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आलूबुखारा की खेती कैसे करे ? – Plum Farming (हिंदी में)

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आलूबुखारा की खेती
आलूबुखारा की खेती (Plum Farming) कैसे करे ?

आलूबुखारा की खेती (Plum Farming) कैसे करे ?

नमस्कार किसान भाईयों, आलूबुखारा की खेती (Plum farming) देश के ठन्डे और पहाड़ी क्षेत्रो में की जाती है. यह एक गुठलीदार फल होता है. जो स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक होता है. अब इसकी खेती कुछ मैदानी क्षेत्रों में भी की जाती है. इसकी खेती कर किसान भाई अच्छा लाभ कमा सकते है. इसलिए गाँव किसान (Gaon Kisan) आज अपने इस लेख के जरिये आलूबुखारा की खेती (Plum farming) की पूरी जानकारी देगा, वह भी अपने देश की भाषा हिंदी में. जिससे किसान भाई इसकी अच्छी उपज ले सके. तो आइये जानते है आलूबुखारा की खेती (Plum farming) की पूरी जानकारी-

आलूबुखारा के फायदे 

आलू बुखारे के फल लाल, काले, पीले और कभी-कभी हरे रंग के होते है. इसका स्वाद मीठा या खट्टा होता है. साथ ही इसका छिलका पतला व खट्टा होता है. इसका गूदा रसदार होता है. और इन्हें सीधा खाया जा सकता है. या इनके मुरब्बे बनाए जा सकते है. बहुत से स्थानों पर सुखाये गए आलूबुखारों को खाया जाता है. इसमें एंटीऑक्सीडेट प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. जो कुछ रोगों से शरीर को सुरक्षित रखने में मदद करता है.

इसमें विटामिन, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और लवण पदार्थ प्रचुर मात्रा में पाए जाते है. इसके सेवन से पेट सम्बन्धी विकार जैसे भूख की कमी, बदहजमी, पाचन विकार आदि ठीक हो जाते है. साथ ही कब्ज, बावसीर आदि बीमारियों में भी फायदेमंद होता है. इससे विभिन्न प्रकार के उत्पाद जैसे जैम, जेली, चटनी और अच्छी गुणवत्ता वाली मदिरा भी बनायी जाती है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र 

आलूबुखारा का वानस्पतिक नाम प्रूनस डोमेस्टिका (Prunus domestica l.) है. यह रोजेसी (Rosaceae) कुल का पौधा है. इसके फल को अलूचा या प्लम (Plum) भी कहते है. आलूबुखारा की उत्पत्ति दक्षिण पूर्व यूरोप अथवा पश्चिमी एशिया में काकेशिया या कैस्पियन सागरीय प्रान्त में हुई है. विश्व में इसकी खेती अमेरिका, चीन आदि ठन्डे देशों में की जाती है. भारत में इसकी खेती जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड तथा दक्षिण भारत में नीलगिरी के पहाड़ी क्षेत्रों में की जाती है. अमेरिका आलूबुखारा का सबसे अधिक उत्पादन होता है.

जलवायु एवं भूमि 

आलूबुखारा की अच्छी उपज के लिए ठंडी जलवायु उपयुक्त होती है. इसकी खेती पहाड़ी अंचल के साथ-साथ जमीनी क्षेत्रों में भी सफलता पूर्वक की जा सकती है.लेकिन इसकी अच्छी उपज के लिए समुद्रतल से 900 से 2500 मीटर तक के ऊंचाई वाले क्षेत्र जहाँ पाला न पड़ता हो, सर्वोत्तम होते है.

आलूबुखारे की खेती विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है. इसकी अच्छी उपज के लिए गहरी उपजाऊ दोमट मिट्टी इसके लिए सर्वोत्तम होती है. इस बात का धयान रखे भूमि से जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए.

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आलूबुखारा की उन्नत किस्में 

आलूबुखारा की क्षेत्र के अनुसार निम्नवत उन्नत किस्में है-

  • जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए सान्तारोजा, ब्यूटी, मेरिपोजा, विक्सन,ग्रीनगेज, वाशिंगटन, प्रेसिडेंट, मेनार्ड, विजन, फ्रेंचप्रून आदि प्रमुख किस्में है.
  • मैदानी क्षेत्रों के लिए तितरों, जामुनी मेरठी, डैमसन प्लम, अलूचा यलों, मोतिया, काला अमरतसारी, गोल्डन लालरी आदि प्रमुख उन्नत किस्में है.
  • उत्तर प्रदेश राज्य के लिए तितरो, अलूचा यलों, काला अमृतसारी, जामुनी, मेरठी आदि प्रमुख उन्नत किस्में है.

खेत की तैयारी 

आलूबुखारा के पौधे लगाने से पहले खेत को अच्छी तरह खरपतवार साफ़ करने के बाद लगभग दो से तीन बार जुताई करके खेत को अच्छी प्रकार तैयार कर लेना चाहिए. जुताई करने के बाद पाटा लगाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए.

प्रवर्धन की विधियाँ 

आलूबुखारा की पौध तैयार करने के लिए ढल चश्मा व जीभी कलम विधि द्वारा प्रवर्धन किया जाता है. आडू तथा आलूबुखारा के बीजू पौधों के मूलवृंत के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिए. चश्मा चढाने के लिए जनवरी-फरवरी का महीना सबसे उपयुक्त होता है. जीभी कलम के लिए मई-जून के महीने में बांधनी सर्वोत्तम होती है.

पौधा लगाने का समय व दूरी 

आलूबुखारा के पौध लगाने के लिए जनवरी-फरवरी महीना सबसे उचित होता है. इसलिए पौधा लगाने से एक महीना पहले निश्चित स्थान पर 1 x 1 x 1 मीटर आकर के 5 x 5 मीटर की दूरी पर गड्ढे खोद लेना चाहिए. इन गड्ढों में सड़ी हुई गोबर खाद और मिट्टी बराबर मात्रा में मिलाकर गड्ढे में भर देना चाहिए. और पानी डाल देना चाहिए. जिससे मिट्टी अच्छी तरह बैठ जाय. इसके एक महीने उपरांत इन गड्ढों में पौधों की रोपाई करके मिट्टी को चारो तरफ से दबा दे.

सिंचाई

आलूबुखारा की अच्छी वृध्दि और उपज के लिए सिंचाई की उचित व्यवस्था होने चाहिए. इसके लिए मैदानी क्षेत्रों में अप्रैल से जून तक 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए. इसके अलावा आवश्यकतानुसार सिंचाई भी कर सकते है. ड्रिप सिंचाई बाग़वनी की लाभकारी कारी होती है.

सधाई एवं काट-छांट 

आलूबुखारा के पौधों को सही आकर देने के लिए काट-छांट करना आवश्यक होता है. अधिकांशतया जापानी किस्मों की मध्य खुली विधि व यूरोपीय किस्मों की रूपांतरित अग्र प्ररोह विधि से सधाई करते है. काट-छांट के लिए अनुत्पादित दलपुट, मरी, सूखी व एक वर्ष पुरानी फलदार टहनियों के अग्र भाग का 1/3 भाग काट देना चाहिए.

खाद एवं उर्वरक  

आलूबुखारा की अच्छी वृध्दि खाद एवं उर्वरक की उचित मात्रा देना आवश्यक होता है. इसके लिए 10 से 15 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद, नाइट्रोजन 25 ग्राम, पोटाश 25 ग्राम प्रति पेड़ प्रति वर्ष के हिसाब से 10 वर्ष तक देना चाहिए. इसके बाद यह मात्रा स्थिर कर देनी चाहिए. फ़ॉस्फोरस की पूरी तथा पोटाश की आधी मात्रा फरवरी में और आधी मात्रा मार्च तथा नाइट्रोजन की आधी मात्रा फरवरी व शेष आधी मात्रा अप्रैल में देनी चाहिए.

फूल तथा फल आने का समय 

आलूबुखारा में फूल आने का समय फरवरी से मार्च तक है. और फल पककर तैयार होने का समय जून से अगस्त तक का है.

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फलों की तुड़ाई एवं उपज 

आलूबुखारा को ताजे फल खाने के लिए पूरी तरह पकाकर ही तोड़ना चाहिए. अगर बाजार भेजना है तो पूरा पकने के कुछ दिन पहले ही तोड़ना चाहिए. आलूबुखारा को अधिक दिन तक अच्छी दशा में रखा जा सकता है.

यह किस्म और क्षेत्र के अनुसार 50 से 80 किग्रा० फल प्रति पेड़ प्रति वर्ष तक की उपज दे देता है.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है गाँव किसान (Gaon Kisan) के आलूबुखारा की खेती (Plum farming) से सम्बंधित इस लेख से सभी जानकारियां मिल पायी होगी. गाँव किसान (Gaon Kisan) द्वारा आलूबुखारा के फायदे से लेकर इसकी उअप्ज तक की सभी जानकारियां दी गयी है. फिर भी आलूबुखारा की खेती (Plum farming) से सम्बंधित कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट करके जरुर बताएं, महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द.

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