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शहतूत की खेती की पूरी जानकारी – Mulberry Cultivation

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शहतूत की खेती
शहतूत की खेती (Mulberry Cultivation) की पूरी जानकारी

शहतूत की खेती (Mulberry Cultivation) की पूरी जानकारी

नमस्कार किसान भाईयों, शहतूत की खेती (Mulberry Cultivation) देश के बहुत बड़े क्षेत्र में की जाती है. इसकी ज्यादातर खेती रेशम कीट को खिलाने के लिए की जाती है. इसके अलावा इसका फल एक स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभदायक होता है. इसलिए इसकी मांग बाजार में रहती है. इसलिए किसान भाई इसकी खेती कर काफी अच्छा मुनाफा कमा सकते है. आज गाँव किसान (Gaon Kisan) अपने इस लेख में शहतूत की खेती (Mulberry Cultivation) की पूरी जानकारी अपने देश की भाषा हिंदी में. जिससे किसान भाई इसकी अच्छी उपज ले सके. तो आइये जानते है शहतूत की खेती (Mulberry Cultivation) की पूरी जानकारी –

शहतूत के फायदे 

शहतूत की लकड़ी से खेल के सामान, फर्नीचर तथा घर के निर्माण में खिडकियों, दरवाजों में किया जाता है. इसकी पत्तियों का उपयोग पशु चारे के रूप में भी किया जाता है. भेड़ और बकरियों को इसका चारा पहुत ही लाभदायक होता है. इसकी सुखाई गई पत्तियां बत्तख एवं मुर्गियों के लिए काफी लाभकारी होती है.

इसका फल मानव स्वास्थ्य के लिए काफी लाभकारी होता है. इसमें 8 से 9 प्रतिशत शुगर व एक प्रतिशत अम्ल होता है. जो रक्त को साफ़ करने में काफी महत्वपूर्ण होता है. योरोपीय देशों में इसके फलों से मदिरा भी बनाई जाती है. शहतूत के फलों को सुखाकर इसका चूर्ण भी बनाया जाता है.

औषधि के रूप में वृक्ष की छाल पेट साफ़ करने में महत्वपूर्ण होती है. यह पेट के कीड़े आदि मारने में प्रभावकारी सिध्द हुई है. मानव के तंत्रिका तंत्र के कुछ रोगों में शहतूत की जड़ से रस निकल कर बनाया गया टॉनिक लाभकारी होता है. इससे वाष्पशील तेल प्राप्त किया जाता है. फलों का रस बुखार एवं गले आदि रोगों में काफी फायदेमंद होता है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र

शहतूत का वानस्पतिक नाम मोरस ऐल्बा (Morus alba Linn.) है. इसे हिंदी में शहतूत के अलावा चुन और तूत भी कहते है. इसे अंगेजी में मलबेरी (Mulberry) कहते है. इसका उत्पत्ति स्थान चीन है. लेकिन यह पश्चिमी एशिया महाद्वीप के भागों में व्यापक रूप से अनुकूलशील हो कर प्राकृतिक रूप में स्थापित हुआ है. विश्व में यह अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन एवं एशिया के पश्चिमी व मध्य भागों के अलावा यूरोप में भी पाया जाता है.

भारत में इसके वन उत्तर दिशा में जम्मू-कश्मीर से लेकर आसाम तक (पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल) दक्षिण भारत में कर्नाटक, केरल व तमिलनाडु में व्यापक रूप से पाए जाते है.

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जलवायु एवं भूमि 

शहतूत एक शीतोष्ण जलवायु का वृक्ष है. इसे ठंडी जलवायु वाले क्षेत्रों में लगाने के साथ उपोष्ण एवं उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में भी लगाया जा सकता है. जिन क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान अधिकतम तापमान 40 से 50 डिग्री सेल्सियस एवं जड़ों में न्यूनतम तापमान शून्य डिग्री तक पहुँच जाता है. वहां यह सफल रहने के साथ-साथ तेजी से बधवार करता है.

यह बलुई दोमट से काली दोमट मिट्टी आदि विभिन्न प्रकार की मृदाओ में यह सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है. गहराई तक सुलभ बलुई जलोढ़ मृदा में पर्याप्त नमी मिलने पर इसके पेड़ तेजी से बढ़ते है. जिन क्षेत्रों की मृदा का पी० एच० मान 6.0 से 7.5 के बीच का हो वहां के लिए शहतूत उपयुक्त रहता है.

शहतूत की उन्नत किस्में 

कनवा-2 

शहतूत की इस किस्म को प्रायः के-2 और एम-5 के नाम से जाना जाता है. इस किस्म की वृध्दि सीधी, मध्यम स्तर की शाखाएं, धुँधले रंग का तना आदि इस उपजाति के लक्षण है. पत्तियां साधारण, पालि रहित और चिकनी सतह वाली और ह्रदयकार होती है. सिंचाई वाले क्षेत्रों में 32 से 35 टन प्रति हेक्तेयर प्रति वर्ष उपज देती है. वही असिंचित क्षेत्रों में 10 से 12 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष उपज देती है.

एस-36 

इस किस्म में छोटे पर्व अर्ध-उर्ध्व प्रकृति मध्यम प्रकार की शाखाएं और धुंधले गुलाबी रंगीन तना आदि इसके अभिलक्षण है. पत्तियां पालि रहित, ह्रदयाकार, हल्की हरी और चिकनी सतह वाली होती है. सिंचित क्षेत्रों में इस किस्म की अच्छी उपज होती है. सिंचित क्षेत्रो में इसकी उपज 38 से 45 टन प्रति हेक्टेयर तक हो जाती है.

भूमि की तैयारी 

शहतूत के पेड़ों को सामान्यतः जुलाई-अगस्त या दिसम्बर-जनवरी में लगाया जाता है. इसलिए मानसून की वर्षा पूर्व इसकी भूमि की तैयारी शुरू की जाती है. खेत की 30 से 35 सेमी० गहरी जुताई के साथ 8 टन प्रति एकड़ की दर से गोबर की सड़ी हुई खाद भूमि में मिलाई जाती है.

पौध की तैयारी 

शहतूत की पौध तैयार करने के लिए कई विधियाँ है, परन्तु कम लागत एवं अच्छी गुणवत्ता की पौध शहतूत की कटिंग से तैयार की जाती है. इस परचलित विधि में शहतूत की टहनियों से कटिंग तैयार की जाती है. टहनियों को 6 इंच से 8 इंच लम्बी काट दी जाती है. जिससे 4 से 5 कलियां हो. उक्त कटिंग को जमीन में तिरछा गाड़ते है एवं उसके चारों और मिट्टी को दबाकर सिंचाई कर डी जाती है. कटिंग उपलब्ध भोज्य पदार्थ के उपयोग से कुछ दिनों में कटिंग से पत्तियां निकल आती है. एवं लगभग 6 माह में 3 से 4 फुट लम्बी शहतूत पौध तैयार हो जाती है. जो शहतूत वृक्षों का रोपण हेतु उपयुक्त होती है.

पौध रोपण एवं दूरी

सामान्यतः झाड़ीनुमा वृक्षारोपण में 3 x 3 अथवा 6 x 2 मीटर की दूरी पर किया जाता है. इस प्रकार लगाने से एक एकड़ में 5000 पौधे लगा सकते है. पहले साल शहतूत के पौधे लगाने से एक वर्ष पौधे के विकास में लगता है. तीसरे वर्ष में उक्त वृक्षारोपण से समयांतर एवं समुचित मात्रा में खाद/उर्वरक के प्रयोग एवं कर्षण कार्यों से एक एकड़ क्षेत्र से लगभग 8 से 10 हजार किग्रा० प्रति वर्ष शहतूत पत्ती का उत्पादन हो सकेगा. उक्त पत्ती पर वर्ष में 800-900 डी० एल० एल्स० का कीटपालन किया जा सकता है. जिससे 300 किग्रा० कोया उत्पादन होगा. सामान्यत प्रति 100 डी० ऍफ़०एल्स० रेशम कीटपालन हेतु 800-900 किग्रा० शहतूत की पत्ती की आवश्यकता होती है. प्रति किग्रा रेशम के उत्पादन पर लगभग 20 से 25 किग्रा पत्ती का उपयोग होता है.

खाद एवं उर्वरक 

शहतूत के लगाये गए बागों में 15 से 20 वर्ष तक पत्तियों सहित तनों की पैदावार ली जाती है. जिसमें बड़ी मात्रा में पोषक तत्वों का ह्रास होता है. इसलिए 20 टन गोबर की सड़ी हुई ख़ाद प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचित क्षेत्र में व 10 टन के हिसाब से असिंचित क्षेत्र में डालना चाहिए. जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बनाया जा सकता है. रासायनिक खादों में 350:140:140 नाइट्रोजन, फ़ॉस्फोरस और पोटाश किलोग्राम पार्टी हेक्टेयर प्रति वर्ष पांच बराबर भागों में डाली जाती है.

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सिंचाई 

मानसून के मौसम में लगाये गये पौधों को ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नही पड़ती है लेकिन बारिश न होने की दशा में 10 से 15 दिन के अंतराल पर सिंचाई कर देनी चाहिए. इसके अलावा आवश्यकतानुसार 10 से 12 दिन के अन्त्तराल पर सिंचाई करते रहने से पौधों में अच्छी वृध्दि होती है.

फसल तुड़ाई 

शत्तूत के फलों की तुड़ाई फल पकने पर की जाती है. पका हुआ फल आमतौर पर गहरे लाल रंग या जामुनी लाल रंग का होता है. फलों की तुड़ाई सुबह के समय हाथों से करना उचित रहता है. फलों को तुड़ाई के बाद नए उत्पाद बनाने के लिए मंडी या बाजार भेज दिया जाता है.

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निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है गाँव किसान (Gaon Kisan) का शहतूत की खेती (Mulberry Cultivation) से समबंधित यह लेख आपको पसंद आया होगा. गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा शहतूत के फायदे से लेकर फसल तुड़ाई तक की सभी जानकारी दी गयी है. फिर भी शहतूत की खेती (Mulberry Cultivation) से सम्बंधित कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताएं महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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