पाषाणभेद (पत्थरचूर) की खेती – Coleus barbatus farming

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पाषाणभेद (पत्थरचूर) की खेती
पाषाणभेद (पत्थरचूर) की खेती - Coleus barbatus farming

पाषाणभेद (पत्थरचूर) की खेती – Coleus barbatus farming

नमस्कार किसान भाईयों, पाषाणभेद (पत्थरचूर) की खेती देश के विभिन्न भागों में सफलतापूर्वक की जाती है. पाषणभेद एक औषधीय फसल है. इसे पत्थरचूर भी कहा जाता है. इसकी खेती कर किसान भाई अच्छा मुनाफा कमा सकते है. इसलिए गाँव किसान आज (Gaon Kisan) अपने इस लेख में पाषाणभेद (पत्थरचूर) की खेती की पूरी आप सभी को देगा. जिससे आप इस औषधीय फसल की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा सके. तो आइये जानते है पाषाणभेद (पत्थरभेद) की खेती की पूरी जानकारी-

पाषाणभेद (पत्थरचूर) के फायदे 

यह एक औषधीय पौधा है. जिसका उपयोग आयुर्वेद चिकित्सा में किया जाता है. इस उपयोग पथरी के इलाज के लिए किया जाता है. इसके अलावा हदय रोग, पाचन शक्ति बढाने, खांसी, मुंह के छाले, मूत्र सम्बन्धी रोगों में औषधि के रूप में प्रयोग की जाती है.

क्षेत्र एवं विस्तार 

पाषाणभेद (पत्थरचूर) का वानस्पतिक नाम बर्जेनिआ सिलिएटा (Bergenia ciliata) है. यह सेक्सिप्रेंगेसी (Saxifragaceae) कुल का पौधा है. विश्व में इसकी खेती एशिया, भूटान, तिबब्त, अफगानिस्तान आदि देशों में की जाती है. भारत में यह कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड व हिमालय क्षेत्र में 2200-3200 मी० की ऊंचाई पर पाया जाता है.

जलवायु एवं भूमि 

पाषाणभेद (पत्थरचूर) की खेती के लिए उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में की जाती है. यह आर्द्र और गर्म जलवायु में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है. सिंचाई सुविधा के अलावा उन क्षेत्रों में भी उगाई जा सकती है. जहाँ जून से सितम्बर महीने के बीज पर्याप्त वर्षा होती है.

इसकी खेती सभी प्रकार की भूमि में सफलतापूर्वक की जाती है. लेकिन रेतीली दोमट, हल्की कपासिया एवं लाल मृदा जिसमें जीवाश्म की मात्रा पायी जाती है, इसकी खेती के लिए उपयुक्त होती है. भूमि का पी० एच० मान 5.5 से 7.0 के बीच का होना चाहिए. भूमि से जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए.

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उन्नतशील प्रजातियां

कर्नाटक राज्य में पाई जाने वाली पत्थरचूर से चयनित आधार पर एक उन्नतशील प्रजाति जारी की गई है जिसे “के- 8 का नाम दिया गया है| यह प्रजाति अन्य प्रजातियों की तुलना में ज्यादा उत्पादन भी देती है तथा फोर्सकोलिन भी अधिक मात्रा में पाया जाता है|

पत्थरचूर का प्रवर्धन

पत्थरचूर का प्रवर्घन बीजों से भी किया जा सकता है तथा कलमों से भी वैसे व्यवसायिक कृषिकरण की दृष्टि से इसका प्रवर्धन कलमों से किया जाना ज्यादा उपयुक्त होता है| इसके लिए कलमों को पहले नर्सरी बेड्स में भी तैयार किया जा सकता है तथा सीधे खेत में भी लगाया जा सकता है| नर्सरी में इसकी कलमों को तैयार करने की प्रक्रिया निम्नानुसार होती है, जैसे-

नर्सरी बनाने की प्रक्रिया- पत्थरचूर की नर्सरी बनाने की प्रक्रिया में सर्वप्रथम मई माह में इसके पुराने पौधों से इसकी 4 से 6 इंट लम्बी कलमें काट ली जाती है| ये कलमें ऐसी होनी चाहिए कि प्रत्येक में कम से कम 6 से 7 पत्ते तथा कम से कम 2 या 3 आंखे (नोड्स) अवश्य हों| यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि कलमों को या तो नर्सरी बेड्स में तैयार किया जाता है अथवा पौलीथीन की थैलियों में रोपित करके भी तैयार किया जा सकता है| नर्सरी में यदि इन्हे लगाना हो तो पौध से पौध के बीच की दूरी कम से कम (3 से 3 इंच) रखी जानी चाहिए|

पौलीथीन थेलियों में कलमें रोपित करने से पूर्व इन्हें कम्पोस्ट खाद, मिट्टी तथा रेत (प्रत्येक 33 प्रतिशत) डाल कर भरा जाता है| कलमों का जल्दी तथा सुनिश्चित उगाव हो इसके लिए किसी रूटिंग हार्मोन का उपयोग भी किया जा सकता है अथवा कम से कम गौमुत्र में तो इन्हें कुछ देर तक डुबोकर रखा जाना ही चाहिए| इसी बीच 2 से 3 दिनों मे नर्सरी में लगाई गई इन कलमों में पानी देते रहना चाहिए| नर्सरी में लगभग एक माह तक रखने पर इनमें पर्याप्त जड़े विकसित हो जाती है तथा तदुपरान्त इन्हें मुख्य खेत में स्थानान्तरित किया जा सकता है|

खेत की तैयारी

जिस मुख्य खेत में पौधो का रोपण करना होता है, उसकी अच्छी प्रकार तैयारी करनी आवश्यक होती है| इसके लिए सर्वप्रथम मई से जून में खेत की गहरी जुताई कर दी जाती है| तदुपरान्त खेत में प्रति एकड़ 5 टन अच्छी प्रकार पकी हुई गोबर अथवा कम्पोस्ट अथवा 2.5 टन वर्मीकम्पोस्ट के साथ-साथ 120 किलोग्राम प्रॉम जैविक खाद खेत में मिला दी जानी चाहिए|

मुख्य खेत में पौधों की रोपाई मानसून प्रारंभ होते ही नर्सरी में तैयार की गई पौध को खुरपी की सहायता से मुख्य खेत में प्रतिरोपित कर दिया जाता है| प्रतिरोपित करते समय पौधे से पौधे की दूरी 20 सेंटीमीटर तथा कतार से कतार की दूरी 60 सेंटीमीटर रखी जाती है| इस प्रकार एक एकड़ में लगभग 34000 पौधे रोपित किए जाते है|

सिंचाई व्यवस्था

मानसून की फसल के रूप में लगाए जाने के कारण यदि नियमित अंतराल पर वारिश हो रही हो तो फसल को अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती परन्तु यदि नियमित वर्षा न हो रही हो तो सिंचाई करने की आवश्यकता होती है| इस दृष्टि से प्रथम सिंचाई प्रतिरोपण के तुरंत बाद कर दी जानी चाहिए तथा तदुपरान्त प्रारंभ में तीन दिन में एक बार तथा बाद में सप्ताह में एक बार सिंचाई की जानी चाहिए|

निंदाई-गुड़ाई

नियमित सिंचाई देने के कारण तथा मानसून की फसल होने के कारण खेत में खरपतवार आना स्वाभाविक है| इसके लिए हाथ से निंदाई-गुड़ाई की जाना बांछित होगी| हाथ से निंदाई-गुड़ाई करने से एक तरफ जहां खरपतवार साफ होंगे वही भूमि भी नर्म होती रहेगी| लाईनों के बीचों-बीच कुल्पा अथवा डोरा चलाकर भी खरपतवार से निजात पाई जा सकती है|

खाद तथा भू-टॉनिक

यूं तो खेत तैयार करते समय 5 टन प्रति एकड़ की दर से कम्पोस्ट खाद खेत में मिलाने की संतुति की जाती है| परन्तु यदि जैविक खाद का उपयोग किया जाना संभव न हो तो प्रति एकड़ 16 किलोग्राम नाइट्रोजन (8 किलोग्राम प्रतिरोपण के समय तथा शेष प्रतिरोपण के एक माह बाद) 24 किलोग्राम स्फर तथा 20 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ डाले जाने की अनुशंसा की जाती है|

कीट एवं रोग

पत्ती पलेटने वाले केटरपिलर्स, मीली बग तथा जड़ो को नुकसान पहुंचाने वाले नीमाटोड्स वे प्रमुख कीट हैं जो पत्थरचूर की फसल को नुकसान पहुचा सकते है| इनके नियंत्रण हेतु मिथाईल पैराथियान का 0.1 प्रतिशत घोल बनाकर पौधों पर छिड़काव किया जा सकता है अथवा पौधों की जड़ों की ट्रेंचिग की जा सकती है|

इसी प्रकार कार्बोफ्युरॉन 8 किलोग्राम ग्रेनुअल्स का प्रति एकड़ की दर से उपयोग करके सूत्रकृमियों को नियन्त्रित किया जा सकता है| कभी-कभी फसल पर बैक्टीरियल बिल्ट का प्रकोप भी हो सकता है, जिसके दिखते ही केप्टान दवा के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करके इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है| यदि यह बीमारी नियंत्रित न हो तो एक सप्ताह के बाद पुनः इस दवा का छिड़काव किया जा सकता है|

फूलों की कटाई

प्रतिरोपण के दो से ढाई माह के उपरान्त पत्थरचूर के पौधों पर हल्के नीले जामुनी रंग के फूल आने लगते है| इन फूलों को नाखुनों की सहायता से तोड़ या काट दिया जाना चाहिए अन्यथा जड़ों का विकास प्रभावित हो सकता है|

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फसल की कटाई

रोपण के लगभग 5 से 6 माह के अन्दर पत्थरचूर की फसल कटाई या उखाड़ने के लिए तैयार हो जाती है| यद्यपि तब तक इसके पते हरे ही रहते है, परन्तु यह देखते रहना चाहिए कि जब जड़े अच्छी प्रकार विकसित हो जाऐं (यह स्थिति रोपण के लगभग 5 से 6 माह के बाद आती है) तो पौधो को उखाड़ लिया जाना चाहिए| उखाड़ लिया जाना चाहिए|

उखाड़ने से पूर्व खेत की हल्की सिंचाई कर दी जानी चाहिए ताकि जमीन गीली हो जाए तथा जड़ें आसानी से उखाड़ी जा सकें| पौधे उखाड़ लेने के उपरान्त इनकी जड़ों को काट कर अलग कर लिया जाता है तथा इनके साथ जो मिट्टी अथवा रेत आदि लगा हो उसे झाड़ करके इन्हें साफ कर लिया जाता है|

साफ कर लेने के उपरान्त इन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है अथवा बीच में चीरा लगा दिया जाता है| इस प्रकार टुकड़ा में काट लिये जाने के उपरान्त इन्हें धुप में सुखा लिया जाता है| अच्छी प्रकार से सूख जाने पर इन्हें बोरियों में पैक करके बिक्री हेतु प्रस्तुत कर दिया जाता है| सूखने पर ये ट्युबर्स गीले ट्यूबर्स की तुलना में लगभग 12 प्रतिशित रह जाते है|

उपज 

एक हेक्टेयर खेती से लगभग 20 कुंटल सूखी जड़े तथा प्ररोह भाग से अगली फसल के लिए कलमें प्राप्त हो जाती है.

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आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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