लाल क्लोवर चारा – चारे की एक महत्त्वपूर्ण फसल

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लाल क्लोवर चारा
लाल क्लोवर चारा - चारे की एक महत्त्वपूर्ण फसल

लाल क्लोवर चारा – चारे की एक महत्त्वपूर्ण फसल

नमस्कार किसान भाईयों, लाल क्लोवर चारा चारागाह तथा सूखा चारा बनाने के लिए सबसे अच्छी फसल मानी जाती है. यह चारे की महत्वपूर्ण फसल है. इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख के जरिये आप को लाल क्लोवर चारा के बारे में पूरी जानकारी देगा-

लाल क्लोवर चारा के फायदे 

इसका चारा पशुओं के लिए काफी पौष्टिक होता है. इसमें प्रोटीन की मात्रा 18 से 19 प्रतिशत तक पाई जाती है. इसका चारा रिजका के चारे से कुछ कम पौष्टिक होता है. इसके हरे चारे में पाचनशील कार्बोहाइड्रेट 38.15 प्रतिशत, वसा 1.81 प्रतिशत, ऊर्जा 92324 कैलोरी और प्रोटीन 7.38 प्रतिशत पाई जाती है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

लाल क्लोवर का वानस्पतिक नाम ट्राइफोलियम प्रेन्टेस (Trifolium pratense) है. वानस्पतिक विज्ञान के अनुसार लाल क्लोवर एक वर्षीय चारे की फसल है. इसकी उत्पत्ति का मुख्य स्थान यूरोप और एशिया माना जाता है. संयुक्त राज्य अमेरिका में इसका वर्णन सन 1947 में पाया गया है. सर्वप्रथम इसकी खेती न्यू इंग्लैंड के क्षेत्र में की गयी थी. इसको विश्व के कई भागों में उगाया जाता है. यह यूरोप, पूर्व मध्य-एशिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया में उगाई जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण फसल है. भारत में इसकी खेती 1825 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले हिमालय के पहाड़ी भागों में की जाती है. भारत के मैदानों में इसे नही उगाया जा सकता है.

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जलवायु एवं भूमि 

लाल क्लोवर को ऐसे स्थानों पर उगाया जाता है, जहाँ गर्मी में तापमान काफी कम हो तथा सम्पूर्ण मौसम भर खेत में पर्याप्त नमी हो. इसके लिए उपजाऊ तथा नमी वाली भूमि अच्छी मानी जाती है. यह फसल कंकरीली तथा बलुई भूमि में नही उगाई जा सकती है. इसकी खेती के लिए दोमट, बलुई दोमट या मटियार दोमट भूमि सबसे उपयुक्त होती है. इसको अम्लीय भूमि पर उगाया जा सकता है. इसकी अच्छी उअप्ज के लिए भूमि का पी० एच० मान 6.0 से अधिक होना उपयुक्त होता है.

फसल चक्र  

लाल क्लोवर एक द्विवर्षी फसल है. इसके साथ किसी भी घासदार चारे की फसल या दाने वाली फसलों को उगाया जा सकता है.

  1. राई घास + लाल क्लोवर (द्विवर्षीय)
  2. काक्सफुट या उद्यानी घास + लाल क्लोवर (चार वर्षीय)

उन्नत किस्में 

लाल क्लोवर पर-परागन वाली फसल है इसकी कई जातियां जैसे एक कटाई वाली, दो कटाई वाली या मध्यवर्ती क्लोवर है. इसमें केनलैंड, पेन्नस्काट, डालर्ड, कैसाले और लेकलैंड इत्यादि किस्में प्रमुख है. एक कटाई वाली जातियां केवल स्थानीय होती है.

खेत की तैयारी 

बुवाई के पहले खेत की जुताई और 2 से 3 हैरों चलाकर भूमि को अच्छी तरह तैयार कर लेना चाहिए. बुवाई के समय खेत में ढेले न होने पाए और मिट्टी सख्त तथा नम होनी चाहिए. नमी की अवस्था में बारीक मिट्टी में बुवाई करने से अंकुरण ठीक होता है.

बुवाई 

लाल क्लोवर को प्रायः जई या अन्य फसलों के साथ मिलाकर बोया जाता है. जई के साथ मिलकर बोने में इसका बीज केवल 8 से 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है. शुध्द फसल लेने के लिए बीज की मात्रा 12 से 15 किलोग्राम तक होनी चाहिए. बुवाई के लिए तैयार खेत में बीज को बराबर छिड़क कर 1/2 से 1 सेमी० की गहराई तक मिट्टी में मिला देते है. इसके ऊपर भारी पाटा या रोलर चलाकर भूमि को सख्त बना लेते है. इस तरह खेत में नमी पर्याप्त बनी रहती है. और इसका अंकुरण ठीक प्रकार से हो जाता है.

खाद एवं उर्वरक 

बरसीम या अन्य फलीदार फसलों की भांति यदि आवश्यक हो, तो खेत की मिट्टी की जाँच के अनुसार उर्वरक डालने चाहिए. सामान्यतः 80 से 100 किलोग्राम फ़ॉस्फोरस तथा 25 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर दी जाती है. खाद की सम्पूर्ण मात्रा बुवाई के पहले खेत में डालकर मिट्टी में मिला देना चाहिए. यदि पोटाश की नमी हो, तो इसको भी बुवाई के पहले खेत में डालना चाहिए.

सिंचाई एवं जल-निकास 

लाल क्लोवर के खेत में जल-निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए. इसके अतरिक्त यदि पानी उपलब्ध हो, तो आवश्यकता अनुसार 3 से 4 बार सिंचाई करने से पैदावार में वृध्दि होती है. अधिक ऊंचाई वाले स्थानों पर सामयिक वर्षा से भी उपज बढ़ जाती है. कटाई के समय नमी का होना आवश्यक है.

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फसल सुरक्षा 

फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए निराई-गुड़ाई करनी आवश्यक है. इसमें जड़ विगलन और मुकुट विगलन रोग लगते है. इसके लिए रोग प्रतिरोधी उन्नत किस्में जैसे लेकलैंड आदि उगानी चाहिये. इसकी फसल में मूल वेधक जैसे कीड़े पाए जाते है. इसके लिए कोई विशेष रोकथाम की आवश्यकता नही होती है. सामान्यतः कीड़ों की रोकथाम के लिए थायोडान या मेटासिस्टाक्स की 1 लीटर मात्रा 100० लीटर पानी में घोलकर एक हेक्टेयर में छिड़काव के लिए पर्याप्त होती है.

कटाई प्रबन्धन एवं उपज 

इसकी पहली चारा-कटाई बुवाई के 60 से 70 दिन बाद की जानी चाहिए. इसके बाद 30 से 35 दिन के अंतर पर चारा काटना चाहिए. एक वर्ष में इससे 500 से 600 कुंटल तक हरा चारा प्राप्त हो जाता है.

निष्कर्ष  

किसान भाईयों उम्मीद है किसान (Gaon Kisan) के लाल क्लोवर चारा सम्बन्धी इस लेख से सभी जानकारियां मिल पायी होंगी. फिर भी इस चारे सम्बन्धी आपका कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताएं, महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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