पिप्पली की वैज्ञानिक खेती कैसे करे ? – Long pepper farming

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पिप्पली की वैज्ञानिक खेती
पिप्पली की वैज्ञानिक खेती कैसे करे ? - Long pepper farming

पिप्पली की वैज्ञानिक खेती कैसे करे ? – Long pepper farming

नमस्कार किसान भाइयों, पिप्पली एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा होने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण मसाला भी है. इसके अलावा इसे औद्योगिक उत्पादों के निर्माण में भी प्रयोग करते है. इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख में पिप्पली की वैज्ञानिक खेती के कैसे करे पूरी जानकारी देगें. जिससे किसान भाई इस औषधीय पौधे की खेती कर अच्छा लाभ कमा पाए. तो आइये जानते है पिप्पली की वैज्ञानिक खेती की पूरी जानकारी-

पिप्पली के फायदे

पिप्पली का औषधीय उपयोग सरदर्द, खांसी, गले से संबंधित बीमारियों, अपच एवं बदहजमी, पेट में गैस की समस्या तथा बवासीर आदि जैसे विकारों के उपचार हेतु प्रयुक्त किया जाता है। पिप्पली के फलों तथा मूल के साथ-साथ इसके पत्तों का उपयोग पान की तरह किया जाता है। इसके अलाव राइस बीयर के किन्वण (फर्मेन्टेशन) हेतु इसका बखुबी उपयोग किया जाता है। पिप्पली के फलों के साथ-साथ इसका मूल जिसे पिप्पलामूल कहा जाता है, भी अनेकों औषधियों के निर्माण में प्रयुक्त किया जाता है।

क्षेत्र एवं विस्तार

पिप्पली का वानस्पतिक नाम पाइपर लांगम (Piper longum Linn.) है और यह पाइपरेसी (Piperaceae) परिवार का पौधा है। पिप्पली मूलतः मलेशिया तथा इंडोनेशिया का पौधा है। इनके साथ-साथ यह नेपाल, श्रीलंका, सिंगापुर, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, फिलीपीन्स तथा वर्मा में भी पाया जाता है।

भारतवर्ष में यह मुख्यतया उष्ण प्रदेशों तथा ज्यादा वर्षा वाले जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगता पाया जाता है। हमारे देश में यह अधिकांशतः तमिलनाडु, बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़, असाम, आंध्रप्रदेश, केरल, कर्नाटक, कोंकण से त्रावणकोर तक के पश्चिमी घाट के वनों तथा निकोबार द्वीपसमूहों में प्राकृतिक रूप से उगती है। इन क्षेत्रों में प्राकृतिक (जंगली) रूप से पाए जाने के साथ-साथ व्यवसायिक स्तर पर इसकी खेती देश के कई भागों जैसे महाराष्ट्र, केरल, आंध्रप्रदेश, पश्चिमी बंगाल, खासी, पहाड़ियों पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु आदि में भी होना प्रारंभ हो गई है.

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जलवायु एवं भूमि

पिप्पली की अच्छी पैदावार के लिए गर्म तथा आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है| वे क्षेत्र जहां भारी वर्षा होती हो अथवा जो ज्यादा आर्द्र हों, वहां भी इसकी अच्छी बढ़त होती है| प्रायः 330 से 3300 फीट तक की उंचाई वाले क्षेत्रों में यह अच्छी प्रकार पनपता है| जबकि इससे अधिक उंचाई वाले क्षेत्रों में इसकी सही उपज प्राप्त नहीं हो पाती है|

इअके पौधे की अच्छी बढ़वार के लिए जीवांश युक्त दोमट और लाल मिट्टी उपयुक्त होती है. इसके अलावा पी० एच० मान सामान्य व मिटटी में नमी सोखने की क्षमता होनी चाहिए. भूमि से जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए.

पिप्पली के भेद

 1. पिप्पली – इस पिप्पली को मगधी अथवा मघई पिप्पली भी कहा जाता है। बिहार के मगध क्षेत्र में होने के कारण इसका नाम मगधी पड़ा है। पंजाबी भाषा में अभी भी पिप्पली को मघ’ ही कहा जाता है। वानस्पतिक जगत में इस पिप्पली को पाइपर लौंगम’ के नाम से जाना जाता है।

2. वनपिप्पली – यह प्रायः वनों में उगती है। यह छोटी, पतली तथा कम तीक्षण होती है। इसे प्रायः पाइपर साइलवेटिकम के रूप में पहचाना जाता है। इसे बंगाली या पहाड़ी पिप्पली भी कहा जाता है। यह उत्तरी–दक्षिणी आसाम, बंगाल तथा वर्मा में अधिकता में पाई जाती है।

3. सिंहली पिप्पली – इसे जहाजी पिप्पली भी कहा जाता है क्योंकि यह श्रीलंका तथा सिंगापुर आदि देशों से हमारे यहां आयात होती थी। इसे पाइपर रिट्रोफैक्टम’8 के रूप में जाना जाता है।

4. गज पिप्पली – इस पिप्पली के बारे में कई भ्रांतियां हैं तथा कई वैज्ञानिक इसको चब्य का फल मानते हैं। उपरोक्त में से प्रथम तीन प्रकार की पिपपलियों को अलग-अलग द्रव्य नहीं माना जाता तथा इन सभी को पिप्पली अथवा पाइपर लौंगम के रूप में पहचाना जाता है।

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प्रवर्धन विधि 

पिप्पली का प्रवर्धन बीजों से भी किया जा सकता है, सकर्स से भी, कलमों से भी तथा इसकी शाखाओं की लेयरिंग करके भी। वैसे व्यवसायिक कृषिकरण की दृष्टि से इसका कलमों द्वारा प्रवर्धन किया जाना ज्यादा उपयुक्त होता है। इसके लिए सर्वप्रथम इन्हें नर्सरी में तैयार किया जाता है।

नर्सरी की तैयारी विधि 

पिप्पली की नर्सरी बनाने का सर्वाधिक उपयुक्त समय फरवरी-मार्च माह (महाशिवरात्री के समय का) होता है। इस समय पुराने पौधों की ऐसी शाखाएँ जो 8 से 10 से.मी. लम्बी हों, तथा जिनमें से प्रत्येक में 3 से 6 तक आंखें (नोड्स) हों, काट करके पॉलीथीन की थैलियों में रोपित कर दी जाती है। रोपाई से पूर्व इन थैलियों को मिट्टी, रेत तथा गोबर की खाद (प्रत्येक का 33 प्रतिशत) डाल करके तैयार किया जाता है। थैलियों में रोपण से पूर्व इन कलमों को गौमूत्र से ट्रीट कर लिया जाना चाहिए। इन पौलीथीन की थैलियों को किसी छायादार स्थान पर रखा जाना चाहिए तथा इनकी प्रतिदिन हल्की सिंचाई की जानी चाहिए। लगभग डेढ़ से दो महीने में ये कलमें खेत में लगाए जाने के लिए तैयार हो जाती है।

खेत की तैयारी 

नर्सरी में तैयार किए गए पौधों को अंततः मुख्य खेत में रोपित करना होता है जहां ये पौधे 4-5 साल तक रहेंगे। इस दृष्टि से मुख्य खेत की अच्छी प्रकार तैयारी करने की आवश्यकता होती है। इसके लिए खेत की 2-3 बार अच्छी प्रकार जुताई करके उसमें प्रति एकड़ 5 से 7 टन तक गोबर की पकी हुई खाद मिला दी जाती है। तदुपरान्त खेत में 2×2 फीट की दूरी पर गड्ढे बना लिए जाते हैं जिनमें अंततः इन कलमों का रोपण करना होता है। इन गड्ढ़ों में से प्रत्येक में कम से कम 100 ग्राम अच्छी प्रकार पकी हुई गोबर की खाद डाल दी जाती है। क्योंकि पिप्पली का आरोहरण के लिए किसी दूसरे सहारे की जरूरत होती है अतः खेत तैयार करते समय भी ऐसे आरोहरण की व्यवस्था की जा सकती है तथा बाद में भी । प्रायः इस दृष्टि से प्रत्येक गड्ढे के पास एक-एक पौधा एरंड, पांगरा अथवा अगस्ती का लगा दिया जाता है जो तेजी से बढ़ता है तथा पिप्पली की लताऐं इन पर चढ़ जाती हैं। आरोहण हेतु सूखी डालियां भी खड़ी की जा सकती हैं। कई क्षेत्रों में इन्हें सूबबूल अथवा नारियल के पौधों पर भी चढ़ाया जाता है।

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रोपण 

मानसून के प्रारंभ होते ही नर्सरी में तैयार किए गए पिप्पली के पौधों का मुख्य खेत में गड्ढ़ों में रोपण कर दिया जाता है। प्रायः एक गड्ढे में दो पौधों का रोपण किया जाना उपयुक्त रहता है। जैसा कि उपरोक्तानुसार वर्णित है, मुख्य खेत में इन पौधों की रोपाई 2×2 फीट की दूरी पर की जाती है तथा इस प्रकार एक एकड़ में लगाने के लिए लगभग 20 से 25000 पौधों की आवश्यकता होती है।

आरोहण व्यवस्था

पिप्पली की लताओं को चढ़ाने के लिए आरोहण की व्यवस्था किया जाना आवश्यक होता है। इसके लिए या तो उपरोक्तानुसार खेत में अगस्ती, एरंड अथवा पांगरा रोपित किया जा सकता है अथवा सूखे डंठल गाड़ दिए जाते हैं जिन पर ये तलाऐं चढ़ जाती है। यदि अरोहण की उचित व्यवस्था न हो तो उन लताओं पर लगने वाले फल सड़ सकते हैं। इस प्रकार इनकी लताओं के आरोहण की उपयुक्त व्यवस्था किया जाना आवश्यक होगा।

निराई-गुड़ाई 

फसल की प्रारंभिक अवस्था में खेत की हाथ से निंदाई-गुड़ाई किया जाना आवश्यक होता है ताकि पौधों के आस-पास खरपतवारों को पनपने न दिया जाए। बाद में जब इन पौधों की लताऐं फैल जाती है तो अतिरिक्त निंदाई-गुड़ाई की आवश्यकता नहीं होती। वैसे यदि हो भी तो इन्हें हाथ से निकाल दिया जाना चाहिए।

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सिंचाई 

हालाँकि दक्षिण के किन्हीं क्षेत्रों में पिप्पली को एक असिंचित फसल के रुप में लिया जाता है| परन्तु अच्छी फसल प्राप्त करने की दृष्टि से आवश्यक है, सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था की जाय| इस दृष्टि से प्रति सप्ताह एक हल्की सिंचाई कर देने से फसल अच्छी वृद्धि प्राप्त कर लेती है| सिंचाई स्प्रिंकलर पद्धति से भी की जा सकती है तथा फ्लड इरीगेशन विधि से भी वैसे इस फसल के लिए ड्रिप विधि भी काफी उपयोगी सिद्ध हो सकती है|

परन्तु विधि चाहे जो भी हो परन्तु नियमित अंतरालों पर फसल की सिंचाई की जाना फसल की उपयुक्त वृद्धि के लिए आवश्यक होता है| गर्मी के मौसम में जब फसल की सिंचाई नहीं की जाती तो उस समय पौधों के पास सूखी घास अथवा पत्ते आदि बिछा कर इनकी मल्चिंग की जा सकती है|

फसल का पकना 

रोपण के लगभग पांच-छ: माह के उपरान्त पौधों पर फल (स्पाइक्स) बनकर तैयार हो जाते हैं। जब ये फल हरे-काले रंग के हों तो इनको चुन लिया जाता है। कई स्थानों पर इन फलों की तुड़ाई वर्ष में एक ही बार (प्रायः जनवरी माह में) की जाती है जबकि कई स्थानों पर इन्हें समय-समय पर (तीन चार बार में) तोड़ लिया जाता है। तुड़ाई के उपरान्त इन फलों को धूप में डालकर 4-5 दिन तक अच्छी प्रकार सुखाया जाता है। जब ये अच्छी प्रकार सूख जाएँ तो इन्हे विपणन हेतु भिजवा दिया जाता है।

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उपज 

प्रथम वर्ष में पिप्पली की फसल से प्रति एकड़ लगभग 4 क्विंटल सूखे फल (स्पाइक्स) प्राप्त होते हैं। जोकि तीसरे से पांचवें वर्ष में प्रति एकड़ 6 क्विंटल प्रतिवर्ष तक हो सकते हैं। पांचवें वर्ष में प्रति एकड़ लगभग 200 कि०ग्रा० पिप्पलामूल भी प्राप्त हो जाता है।

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