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सर्पगन्धा की खेती कैसे करे ? – Indian snakeroot

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सर्पगन्धा की खेती
सर्पगन्धा की खेती कैसे करे ? - Indian snakeroot

सर्पगन्धा की खेती कैसे करे ? – Indian snakeroot

नमस्कार किसान भाईयों, भारत के विभिन्न भागों में सर्पगन्धा प्राकृतिक रूप से पाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि यह सर्पों को पीड़ित अथवा जहर भगाने की औषधि है.इसलिए इसका नाम सर्पगन्धा पड़ा. इसके औषधीय उपयोग के कारण बाजार में इसकी मांग लगातार रहती है. जिससे इसकी उपज का अच्छा लाभ मिलता है. इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख में सर्पगन्धा की खेती कैसे करे की पूरी जानकारी देगा. जिससे किसान इसकी भाई इसकी अच्छी उपज प्राप्त कर सके. तो आइये जानते है सर्पगन्धा की खेती की पूरी जानकारी-

सर्पगन्धा के फायदे

पारम्परिक औषधियों में सर्पगन्धा एक प्रमुख औषधि है. इसका उपयोग भारत में प्राचीन काल से होता रहा है. सर्पगन्धा में रिसरपिन,सर्पेन्टाइन, सर्पेन्टाअनाइस, रावोल्फिनाइन, रेसिनेमाइन, इताय्दी करीब 30 एलकलाइड, स्टार्च, रेजिन तथा पोटेशियम, लोहा, मैगनीज आदि तत्व पाए जाते है. उच्चरक्त चाप, अनिद्रा तथा पागलपन (उन्माद) के उपचार हेतु इस औषधि का प्रयोग किया जाता है. इस औषधि की मांग 20 प्रमुख भारतीय औषधियों में है.

क्षेत्र एवं विस्तार 

सर्पगन्धा का वानस्पतिक नाम रौवोल्फिया सर्पन्टाइना (Rauvolfia serpentina) है. यह एपोसाइनेसी (Apocynaceae) है. इसको अंग्रेजी में सर्पेन्टाइना रूट (Serpentine root) है. विश्व में इसकी कई प्रजातियाँ पायी जाती है. देश में समतल एवं पर्वतीय प्रदेशों में इसकी खेती होती है. पश्चिम बंगाल एवं बांग्लादेश में सभी जगह स्वाभाविक रूप से इसके पौधे उगते है. पूरे देश में लगभग 1200 मीटर की उंचाई तक इसकी खेती की जा सकती है.

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भूमि एवं जलवायु 

इसकी खेती 10 डिग्री से 45 डिग्री सेल्सियस तक सफलतापूर्वक की जा सकती है. छाया वाले स्थानों में भी इसकी खेती कर सकते है. कम वर्षा तथा 2 से 3 दिन जल भराव की स्थिति में भी पनपता रहता है.

सर्पगन्धा की खेती बलुई दोमट से चिकनी मिट्टी तक में आसानी से होती है. चूंकि इसकी जड़े गहराई में जाती है. इसलिए ऐसी भूमि जिसमें जड़ों का विकास हो, चुनी जानी चाहिए. जीवांशयुक्त काली मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है.

सर्पगन्धा की प्रजातियाँ 

इसकी आर० एस०-1 प्रजाति काफी अच्छी है. जिसमें इसके प्रति हेक्टेयर 25 कुंटल जड़ों का उत्पादन तथा जड़ों का उत्पादन तथा जड़ों में 1.65 से 2.94 प्रतिशत तक एलकलाइड पाया जाता है.

बीज एवं प्रवर्धन विधि 

इसका प्रवर्धन बीज, तना तथा जड़ों द्वारा किया जाता है. तनों द्वारा पौध तैयार करने के लिए 6 से 9 इंच लम्बे 3 से 4 आँख वाले तने के टुकड़े, जो थोडा सा कठोर हो, को 30 पी० पी० एम० इंडोल एसिटिक एसिड में 12 घंटे भिगोने के बाद पौधशाला में लगाये. यह कार्य मई-जून में करे. 70 से 75 दिन बाद जिन कलमों में पत्तियां आ गई हो, उन्हें मुख्य खेत में रोपण किया जा सकता है.

तने की तुलना में जड़ द्वारा पौध तैयार करना आसान तथा सफल क्रिया है. मुख्य जड़ के 1-2 इंच टुकडे काटकर पालीथिन में इस प्रकार लगाएं कि टुकडा पालीथिन की मिट्टी के एक सेमी० ऊपर रहे. पानी देते रहे. यह जड़े एक माह के अन्दर अंकुरित हो जाती है. जिन्हें बाद में रोपण हेतु प्रयोग में लाते है.

व्यासायिक द्रष्टि से बीज से फसल उगाना सर्वोत्तम तरीका है. परन्तु बीज 6 माह से अधिक पुराना होने पर जमाव दर घटती है. वैसे भी बीज की जमाव दर कम होती है. एक हेक्टेयर के लिए 5-7, 5 किग्रा० बीज की आवश्यकता होती है. जिन्हें अप्रैल-मई माह में पौधशाला में तैयार की गई उठी क्यारियों अथवा पालीथिन में पौध तैयार करने हेतु बोया जाता है. बीजों का जमाव 20 से 25 दिन तक चलता है. जब पौधों में 4 से 6 पत्तियां आ जाए तो मुख्य खेत में रोप दिया जाता है.

बीजदर  

एक हेक्टेयर में 5 से 7.5 किग्रा० बीज या 40 किग्रा० जड़ों के टुकड़े अथवा 1.5 लाख तनों के टुकड़ों की आवश्यकता होती है.

खेत की तैयारी 

फसल को 30 माह (2 से 5 वर्ष) खेत में रखना होता है. जड़ों के महत्व के कारण भूमि की अच्छी तैयारी की जानी चाहिए. आवश्यकतानुसार गहरी जुताई कर अच्छी तरह खेत तैयार करे. तदुपरांत 45-45 सेमी० की दूरी पर 15 सेमी० गहरे कूंड पौध रोपण के लिए बनाए.

रोपण एवं दूरी

जुलाई-अगस्त माह में 45 x 30 सेमी० की दूरी पर रोपण करना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण 

रोपण के 20 से 25 दिन बाद एक-दो बार खुरपी से निराई कर खरपतवार अवश्य निकाल देना चाहिए.

सिंचाई 

फसल की अच्छी बढ़त के लिए सिंचाई आवश्यक होती है. परन्तु जल्दी-जल्दी पानी नहीं देना चाहिए. पौधों की पत्तियां जब मुरझाने सी लगे उसी समय पानी देना उचित होगा अन्यथा जड़े अधिक गहराई में न जाकर उथली एवं रोयेदार हो जाती है.

खाद 

अच्छी उपज के लिए भूमि में खेत की तैयारी के समय 20 से 25 टन गोबर की सदी हुई खाद अवश्य डालनी चाहिए.

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परिपक्वता एवं खुदाई 

सर्पगन्धा 2 से 4 वर्ष की फसल है. परन्तु 30 माह (2.5 वर्ष) में खुदाई करके इससे अच्छा उत्पादन प्राप्त हो जाता है. खुदाई के लिए दिस्मबर-जनवरी माह उपयुक्त होता है. क्योकि यह पतझड़ का समय होता है.

खुदाई सावधानी पूर्वक करनी चाहिए. ध्यान रहे कि जड़ को क्षति न हो. सिंचाई के पश्चात खुदाई करने से जड़े आसानी से निकल जाती है. जड़ों को साफ़ करके अच्छी प्रकार से सुखा लेना चाहिए.

उपज 

2.5 वर्ष के पश्चात 20 से 25 कुंटल प्रति हेक्टेयर सूखी जड़े तथा 60 किग्रा० बीज की प्राप्ति होती है.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है गाँव किसान Gaon kisan) के इस लेख से सर्पगन्धा की खेती के बारे में पूरी जानकरी मिल पायी होगी. फिर भी आप कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताएं, महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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