंदी के असंख्य बीजाणु हवा में फैल जाते है. जो स्वस्थ्य बालियों में फूल आते समय उनका संक्रमण करते है.

गेरुई रोग – गेरुई काली, भूरे एवं पीले रंग की होती है. गेरुई की फफूंद के फफोले पत्तियों पर पड़ जाते है. जो बाद में बिखर कर अन्य पत्तियों को प्रभावित करते है. काली गेरुई तना तथा पत्तियां दोनों को प्रभावित करती है.

रोकथाम कैसे करे  

बीज उपचार – अनावृत कंडुवा, आवृत कंडुवा, पत्ती का धारी दार रोग एवं पत्ती के धब्बे दार रोगों के नियंत्रण के लिए कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत डब्ल्यू० पी० 2 ग्राम अथवा कार्बाक्सिन 75 प्रतिशत डब्ल्यू० पी० की 2 ग्राम प्रति किग्रा० बीज की दर से बीज शोधन कर बुवाई करना चाहिए.

भूमि उपचार – भूमि जनित एवं बीज जनित रोगों के नियंत्रण के लिए बायोपस्टीसाइड (जैव कवकनाशी) ट्राईकोडरमा विरिडी 1 प्रतिशत डब्ल्यू० पी० अथवा ट्राइकोडरमा हारजिएनम 2 प्रतिशत डब्ल्यू० पी० 2.5 किग्रा० प्रति हेक्टेयर 60 से 70 किग्रा० गोबर की सड़ी हुई खाद में मिलकर हल्के पानी का छींटा देकर 8 से 10 दिन छाया में रखने के उपरान्त बुवाई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देने से इन रोगों क्र प्रबन्धन में सहयक होता है.

पर्णीय उपचार – गेरुई एवं पत्ती धब्बा रोग एवं पत्ती धार रोग के नियंत्रण हेतु जिरम 80 प्रतिशत डब्ल्यू० पी० की 2.0 किग्रा० अथवा मेन्कोजेब 75 डब्ल्यू० पी० को 2.0 किग्रा० अथवा जिनेब 75 प्रतिशत डब्ल्यू० पी० की 2.0 किग्रा० प्रति हेक्टेयर लगभग 750 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए.

गेरुई के नियंत्रण के लिए प्रोपीकोनोजोल 25 प्रतिशत ई० सी० की 500 मिली० प्रति हेक्टेयर पानी लगभग 750 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण 

यदि जौ की फसल में सकरी या चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार अधिक है तो सल्फोसल्फ्यूरान 75 प्रतिशत डब्ल्यू० पी० की 1.25 किग्रा० प्रति हेक्टेयर की मात्रा 500 से 600 लीटर में घोलकर बुवाई के 20 से 25 दिन बाद फ्लैटफैन नाजिल से छिड़काव  करना चाहिए.

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कटाई एवं भण्डारण 

कटाई का कार्य सुबह या शाम के समय में करना चाहिए. बालियों के पक जाने पर फसल को तुरंत काट लेना चाहिए. मड़ाई कर नमी रहित स्थान पर भंडारण करना चाहिए.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है गाँव किसान (Gaon Kisan) के जौ की खेती (Barley farming) से सम्बंधित इस लेख से आपको सभी जानकारियां मिल पायी होगी. गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा जौ के फायदे से लेकर जौ की कटाई एवं भंडारण तक की सभी जानकारियां दी गयी है फिर भी जौ की खेती (Barley farming) से सम्बंधित आपका कोई प्रश्न हो तो कम्नेट बॉक्स में कम्नेट कर जरुर बताएं. इसके अलावा यह लेख आपको कैसा लगा कम्नेट कर जरुर बताएं. महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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