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सुवा की खेती की पूरी जानकारी – Dill Farming (हिंदी में)

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सुवा की खेती
सुवा की खेती ( Dill Farming) की पूरी जानकारी

सुवा की खेती ( Dill Farming) की पूरी जानकारी

नमस्कार किसान भाईयों, सुवा की खेती (Dill Farming) देश में रबी की फसल के मौसम में की जाती है. यह एक वर्षीय फसल के रूप में उगाया जाता है. इसकी पौधों को सब्जी एवं दानों को मसाले के रूप में उपयोग किया जाता है. किसान भाई इसकी खेती कर अच्छा मुनाफा कमा सकते है. इसलिए गाँव किसान (Gaon kisan) आज अपने इस लेख में सुवा की खेती (Dill Farming) की पूरी जानकारी देगा वह भी अपनी भाषा हिंदी में. जिससे किसान भाई अच्छी उपज प्राप्त कर सके. तो आइये जानते है सुवा की खेती (Dill Farming) की पूरी जानकारी-

सुवा के फायदे (Benefits of Dill)

सुवा के साबुत तथा पिसे हुए दाने का सूप, सलाद, सॉस व अचार में डाले जाते है. दानों के अलावा पौधे के कच्चे मुलायम तने, पत्तियां तथा पुष्पक्रम भी सूप में डाले जाते है. तथा इनका अचार भी बनाया जाता है. मुलायम ताने तथा पत्तियां सलाद एवं शाक के रूप में उपयोग की जाती है. सुवा के दानों को शाहजीरा की जगह एक विकल्प के रूप में भी काम में लिया जाता है.

सुवा में दानों में 3.0 से 4.0 प्रतिशत वाष्पशील तेल पाया जाता है.सुवा के वाष्पशील तेल का कई दवाओं में उपयोग होता है. यह बच्चों के पेट रोगों जैसे आफरा, पेट-दर्द व हिचकी आदि में उपयोग किया जाता है. भारतीय सुवा के दानों की रासायनिक संरचना से सम्बन्धित आंकड़े उपलब्ध नही है. यूरोपीय सुवा के दानों में नमी 6.6 प्रतिशत, प्रोटीन 12.1 प्रतिशत, वसा 17.8 प्रतिशत, रेशे 20.7 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 35.7 प्रतिशत व खनिज पदार्थ 6.0 प्रतिशत पाई जाती है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

सुवा का वानस्पतिक नाम एंथम ग्रवेव्लेंस (Anethum graveolens) है. इसका उत्पत्ति स्थान दक्षिण यूरोपीय क्षेत्र माना जाता है. विश्व में इसकी खेती इंगलैंड, फ़िनलैंड, जर्मनी, रूमानिया तथा भूमध्य सागरीय क्षेत्रों में की जाती है. भारत में उगाई जाने वाली जाति यूरोपीय सुवा की ही एक वानस्पतिक किस्म मानी गई है. सुवा की खेती भारत के हर राज्य में की जाती है. परन्तु गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, व आंध्र प्रदेश में इसकी अधिक खेती की जाती है.

जलवायु एवं भूमि 

सुवा शरद ऋतु में बोई जाने वाली फसल है. इसकी अच्छी बधवार व पैदावार के लिए ठंडी व शुष्क जलवायु उपयुक्त रहती है. पाले का इस पर बुरा प्रभाव पड़ता है. जलवायु में अधिक नमी होने पर बीमारियों व कीटों के प्रकोप का डर रहता है.

यद्यपि सुवा की खेती बलुई मिट्टी को छोड़कर करीब-करीब सभी प्रकार की भूमि पर की जा सकती है. लेकिन अच्छी पैदावार के लिए हल्की मध्यम प्रकार की काली दोमट व बलुई दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकास पर्याप्त सुविधा हो, उपयुक्त रहती है.

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उन्नत किस्में 

सुवा की अभी तक कोई भी उन्नत किस्म विकसित नही की गयी है. अतः स्थानीय किस्म ही बोने के काम में ली जाती है. किन्तु सामान्यता गुजरात के लिए मेहसाना व रूबी लोकल तथा राजस्थान के लिए प्रतापगढ़ लोकल इसकी खेती के लिए उपयुक्त है.

बीज एवं बुवाई 

बीज बुवाई के लिए 6 से 8 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है. असिंचित खेती में सुवा की बुवाई वर्षा ऋतु समाप्त होते ही अर्थात सितम्बर के दूसरे पखवाड़े में करनी चाहिए. सिंचित फसल की बुवाई का उपयुक्त समय अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक का है. इसके बीज की बुवाई छिटक कर या पंक्तियों में दोनों तरह की जाती है. लाइनों में बुवाई करने से अंतर्सस्य क्रयाओं में सुविधा रहती है. छिड़काव विधि में बीज की निर्धारित मात्रा एक समान छिड़कर हलकी दंताली चलाकर या हाथ से मिट्टी में मिला देते है. कतारों में बुवाई करने पर बीजों को 30 सेमी की दूरी पर बोना चाहिए. असिंचित फसल के लिए बुवाई 2 से 3 सेमी० की गहराई पर हल के पीछे की जाती है. किन्तु सिंचित फसल की बुवाई के लिए बीज की गराई एक या डेढ़ सेमी० से ज्यादा नही होनी चाहिए.

खेत की तैयारी 

खरीफ की फसलों की कटाई के तुरंत बाद खेत में गहरा हल चलाकर जुताई कर लेनी चाहिए. इसके बाद एक-दो बार हैरो चलाकर खेत को अच्छी प्रकार तैयार कर लेना चाहिए.हर जुताई के बाद पाटा जरुर लगाये ताकि खेत ढेले टूट जाए और मिट्टी भुरभुरी हो जाय.

खाद एवं उर्वरक 

सुवा की अच्छी फसल के लिए 10 से 15 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर खेत में पहली जुताई के समय डालनी चाहिए. बुवाई के समय 20 किलोग्राम नाइट्रोजन तथा 30 किलोग्राम फ़ॉस्फोरस प्रति हेक्टेयर डालनी चाहिए. इसके बाद सिंचित फसल में 20 किलोग्राम नाइट्रोजन बुवाई के 30 से 45 दिन बाद छिड़क कर सिंचाई के साथ दें, अर्थात इसकी अच्छी फसल के लिए उपरोक्त गोबर की खाद के अतरिक्त कुल 40 किलोग्राम नाइट्रोजन एवं 30 किलोग्राम फ़ॉस्फोरस की आवश्यकता होती है. गोबर की खाद न होने पर नाइट्रोजन की मात्रा 40 किलोग्राम की बजे 90 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर देनी चाहिए.

सिंचाई 

सुवा एक लम्बे समय में पकने वाली फसल है. इसलिए इसे अधिक सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है. सिंचित फसल में बुवाई के तुरंत बाद सिंचाई करे. इस सिंचाई के समय बहाव तेज न हो अन्यथा बीज बहकर एक तरफ क्यारियों के किनारों पर इक्कट्ठे हो जायेगें. दूसरी सिंचाई बुवाई के 7 से 10 दिन बाद करे. इसके बाद यदि खेत में पपड़ी जम जाय तो 4 से 5 दिन बाद एक हल्की सिंचाई कर दे. ताकि बीजों का अंकुरण अच्छी प्रकार हो सके. इसके बाद स्थानीय तापमान व भूमि की किस्म के अनुसार 20 से 30 के अंतराल से सिंचाई करे. इस प्रकार इस फसल को 8 से 10 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है.

निराई-गुड़ाई 

शुरू में सुवा की बधवार कुछ धीमी होती है. सिंचित फसल में शुरू में कम अंतराल से सिंचाई करने के कारण खरपतवार अधिक निकलते है. तथा उनकी वृध्दि भी अधिक होती है. अथ यदि समय पर खरपतवार न निकाले तो फसल खरपतवार से दब जाती है. इसलिए बुवाई के 20 से 25 दिन बाद हल्की खुरपी चलाकर निकाल दे. इस समय पौधे बहुत छोटे होते है. अतः खुरपी चलाते समय सावधानी रखानी चाहिए. पहली निराई-गुड़ाई के एक माह बाद दूसरी निराई-गुड़ाई करनी चाहिए. इस पौधेसमी पौधों की छंटनी कर पौधे-पौधे की दूरी 20 से 30 सेमी० कर दे. आवश्यकता पड़ने पर एक-दो निराई-गुड़ाई और करे. जिससे खरपतवार तो नष्ट होंगे ही साथ ही पौधों की जड़ों में वायु संचार भी बढेगा.

असिंचित फसल में बुवाई के 40 से 45 दिन बाद निराई-गुड़ाई करे. इससे खरपतवार नष्ट हो जाते है. व भूमि पर एक अवरोधक पार्ट बन जाती है. जिसके फलस्वरूप भूमि से पानी का ह्रास नही होगा तथा जड़ों में वायु संचार भी बढेगा. यदि आवश्यकता पड़े और वर्षा हो जाय तो दूसरी निराई-गुड़ाई अवश्य करे, किन्तु फूल आने के बाद फसल में निराई-गुड़ाई करे.

फसल सुरक्षा 

प्रमुख रोग एवं रोकथाम 

छाछया रोग – इस रोग की रोकथाम के लिए फसल पर 15 से 25 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव कर दे. या केराथेन एल० सी० के 0.1 प्रतिशत घोल का 500 से 700 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करे. आवश्यकता पड़ने पर 10 से 15 दिन के बाद छिड़काव करे.

प्रमुख कीट व रोकथाम 

दीमक – सिंचित फसल में दीमक की रोकथाम के लिए पानी के साथ ओल्ड्रिन दवा 1.25 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से दी जा सकती है. अन्सिंचित फसल को दीमक से बचाने के लिए खेत में आखिरी जुताई से पहले 20 किलोग्राम बी० एस० सी० पाउडर डाल दे.

चैम्पा – इस कीट का आक्रमण फसल में पुष्प आने के बाद शुरू होता है. चैम्पा रोग की रोकथाम के लिए फसल पर फ़ॉस्फोमिडान (85 ई० सी०) 250 मिली० या मिथाइल डिमेटान (25 ई० सी०) एक लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 400 से 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करे. आवश्यकता पड़ने पर छिड़काव को 10 से 15 दिन बाद दोहरायें.

कटाई एवं औसाई

सुवा करीब 150 से 160 दिन में पक कर तैयार हो जाता है. मुख्य छात्रकों के दानों का रंग जैसे ही भूरा होने लग जाता है. फसल को काट लेना चाहिए. कटाई में देरी करने पर दानों के छिटकने का डर रहता है. फसल को हंसिया से काटकर खलिहान में सुखा दे. खलिहान में 7 से 10 दिन तक सुखाने के बाद पौधों को डंडे से पीटकर बीजों को अलग कर लेते है. फिर उनको हवा के सामने बरसा कर या फाटक कर साप कर लेते है. साफ़ बीजों को बोरियों में भर लेते है.

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उपज एवं भण्डारण 

बताई गयी कृषि तकनीकि अपनाने से इसकी उपज लगभग 10 से 12 कुंटल प्रति हेक्टेयर मिल जाती है.

सुवा के बीजों का नमी रहित गोदामों में भंडारण करना चाहिए. नमी से बीज खराब हो जाते है.

निष्कर्ष 

किसान भाई उम्मीद है, गाँव किसान (Gaon kisan) के सुवा की खेती (Dill Farming) से सम्बंधित इस लेख से सभी जानकारी मिल पायी होगी. गाँव किसान (Gaon kisan) द्वारा सुवा के फायदे से लेकर सुवा की उपज तक की सभी जानकारी मिल पायी होगी. फिर भी सुवा की खेती (Dill Farming) से सम्बंधित कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताये. महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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