अर्जुन वृक्ष की खेती कैसे करे ? | How to cultivate Arjuna tree

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अर्जुन वृक्ष की खेती
अर्जुन वृक्ष की खेती कैसे करे ? | How to cultivate Arjuna tree

अर्जुन वृक्ष की खेती कैसे करे ? | How to cultivate Arjuna tree

नमस्कार किसान भाइयों, अर्जुन वृक्ष की खेती इसके औषधीय गुणों के कारण की जाती है. यह एक औषधीय वृक्ष है. इसका पेड़ सदाहरित और काफी बड़ा होता है. आज गाँव किसान (Gaon Kisan) अपने इस लेख में अर्जुन वृक्ष की खेती कैसे करे ? की पूरी जानकारी देगा. जिससे किसान भाई इसे उगाकर इससे अच्छा लाभ कमा सके. तो आइये जानते है अर्जुन वृक्ष की खेती कैसे करे-

अर्जुन वृक्ष के फायदे

इसकी वृक्ष की छाल काफी फायदेमंद होती है. इसमें क्रिस्टलीय यौगिक अर्जुनिन, अर्जुनेटिन, वाष्पशील तेल, टैनिन, अपचायक, शुगर व रंजक पदार्थ होता है. इसका उपयोग टॉनिक व स्तंभक दवाइयों के बनाने में होता है. जो कि विभिन्न दिल की बीमारियों में लाभकारी होती है. दक्षिण भारत में वृक्ष की छाल बाजारों एवं हाट में बिकती है. मूत्र वर्धक होने के साथ-साथ इसका उपयोग बाहरी घावों को भरने व ठीक करने में किया जा सकता है. छल का काढा दूध के साथ देने पर कई दिल की बीमारियों का निदान सम्भव होता है. भीतरी गुम चोट, हड्डी टूटने, अल्सर हाइपरटेंशन व लीवर सम्बन्धी रोगों के लिए इसकी छाल से निर्मित औषधि लाभकारी सिध्द हुई है. छाल की राख बिच्छू के डंक के जहर के असर को समाप्त करने में सहायक होती है.

मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में इसकी पत्तियां चारे के रूप में प्रयुक्त होती है. यद्यपि या एक सामान्य श्रेणी का चारा उत्पादित करता है. और इसके प्रति जानवरों की रूचि विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न है. इसके अलाव इसकी लकड़ी का उपयोग फर्नीचर आदि उपयोगी वस्तुएं बनाने के काम में आती है.

उत्पत्ति एवं क्षेत्र

अर्जुन का वानस्पतिक नाम टर्मिनेलिया अर्जुना (Terminalia arjuna) है. यह कोम्ब्रेटेसी (Combretaceae) कुल का पौधा है. इसका उत्पत्ति का स्थान भारत का मध्य स्थान माना जाता है. यह मध्य भाग दक्षिण से पूर्व पूरे भारत में प्राकृतिक रूप से मिलता है. विश्व में यह श्रीलंका, पकिस्तान, बर्मा, नेपाल आदि देशों में पाया जाता है. भारत में यह मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र व तमिलनाडु आदि देशों में पाया जाता है.

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जलवायु एवं भूमि

अर्जुन के वृक्ष के लिए नाम और ठंडी जलवायु उपयुक्त है. जिन क्षेत्रों में अधिकतम वर्षा  380 सेमी० तक होती है. वहां पर इसका पेड़ अच्छी वृध्दि करता है. इसके प्राकृतिक विस्तार वाले क्षेत्रों का का अधिकतम तापमान 35 से 47.5 डिग्री एवं ठण्ड के दिनों में तापमान शून्य से 15 डिग्री सेल्सियस के मध्य रहता है. पौधे की वृध्दि पर पाले का विपरीत प्रभाव पड़ता है.

यह विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में उगाया जा सकता है. इसके लिए उपजाऊ जलोढ़-कछारी, बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है. इसमें पौधे अच्छी गति से वृध्दि करते है. जबकि पूर्ण रूप से शुष्क भूमि पर पौधे अच्छी तरह स्थापित नही हो पाते है.

प्रवर्धन विधियाँ 

अर्जुन का अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए पौधशाला में पौधे तैयार करने के साथ-साथ बीज की बुवाई द्वारा एवं इसके मूल मुंड (स्टम्प) तैयार किये जाते है. यद्यपि अच्छी गुणवत्ता वाले अर्जुन के वृक्षों पर गूंटी बाँध कर भी कृत्रिम पुनरुत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. तथापि यह विधि सामान्यतः प्रयुक्त नही की जाती है.

बीज एवं बीजोपचार 

अर्जुन के बीज फरवरी से मई मध्य विशेष रूप से अप्रैल-मई में पककर तैयार हो जाते है. इनको अच्छी तरह सुखाकर वायु अवरूध्द टिन अथवा बैग में एक वर्ष तक रखा जाता है. इनके वजन व आकार में भिन्नता पायी जाती है. एक किलोग्राम भार में प्राप्त होने वाले बीजों की संख्या 175 से 450 के मध्य रहती है. जबकि कुछ वैज्ञानिको के अनुसार यह संख्या अधिकतम 775 तक पाई गयी है.

इसके बीजों को शीघ्र व उत्तम अंकुरण के लिए बुवाई से पूर्व उपचारित करना आवश्यक है. इसके लिए बीजों को उबलते हुए पानी में रखते है. एवं उसी पानी में ठंडे होने की स्थिति तक पड़े रहने बाद भी 3 से 4 दिन तक भिगोये रखते है. इस तरह उपचारित बीजों में अंकुरण 8 से 9 दिन में हो जाता है. और इनका अंकुरण 90 से 92 प्रतिशत संभव होता है.

बुवाई 

टांग्या पद्धति द्वारा अर्जुन का वृक्षारोपण करने हेतु वर्षा के प्रारंभ में बीजों की बुवाई लाइनों में 4-4 मीटर की दूरी पर की जाती है. सामान्य तौर पर इन बीजों का अंकुरण 55 से 60 के मध्य रहता है. और अंकुरण के बाद इन लाइनों में पौधे के मध्य की दूरी 3 से 3.5 मीटर रखी जाती है. अर्जुन की स्वस्थ व अच्छी पौध तैयार करने के लिए पौधशाला से उचित जल निकास की व्यवस्था होनी चाहिए. क्यारियों को अच्छी प्रकार जुताई करके गोबर की सड़ी हुई खाद मिलकर तैयार कर लेते है. बीजों की बुवाई अप्रैल-मई में 1-1 फुट की दूरी पर पंक्ति में 5-5 सेमी० की दूरी पर की जाती है.

वृक्ष रोपाई 

पौधशाला में तैयार पौधों को वर्षा ऋतु से पहले रोपित करना चाहिए. इसके लिए एक माह पूर्व रोपण के लिए आवश्यकतानुसार अथवा 5-4 x 4-3 मीटर की दूरी पर एक घन फुट आकर के गड्ढे जून में खोद कर तैयार कर लेना चाहिए. इसमें गोबर की खाद व मिट्टी बराबर में मिलाकर भर देना चाहिए. और पानी डाल देना चाहिए, जिससे मिट्टी बैठ जाए.

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वृध्दि एवं उपज

एक अर्जुन का वृक्ष 15 से 16 साल में तैयार हो जाता है. जिसकी लम्बाई 11 से 12 मीटर तथा मोटाई 59 से 89 सेमी० तक हो जाती है.

निष्कर्ष 

किसान भाईयों उम्मीद है, गाँव किसान (Gaon Kisan) के इस लेख से अर्जुन वृक्ष की खेती के बारे में पूरी जानकारी मिल पायी होगी. फिर भी अर्जुन वृक्ष की खेती के बारे में आपका कोई प्रश्न हो तो कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट कर पूछ सकते है. इसके अलावा यह लेख आपको कैसा लगा कमेन्ट कर जरुर बताये, महान कृपा होगी.

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद जय हिन्द. 

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